11 मार्च 2025 की वह सुबह पाकिस्तान के भीतर सुलगते असंतोष का एक और सबूत बनकर आई, जब बलूच विद्रोहियों ने जाफर एक्सप्रेस को हाईजैक कर लिया. उसी दौर में पाकिस्तान से जुड़े मामलों पर वर्षों तक काम कर चुके एक पूर्व भारतीय राजनयिक ने आशंका जताई थी कि भारत में जल्द ही कोई बड़ा आतंकी हमला हो सकता है. महज छह हफ्ते बाद यह आशंका सच साबित हुई, जब पहलगाम में 26 पर्यटकों को सिर्फ इसलिए मार डाला गया क्योंकि उनकी पहचान धर्म के आधार पर हिंदू के रूप में की गई थी.
पाकिस्तानी सेना पर हर तरफ से दबाव
इस हफ्ते सुशांत सरीन का एक विश्लेषण सामने आया, जिसमें उन्होंने बताया कि चौतरफा घिरी पाकिस्तानी सेना भारत के साथ एक छोटी लड़ाई छेड़ने का जोखिम तक उठा सकती है. उनकी दलील को हल्के में नहीं लिया जा सकता. पाकिस्तान की सैन्य व्यवस्था आज अपने इतिहास के सबसे भारी आंतरिक दबावों में से एक झेल रही है. सरीन के मुताबिक, अशांत बलूचिस्तान प्रांत में विद्रोही हमलों में आई अचानक तेजी ने सेना के प्रभुत्व वाले हाइब्रिड तंत्र को उसकी महत्वाकांक्षाओं और जमीनी हकीकत के बीच की खाई का सामना करने पर मजबूर कर दिया है.
यह दबाव कई मोर्चों पर एक साथ दिख रहा है. तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान यानी टीटीपी लगातार पाकिस्तानी सेना को नुकसान पहुंचा रही है. बलूच विद्रोह पहले से कहीं ज्यादा संगठित, साहसी और घातक हो चुका है. काबुल में तालिबान की सरकार, जिसे कभी पाकिस्तान अपनी रणनीतिक ताकत मानता था, अब उसके लिए बोझ बन चुकी है. जिन आतंकी गुटों को कभी रावलपिंडी ने खुद पाला था, वही अब पाकिस्तान के खिलाफ हथियार उठा चुके हैं. यहां तक कि पीओके में भी जनता का गुस्सा पहले जैसा कभी नहीं देखा गया. जो सेना खुद को पाकिस्तान का आखिरी रक्षक बताती रही है, उसके लिए यह सिर्फ सुरक्षा से जुड़ी चुनौती नहीं बल्कि अस्तित्व का संकट बन गया है. और इतिहास यही बताता है कि जब भी पाकिस्तानी सेना अपने ही देश में घिरती है, उसका सबसे आसान रास्ता पड़ोसी भारत के खिलाफ किसी आतंकी हमले की साजिश रचना बन जाता है. बंटी हुई पाकिस्तानी राजनीति को एकजुट करने के लिए हिंदू भारत के डर से बेहतर कोई हथियार नहीं मिलता, क्योंकि बाहरी टकराव भीतरी टूटन के लिए एक तरह की दवा साबित होता है.
भारत को दोष देना पाकिस्तान के लिए पुरानी आदत क्यों है
यह प्रवृत्ति पाकिस्तान की रणनीतिक सोच में बहुत गहराई तक बैठी है. लेखिका सी क्रिस्टीन फेयर अपनी किताब फाइटिंग टू द एंड द पाकिस्तान आर्मीज वे ऑफ वॉर में लिखती हैं कि पाकिस्तानी सेना देश के भीतर मौजूद बंटवारों को अपनी नाकामी का नतीजा नहीं बल्कि भारत की दखलंदाजी का नतीजा मानती है, चाहे वह दखल असली हो या सिर्फ कल्पना. इस सोच के मुताबिक, भीतरी दरारें तब तक कोई खतरा नहीं हैं, जब तक नई दिल्ली उनका फायदा नहीं उठाती. फेयर लिखती हैं कि यही कहकर पाकिस्तानी सेना भारत के खिलाफ अपनी पारंपरिक सैन्य तैयारी बनाए रखते हुए घरेलू खतरों पर ध्यान देने का दिखावा कर सकती है.
