पाकिस्तान की सेना की कमान संभाल रहे असीम मुनीर के सामने इस समय एक ऐसी राजनीतिक पहेली खड़ी है, जिसका कोई आसान हल नजर नहीं आता. जेल में बंद पूर्व प्रधानमंत्री इमरान खान का मामला अब सिर्फ अदालतों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि पूरे देश की सियासत को हिला रहा है. यह सब उस वक्त हो रहा है जब पाकिस्तान बलूचिस्तान में अशांति, कबायली इलाकों और पीओके में तनाव और गहराते आर्थिक संकट से पहले ही जूझ रहा है.
इमरान खान पर एक साथ कई मामले चल रहे हैं. इनमें तोशाखाना केस, अल-कादिर ट्रस्ट मामला और उनकी तीसरी पत्नी बुशरा बीबी से जुड़े केस शामिल हैं. अल-कादिर ट्रस्ट मामले में उन पर आरोप है कि ब्रिटेन से पाकिस्तान लाई गई एक बड़ी रकम के लेनदेन में गंभीर गड़बड़ियां हुई हैं. इमरान खान और उनके समर्थक शुरू से इन सभी आरोपों को राजनीतिक बदले की कार्रवाई बताते आए हैं.
सामाजिक कामों का हवाला, विरोधियों का पलटवार
इमरान खान के समर्थक अक्सर उनके सामाजिक कार्यों को गिनाते हैं. शौकत खानम कैंसर अस्पताल, नमल यूनिवर्सिटी और इमरान खान फाउंडेशन जैसी संस्थाओं के जरिए उन्होंने वर्षों तक पाकिस्तान में समाजसेवा का काम किया है. लेकिन उनके राजनीतिक विरोधी इस दलील को खारिज करते हुए कहते हैं कि समाजसेवा किसी को भी कानून की जद से बाहर नहीं रख सकती.
मुनीर के लिए दोनों रास्ते खतरनाक
असल दिक्कत यहीं से शुरू होती है. अगर इमरान खान को रिहा किया जाता है, तो वह भारी जनसमर्थन के साथ दोबारा सक्रिय राजनीति में लौट सकते हैं, जो सेना और मौजूदा सत्ता प्रतिष्ठान के लिए सीधी चुनौती बन सकता है. वहीं अगर उन्हें लंबे समय तक जेल में ही रखा जाता है, तो उनके समर्थकों में गुस्सा और नाराजगी और बढ़ने का खतरा है. यानी इमरान खान को बंद रखना भी जोखिम है और उन्हें बाहर निकालना भी, और इसी उलझन में असीम मुनीर फंसे नजर आ रहे हैं.
मई 2023 के दंगों ने बढ़ाई तल्खी
इमरान खान की गिरफ्तारी के बाद मई 2023 में पाकिस्तान के कई शहरों में बड़े स्तर पर विरोध प्रदर्शन भड़क उठे थे. इस दौरान प्रदर्शनकारियों ने सिर्फ सरकारी इमारतों तक ही सीमित न रहकर सैन्य ठिकानों को भी निशाना बनाया. लाहौर में प्रदर्शनकारियों के कोर कमांडर के घर में घुस जाने और सेना तथा आईएसआई से जुड़े ठिकानों पर हमलों की घटनाओं ने पाकिस्तानी सेना को बुरी तरह नाराज कर दिया. इसके तुरंत बाद इमरान खान और उनके समर्थकों के खिलाफ आतंकवाद सहित कई गंभीर आरोपों में कार्रवाई तेज कर दी गई, जिसने सेना और इमरान खान के बीच की खाई को और चौड़ा कर दिया.
सेना बनाम सियासी नेताओं की पुरानी कहानी
पाकिस्तान के इतिहास में सेना और राजनीतिक नेताओं के बीच टकराव कोई नई बात नहीं है, यह सिलसिला दशकों पुराना है. लेकिन इस बार हालात पहले से ज्यादा पेचीदा हैं. आर्थिक संकट, सीमावर्ती इलाकों में बढ़ती अस्थिरता और आम जनता में बढ़ता राजनीतिक असंतोष, इन सबने मिलकर असीम मुनीर के सामने ऐसी मुश्किल खड़ी कर दी है, जिसका कोई सीधा और सुरक्षित हल फिलहाल नजर नहीं आता.



















