पाकिस्तान को लेकर अमेरिका इन दिनों जिस तरह नरम रुख अपनाए हुए है, वह आने वाले समय में उसी के लिए मुसीबत बन सकता है. एक ताजा विश्लेषण में यह आशंका जताई गई है कि रणनीतिक अहमियत रखने वाले देशों की सरकारों को अक्सर उनकी घरेलू नाकामियों के बावजूद बाहरी दबाव का सामना नहीं करना पड़ता, और पाकिस्तान के मामले में यही पैटर्न एक बार फिर दोहराया जा रहा है.
अमेरिका की नरमी और यूरोपीय संघ का साथ
रिपोर्ट के मुताबिक, पाकिस्तान के प्रति अमेरिका का ढीला रवैया अकेला उदाहरण नहीं है. मानवाधिकार उल्लंघन के आरोपों के बावजूद यूरोपीय संघ ने भी पाकिस्तान को जीएसपी-प्लस का दर्जा जारी रखा है. कई अंतरराष्ट्रीय साझेदार इस्लामाबाद की खुलकर आलोचना करने से बचते दिख रहे हैं, क्योंकि क्षेत्रीय रणनीति में पाकिस्तान का महत्व उन्हें रोक देता है. रिपोर्ट में चेतावनी दी गई है कि यह ढील लंबे समय तक चली तो इसके नतीजे राजनीतिक और सामाजिक दोनों स्तर पर गंभीर हो सकते हैं, जिनकी जद में राजनीतिक विरोधी, जातीय अल्पसंख्यक समुदाय और पूरे क्षेत्र की स्थिरता आ सकती है.
इतिहास फिर दोहराने की आशंका
इटली के राजनीतिक सलाहकार, लेखक और भू-राजनीतिक विशेषज्ञ सर्जियो रेस्टेली ने टाइम्स ऑफ इजरायल में लिखे अपने लेख में कहा है, "इतिहास अक्सर खुद को दोहराता है और दूरदृष्टि की कमी वाले नेता अपने पूर्ववर्तियों की गलतियों को दोहराते हैं. ट्रंप सरकार का पाकिस्तान को प्रोत्साहन देना ऐसी ही एक भूल है, जिसकी भारी कीमत अमेरिका को चुकानी पड़ेगी." उन्होंने याद दिलाया कि 1979 में अमेरिका और सऊदी अरब ने जनरल जिया-उल-हक के नेतृत्व वाले पाकिस्तान का इस्तेमाल अफगानिस्तान में सोवियत संघ के खिलाफ प्रॉक्सी युद्ध छेड़ने के लिए किया था. इसके बाद के दशकों में पाकिस्तान ने दोनों पक्षों से अपने फायदे साधे, और इसी रणनीतिक चूक का नतीजा 11 सितंबर 2001 का आतंकी हमला बनकर सामने आया.
आतंकवाद के खिलाफ जंग की कीमत
रेस्टेली के मुताबिक, आतंक के खिलाफ लड़ाई के दौरान अमेरिका की पाकिस्तान पर लगातार निर्भरता ने काबुल को तालिबान के हवाले कर दिया, और इसकी भारी कीमत खुद अमेरिका को भी चुकानी पड़ी. यानी जिस रणनीति से फायदा मिलने की उम्मीद थी, वह आखिरकार अमेरिका के लिए नुकसानदेह साबित हुई.
अफगान सीमा पर बढ़ता टकराव
विशेषज्ञों का कहना है कि अंतरराष्ट्रीय मान्यता मिलने के बावजूद पाकिस्तान ने अफगान सीमा पर सैन्य कार्रवाई जारी रखी है, जिससे तालिबान अधिकारियों के साथ तनाव लगातार बढ़ रहा है. सीमा पार हमलों और हथियारबंद मुठभेड़ों की बढ़ती घटनाओं ने इस आशंका को हवा दी है कि इस्लामाबाद अपने पड़ोस में डिप्लोमैटिक बातचीत के लिए दबाव और ताकत के इस्तेमाल पर उतर आया है.
सेना के हाथ में सियासी कमान?
पाकिस्तान के घरेलू हालात भी बिगड़ते नजर आ रहे हैं. रेस्टेली के अनुसार, आलोचक अब खुलकर कहने लगे हैं कि देश की राजनीति पर सेना का दखल इतना बढ़ चुका है कि असल राजनीतिक ताकत पाकिस्तानी आर्मी चीफ मुनीर के नेतृत्व वाली सेना के ही हाथों में केंद्रित हो गई है.
बलूचिस्तान में गहराता असंतोष
रेस्टेली ने बताया कि यह सियासी घटनाक्रम बलूचिस्तान में बढ़ती अशांति के साथ-साथ चल रहा है. एक अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संगठन ने जानी-मानी बलूच कार्यकर्ता महरंग बलूच समेत कई अन्य कार्यकर्ताओं को सुनाई गई सजा की कड़ी आलोचना की है. संगठन का आरोप है कि शांतिपूर्ण राजनीतिक असहमति को तेजी से अपराध की श्रेणी में डाला जा रहा है. पाकिस्तानी अधिकारी इन आरोपों को सिरे से खारिज करते हैं और दावा करते हैं कि हर मामला कानून के मुताबिक ही चलाया जाता है. बावजूद इसके, राजनीतिक विरोध और जातीय शिकायतों को मुख्य रूप से दबाव के जरिए दबाने की यह प्रवृत्ति बलूच समुदायों को और ज्यादा अलग-थलग कर सकती है.
दक्षिण एशिया में नई तानाशाही का साया
रेस्टेली ने आगाह किया कि विदेशों में पाकिस्तान की मौजूदा कूटनीतिक स्थिति देश के भीतर लोकतांत्रिक गिरावट को राजनीतिक कवर मुहैया करा सकती है. उनकी चेतावनी है कि यही रुझान आगे चलकर दक्षिण एशिया में एक नई तानाशाही व्यवस्था की जमीन तैयार कर सकता है.