यानी भारत को दोष देना पाकिस्तान के लिए महज एक बहाना नहीं बल्कि एक तरह की संस्थागत सोच बन चुकी है. 1971 की करारी हार के बाद भी, जब 93,000 से ज्यादा पाकिस्तानी सैनिकों ने भारतीय सेना के आगे आत्मसमर्पण किया और बांग्लादेश एक अलग देश बना, पाकिस्तानी व्यवस्था ने खुद के भीतर झांकने के बजाय बाहर की तरफ उंगली उठाई. लेफ्टिनेंट जनरल एएके नियाजी ने अपनी 2009 में छपी किताब द बिट्रेयल ऑफ ईस्ट पाकिस्तान में पश्चिमी पाकिस्तान के राजनीतिक नेतृत्व की आलोचना तो की, लेकिन साथ ही पूर्वी पाकिस्तान के हिंदुओं पर बंगाली राष्ट्रवाद के नाम पर स्थानीय मुसलमानों को गुमराह करने का इल्जाम भी मढ़ दिया. यहां तक कि हमूदुर रहमान आयोग, जिसे पाकिस्तान सरकार ने 26 दिसंबर 1971 को 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध और पूर्वी पाकिस्तान के अलग होने की वजहें जांचने के लिए बनाया था, वह भी पूर्वी पाकिस्तान के डेढ़ करोड़ से ज्यादा हिंदुओं पर भारत के कथित असर को बड़ी जिम्मेदारी सौंपने से खुद को रोक नहीं सका. ढांचागत नाकामियों, सैन्य ज्यादतियों और राजनीतिक चूकों का सामना करने के बजाय बाहरी साजिश का सिद्धांत आत्मचिंतन का विकल्प बन गया. समय के साथ आंतरिक नाकामियों के लिए बाहरी वजहें तलाशने की यह आदत और गहरी होती गई.
किला-ए-इस्लाम की सोच और शहादत की संस्कृति
बाहर बहाना ढूंढने की यह प्रवृत्ति पाकिस्तान के लिए इसलिए भी सहज है क्योंकि वह खुद को किला-ए-इस्लाम यानी इस्लाम का किला मानता है, जिसका जन्म ही हिंदू भारत के विरोध में हुआ. पाकिस्तानी सेना खुद को केवल देश की भौगोलिक सीमाओं की नहीं बल्कि उसकी वैचारिक सीमाओं की भी रक्षक मानती है. यही वजह है कि वह एक साथ राज्य की सेना और अल्लाह की सेना, दोनों की भूमिका निभाती नजर आती है. ब्रिगेडियर सैफी अहमद नकवी ने पाकिस्तानी सेना की 1994 की ग्रीन बुक में लिखा था कि एक पाकिस्तानी सैनिक की सबसे बड़ी प्रेरणा इस्लाम के मकसद के लिए लड़ना है. जिहाद, गाजी और शहीद जैसे आदर्श आज भी सेना की संस्थागत सोच का अभिन्न हिस्सा बने हुए हैं.
लेखिका मारिया राशिद अपनी किताब डाइंग टू सर्व मिलिटेरिज्म अफेक्ट एंड द पॉलिटिक्स ऑफ सैक्रिफाइस इन द पाकिस्तान आर्मी में इसी शहादत की संस्कृति का एक और पहलू सामने लाती हैं. वह बताती हैं कि शहादत सेना की सोच के केंद्र में है और शहीद होने वाले सैनिक के लिए सब कुछ बदल जाता है, समाज में उसका दर्जा और परिवार में उसकी जगह दोनों. राशिद लिखती हैं कि वैवाहिक तनाव आम बात हो जाती है, समय के साथ परिवार का साथ कम होता जाता है और कई बार परिवार टूट भी जाता है, खासकर तब जब दंपती के बच्चे न हों. उनका एक और अहम अवलोकन यह है कि पाकिस्तान में युद्ध को लेकर जनसमर्थन तब कहीं ज्यादा मजबूत होता है जब दुश्मन भारत हो, बजाय इसके कि सेना को टीटीपी या बलूच विद्रोहियों जैसे अपने ही देश के मुसलमानों से जूझना पड़े.
आगे खतरा कितना बड़ा
इन सारे तथ्यों को साथ रखकर देखें तो तस्वीर साफ हो जाती है. बलूचिस्तान से लेकर पीओके तक पाकिस्तान के भीतर सुलगता असंतोष, टीटीपी का बढ़ता हमलावर रुख, तालिबान शासन का बोझ और सेना की अपनी शहादत की विचारधारा, ये सब मिलकर एक ऐसी परिस्थिति बनाते हैं जिसमें इतिहास खुद को दोहरा सकता है. पहलगाम की घटना इस पैटर्न की सबसे ताजा और सबसे दर्दनाक कड़ी है. जिस तरह 1971 की हार के बाद पाकिस्तान की व्यवस्था ने आत्मचिंतन की जगह भारत पर उंगली उठाई, उसी तर्ज पर आज भी घिरी हुई पाकिस्तानी सेना के लिए भारत के खिलाफ मोर्चा खोलना आंतरिक बिखराव से ध्यान भटकाने का सबसे आसान रास्ता बन सकता है.











