प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बस्तर में सुरक्षाबलों के बीच एक महत्वपूर्ण संबोधन के दौरान देश की आंतरिक सुरक्षा को लेकर एक बड़ा बयान दिया है। उन्होंने स्पष्ट किया कि सुरक्षा बलों के कड़े अभियानों के चलते देश के विभिन्न हिस्सों में सक्रिय हथियारबंद माओवादी और नक्सली संगठन अब लगभग पूरी तरह समाप्त हो चुके हैं। हालांकि, इसके साथ ही उन्होंने देश के सामने एक नए और सूक्ष्म खतरे की ओर गंभीर चेतावनी जारी करते हुए कहा कि वैचारिक स्तर पर सक्रिय रहने वाले और विभिन्न संगठनों तथा राजनीतिक दलों के भीतर अपनी पैठ बना चुके दिमागी नक्सली अब एक नई चुनौती के रूप में उभर रहे हैं।
दिमागी नक्सलियों का बढ़ता दायरा और राजनीतिक दलों में घुसपैठ
प्रधानमंत्री ने अपने संबोधन में विस्तार से बताया कि प्रत्यक्ष रूप से हिंसा और हथियारों के सहारे चलने वाला नक्सलवाद भले ही अपने अंतिम चरण में पहुंच चुका है या खत्म हो चुका है, लेकिन वैचारिक रूप से व्यवस्था को नुकसान पहुंचाने वाले लोग अभी भी सक्रिय हैं। सरकार और सुरक्षा एजेंसियों का मानना है कि ये तथाकथित दिमागी नक्सली शहरी क्षेत्रों, विभिन्न सामाजिक संगठनों और राजनीतिक दलों के भीतर गुप्त रूप से काम कर रहे हैं। ये लोग प्रत्यक्ष रूप से हथियार उठाने के बजाय लोकतांत्रिक संस्थाओं और वैचारिक मोर्चों का इस्तेमाल करके समाज में भ्रम फैलाने का काम करते हैं, जिससे देश की आंतरिक स्थिरता के लिए एक अलग प्रकार का जोखिम पैदा होता है.
बस्तर के जवानों के बीच दिवाली और सुरक्षाबलों का योगदान
प्रधानमंत्री का यह बयान बस्तर क्षेत्र में सुरक्षा बलों के जवानों के साथ दिवाली मनाने के खास अवसर पर सामने आया है। इस दौरान उन्होंने देश के दूरदराज और कठिन इलाकों में तैनात जवानों के साहस, समर्पण और बलिदान की खुले तौर पर सराहना की। बस्तर जैसे दुर्गम इलाकों में सुरक्षाबलों ने दशकों तक चले संघर्ष का सामना करते हुए शांति बहाली की दिशा में जो अभूतपूर्व सफलता हासिल की है, उसी के परिणामस्वरूप आज इस क्षेत्र में हालात तेजी से बदल रहे हैं। सरकार की तरफ से लगातार यह संदेश दिया जा रहा है कि एक तरफ जहां हिंसा का रास्ता अपनाने वालों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की गई है, वहीं दूसरी तरफ वैचारिक प्रदूषण फैलाने वाले तत्वों से भी अब उतनी ही सख्ती से निपटा जाएगा.
पहले भी लाल किले से दी जा चुकी है चेतावनी
यह पहला मौका नहीं है जब देश के शीर्ष नेतृत्व ने इस वैचारिक खतरे के प्रति आगाह किया है। इससे पहले स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर लाल किले की प्राचीर से भी प्रधानमंत्री ने देशवासियों और सुरक्षा एजेंसियों को इसी खतरे के प्रति सचेत किया था। उनका बार-बार यह दोहराना इस बात का संकेत है कि सरकार आंतरिक सुरक्षा की नीति में केवल भौतिक रूप से हथियारबंद ताकतों के सफाए तक सीमित नहीं है, बल्कि उस वैचारिक आधार को भी नेस्तनाबूद करना चाहती है जो युवाओं को गुमराह करने का काम करता है। इस विषय पर केंद्रीय मंत्रियों जैसे कि किरेन रिजिजू द्वारा भी समय-समय पर स्पष्टीकरण दिए जा चुके हैं, जिसके बाद से राजनीतिक गलियारों में इस मुद्दे पर तीखी बहस छिड़ी हुई है.
जनता की प्रतिक्रिया
इस बयान के सामने आने के बाद सोशल मीडिया और राजनीतिक हलकों में तीखी प्रतिक्रियाएं देखने को मिली हैं, जहां एक तरफ इसे राष्ट्र सुरक्षा के लिहाज से एक जरूरी कदम बताया जा रहा है, वहीं विपक्षी दलों ने इसे वैचारिक विरोधियों को दबाने का प्रयास करार दिया है।


























