आज यानी 6 जुलाई को भारत के उन नेताओं में शुमार डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी की 125वीं जयंती मनाई जा रही है, जिन्होंने आजादी के फौरन बाद की राजनीति में शिक्षा, कानून और संवैधानिक बहस तीनों मोर्चों पर अपनी अलग पहचान बनाई। भारतीय जनसंघ की स्थापना, राष्ट्रीय एकता को लेकर उनका नजरिया और जम्मू-कश्मीर के मसले पर उनकी साफगोई आज भी उन्हें याद किए जाने की बड़ी वजहें हैं।
डॉ. मुखर्जी का जन्म 6 जुलाई 1901 को कोलकाता में हुआ था। उनके घर का माहौल शुरू से ही पढ़ाई-लिखाई और कानून से जुड़ा रहा, क्योंकि उनके पिता सर आशुतोष मुखर्जी खुद देश के जाने-माने न्यायविद और शिक्षाविद थे और कलकत्ता विश्वविद्यालय के कुलपति भी रह चुके थे। ऐसे बौद्धिक माहौल में बड़े हुए श्यामा प्रसाद ने बचपन से ही पढ़ाई और सार्वजनिक जीवन में अपनी अलग छाप छोड़नी शुरू कर दी थी।
पढ़ाई में हमेशा आगे रहे, 33 की उम्र में बने सबसे युवा कुलपति
उनकी शुरुआती पढ़ाई कोलकाता के मित्रा इंस्टीट्यूशन से हुई, जिसके बाद उन्होंने प्रेसीडेंसी कॉलेज से आगे की पढ़ाई पूरी की। स्कूल-कॉलेज के दिनों से ही मुखर्जी पढ़ाई में हमेशा आगे रहते थे। साल 1924 में उन्होंने कलकत्ता हाईकोर्ट में एडवोकेट के तौर पर रजिस्ट्रेशन कराया और कानून की दुनिया में कदम रखा। लेकिन उनकी सबसे बड़ी उपलब्धि इसके ठीक दस साल बाद सामने आई, जब 1934 में महज 33 साल की उम्र में वे कलकत्ता यूनिवर्सिटी के सबसे युवा कुलपति नियुक्त हुए। इतनी कम उम्र में इतने बड़े शैक्षणिक पद तक पहुंचना अपने आप में असाधारण माना गया, और उनके कार्यकाल में यूनिवर्सिटी में कई जरूरी शैक्षणिक और सांस्कृतिक बदलाव किए गए।
ब्रिटिश दौर की राजनीति और नेहरू कैबिनेट में मंत्री पद
ब्रिटिश शासन के दौरान ही डॉ. मुखर्जी ने सक्रिय राजनीति में कदम रखा। इसी दौर में वे हिंदू महासभा से जुड़े और आगे चलकर इसके अध्यक्ष भी बने। इस भूमिका में उन्होंने राष्ट्रीय मुद्दों और भारत की एकता से जुड़े विषयों पर खुलकर अपनी बात रखी। आजादी मिलने के बाद जब प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने अपनी पहली केंद्रीय मंत्रिपरिषद बनाई, तो उसमें डॉ. मुखर्जी को उद्योग एवं आपूर्ति मंत्री की जिम्मेदारी सौंपी गई। लेकिन यह कार्यकाल ज्यादा लंबा नहीं चला। साल 1950 में नेहरू-लियाकत समझौते और खासकर जम्मू-कश्मीर से जुड़ी नीतियों पर गहरे मतभेद होने के बाद उन्होंने मंत्रिमंडल से इस्तीफा दे दिया।
1951 में जनसंघ की स्थापना, आगे चलकर बनी बीजेपी की वैचारिक बुनियाद
मंत्रिमंडल छोड़ने के अगले ही साल, 1951 में डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने भारतीय जनसंघ की स्थापना की। इस नई पार्टी को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ यानी आरएसएस का वैचारिक समर्थन हासिल था। यही भारतीय जनसंघ आगे चलकर भारतीय जनता पार्टी यानी बीजेपी की वैचारिक नींव बना। उनकी राजनीति मुख्य रूप से राष्ट्रीय एकता, एक मजबूत केंद्र सरकार और देश भर में एक जैसी संवैधानिक व्यवस्था जैसी सोच पर टिकी मानी जाती है। इन्हीं विचारों की वजह से उनका नाम अक्सर एक देश, एक संविधान की अवधारणा से जोड़ा जाता है, खासकर जम्मू-कश्मीर को लेकर उनके स्पष्ट रुख के चलते।
भारत छोड़ो आंदोलन पर उनका रुख, इतिहास में अब भी बहस का विषय
इतिहासकारों के मुताबिक डॉ. मुखर्जी ने भारत छोड़ो आंदोलन का समर्थन नहीं किया था। उनकी सोच थी कि दूसरे विश्व युद्ध के उस नाजुक दौर में यह आंदोलन देश में और अस्थिरता पैदा कर सकता है। उनके इस फैसले को लेकर इतिहास और राजनीति में आज भी अलग-अलग राय मौजूद हैं। एक तबका इसे उस वक्त की परिस्थितियों को देखते हुए लिया गया व्यावहारिक फैसला मानता है, तो कुछ लोग इस पर सवाल भी उठाते रहे हैं। हालांकि उनके समर्थक उन्हें हमेशा राष्ट्रीय एकता और संसदीय लोकतंत्र के मजबूत पैरोकार के तौर पर याद करते हैं।
जम्मू-कश्मीर में नजरबंदी के दौरान निधन, आज भी सवालों में घिरी मौत
23 जून 1953 को जम्मू-कश्मीर में नजरबंदी के दौरान डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी का निधन हो गया। उनकी मौत की परिस्थितियां लंबे समय तक सार्वजनिक और राजनीतिक बहस का विषय बनी रहीं और आज भी इस पर चर्चा होती रहती है। इतनी कम उम्र में उनका निधन हो जाने के बावजूद उनके विचारों का असर भारतीय राजनीति पर लगातार बना रहा। खासकर राष्ट्रीय एकीकरण, संवैधानिक ढांचे और जम्मू-कश्मीर से जुड़ी बहसों में उनका नाम आज भी प्रमुखता से लिया जाता है।
डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी से जुड़ी 10 अहम बातें
- 6 जुलाई 1901 को कोलकाता में जन्म हुआ।
- पिता सर आशुतोष मुखर्जी प्रसिद्ध न्यायविद और शिक्षाविद थे।
- 1924 में कलकत्ता हाईकोर्ट में एडवोकेट बने।
- 33 वर्ष की उम्र में कलकत्ता यूनिवर्सिटी के सबसे युवा कुलपति बने।
- स्वतंत्र भारत की पहली केंद्रीय कैबिनेट में उद्योग एवं आपूर्ति मंत्री रहे।
- 1950 में नेहरू मंत्रिमंडल से इस्तीफा दिया।
- 1951 में भारतीय जनसंघ की स्थापना की।
- राष्ट्रीय एकता और मजबूत केंद्र सरकार के समर्थक रहे।
- ‘एक देश, एक संविधान’ की अवधारणा से उनका नाम प्रमुखता से जुड़ा।
- 23 जून 1953 को जम्मू-कश्मीर में नजरबंदी के दौरान निधन हुआ।











