शशि थरूर ने हिमालयी क्षेत्र की पर्यावरणीय स्थिरता पर गंभीर चिंता व्यक्त करते हुए सीमा पार पर्यावरण प्रबंधन की तत्काल आवश्यकता पर बल दिया है। एक्स पर अपने आधिकारिक हैंडल के जरिए इंडियन एक्सप्रेस में प्रकाशित अपने नवीनतम स्तंभ थरूराथिंक के प्रमुख विचारों को साझा करते हुए, उन्होंने यह महत्वपूर्ण सवाल उठाया कि क्या भारत, चीन और नेपाल अपने साझा हिमालयी पारिस्थितिकी तंत्र के प्रबंधन के लिए एक साथ मिलकर सहयोग कर सकते हैं। उनका मुख्य तर्क यह रेखांकित करता है कि इस क्षेत्र के छोटे और संवेदनशील देश बिना किसी बड़ी भूमिका के वैश्विक जलवायु परिवर्तन के दुष्परिणामों का भारी बोझ उठा रहे हैं।
नेपाल पर जलवायु परिवर्तन का असमान प्रभाव
इस चर्चा का मुख्य बिंदु यह है कि नेपाल वर्तमान में वैश्विक तापमान में वृद्धि की भारी कीमत चुका रहा है, जबकि इस समस्या में उसका अपना योगदान बेहद कम है। तेजी से पिघलते ग्लेशियर, अनिश्चित मानसून, नाजुक पहाड़ी ढलान और अचानक आने वाली बाढ़ नेपाल के स्थानीय समुदायों के लिए लगातार बड़ा खतरा बन रहे हैं। थरूर ने जोर देकर कहा कि दुनिया के बड़े औद्योगिक देशों द्वारा उत्सर्जित ग्रीनहाउस गैसों का खामियाजा हिमालयी देशों को भुगतना पड़ रहा है। इस बढ़ते पारिस्थितिक असंतुलन से निपटने के लिए जलवायु न्याय और पड़ोसी देशों के बीच एक ठोस सहयोग व्यवस्था की सख्त जरूरत है।
क्षेत्रीय पारिस्थितिक सहयोग की आवश्यकता
नाजुक हिमालयी पर्वत श्रृंखला की सुरक्षा के लिए भारत, चीन और नेपाल के बीच कूटनीतिक और वैज्ञानिक समन्वय अनिवार्य है। इन तीनों देशों के बीच नदियां, ग्लेशियर और नदी बेसिन प्राकृतिक रूप से आपस में जुड़े हुए हैं। इसका सीधा मतलब यह है कि किसी एक क्षेत्र में पर्यावरण का नुकसान या अचानक होने वाली प्राकृतिक आपदा का असर निचले इलाकों और पड़ोसी सीमाओं पर तुरंत पड़ता है। संयुक्त निगरानी तंत्र के अभाव में बुनियादी ढांचों के अनियंत्रित निर्माण और वनों की कटाई से प्राकृतिक आपदाओं का जोखिम और बढ़ जाता है। एक साझा सीमा पार व्यवस्था के जरिए जल विज्ञान संबंधी महत्वपूर्ण डेटा साझा करने, ग्लेशियर झील टूटने के खतरों को प्रबंधित करने और आपदा पूर्व चेतावनी प्रणाली स्थापित करने में मदद मिल सकती है।
जनता की प्रतिक्रिया और ऑनलाइन चर्चा
सोशल मीडिया पर इस विचार के सामने आने के बाद आम लोगों और विश्लेषकों के बीच मिली-जुली प्रतिक्रियाएं देखने को मिलीं। कई लोगों ने इस प्रस्ताव का समर्थन करते हुए कहा कि नदियां और मौसम संबंधी खतरे राजनीतिक सीमाओं को नहीं मानते, इसलिए पर्यावरण सुरक्षा में एकजुटता जरूरी है। कुछ उपयोगकर्ताओं ने यह सुझाव दिया कि बाढ़ और भूस्खलन जैसी आपदाओं की अग्रिम सूचना देने के लिए भारत और नेपाल जैसे देशों में एकीकृत मोबाइल आपातकालीन चेतावनी प्रणाली लागू की जानी चाहिए। वहीं, कुछ अन्य लोगों ने रणनीतिक चुनौतियों और चीन के साथ भू-राजनीतिक तनावों का जिक्र करते हुए कहा कि विकसित देशों को जलवायु क्षतिपूर्ति देनी चाहिए और पर्यावरण नीतियों को धरातल पर उतारने के लिए ठोस कदम उठाए जाने चाहिए।



























