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मस्तूंग में ड्रोन हमले के बाद मरे 100 से ज्यादा मवेशी, मीर यार बलोच का पाकिस्तानी सेना पर आर्थिक तबाही का आरोपपाकिस्तान
6 जुल॰ 2026, 10:01 pm (45 दिन पहले)· 4

मस्तूंग में ड्रोन हमले के बाद मरे 100 से ज्यादा मवेशी, मीर यार बलोच का पाकिस्तानी सेना पर आर्थिक तबाही का आरोप

बलूच नेता मीर यार बलोच ने आरोप लगाया है कि 3 जून 2026 को मस्तूंग के दश्त कंबील इलाके में पाकिस्तानी सेना के ड्रोन हमले में मुहम्मद इब्राहिम के 100 से ज्यादा मवेशी मारे गए, जिसे वे बलूचिस्तान में जारी आर्थिक तबाही की एक सोची-समझी रणनीति बता रहे हैं।

बलूचिस्तान के मस्तूंग जिले में 3 जून 2026 को हुए एक कथित ड्रोन हमले में 100 से ज्यादा मवेशी मारे गए हैं, और इस घटना ने एक बार फिर बलूचिस्तान में जारी सैन्य कार्रवाइयों को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। बलूच नेता मीर यार बलोच ने आरोप लगाया है कि पाकिस्तानी सेना अब सिर्फ लोगों की जान ही नहीं, बल्कि उनकी रोजी-रोटी के इकलौते जरिए मवेशियों और खेती-बाड़ी को भी निशाना बना रही है, ताकि बलूच आबादी को आर्थिक रूप से तोड़ा जा सके।

78 साल पुराना दमन, 1973 में एक लाख मवेशी लूटे जाने का दावा

मीर यार बलोच के मुताबिक यह कोई नई कहानी नहीं है। उनका कहना है कि पिछले 78 सालों से पाकिस्तानी सेना बलूचिस्तान में लगातार दमन अभियान चला रही है। इसकी मिसाल के तौर पर उन्होंने 1973 के सैन्य अभियान का जिक्र किया, जब कोहलू, काहान और चमालंग के मरी बहुल इलाकों में करीब एक लाख मवेशी या तो लूट लिए गए थे या फिर सैन्य बमबारी में मार डाले गए थे। उनके अनुसार पाकिस्तान के नियंत्रण में आने के बाद से बलूचिस्तान में सिर्फ लोगों की जान ही खतरे में नहीं रही, बल्कि उनकी रोजी-रोटी भी पूरी तरह असुरक्षित हो गई।

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मस्तूंग के दश्त कंबील में क्या हुआ

मीर यार बलोच ने जो जानकारी साझा की है, उसके मुताबिक 3 जून 2026 को मस्तूंग जिले के दश्त कंबील इलाके में पाकिस्तानी सेना ने ड्रोन से हमला किया। यह हमला कथित तौर पर स्थानीय निवासी मुहम्मद इब्राहिम के घर को निशाना बनाकर किया गया। राहत की बात यह रही कि इस हमले में परिवार का कोई सदस्य घायल नहीं हुआ, लेकिन 100 से ज्यादा मवेशी मारे गए। मीर यार बलोच के मुताबिक ये मवेशी ही उस परिवार की कमाई का इकलौता जरिया थे, और इनके खत्म होने से पूरा परिवार अचानक गहरे आर्थिक संकट में फंस गया।

चरवाहों और किसानों को क्यों बनाया जा रहा निशाना

बलूचिस्तान के ज्यादातर इलाकों में रोजगार के मौके बहुत कम हैं, इसलिए बड़ी तादाद में परिवार पशुपालन पर ही निर्भर हैं और अपने मवेशियों के साथ दूर-दराज़ के पहाड़ी इलाकों में रहते हैं। मीर यार बलोच का आरोप है कि सेना जानबूझकर ऐसे ही चरवाहों और किसानों को निशाना बना रही है, जिनकी पूरी जिंदगी खेती और पशुपालन पर टिकी है। उनके मुताबिक सैन्य अभियानों के दौरान कई बार घर जलाए गए, लोगों को बिना किसी न्यायिक प्रक्रिया के मार डाला गया, कई लोगों को जबरन गायब कर दिया गया, और साथ ही उनके मवेशी भी तबाह कर दिए गए। उनका कहना है कि यह सिर्फ संपत्ति का नुकसान नहीं है, बल्कि लोगों से उनकी आजीविका छीनकर उन्हें आर्थिक रूप से कमजोर करने की सोची-समझी रणनीति है।

सूडान से बोस्निया तक, दुनिया के दूसरे संघर्षों से तुलना

अपने आरोपों को पुख्ता करने के लिए मीर यार बलोच ने दुनिया के कुछ और संघर्षों का हवाला भी दिया। उन्होंने बताया कि सूडान के दारफुर, म्यांमार, दक्षिण सूडान और बोस्निया एवं हर्जेगोविना जैसे इलाकों में भी गांवों, फसलों और मवेशियों को जानबूझकर निशाना बनाए जाने की घटनाएं सामने आ चुकी हैं। उनका मानना है कि ये उदाहरण साबित करते हैं कि कई संघर्षों में आम नागरिकों की आजीविका को खत्म करना भी सैन्य रणनीति का हिस्सा बन जाता है, और उनके मुताबिक बलूचिस्तान में भी वही पैटर्न दोहराया जा रहा है।

सवाल-जवाब

यह कथित ड्रोन हमला कब और कहां हुआ?
आरोप है कि यह हमला 3 जून 2026 को बलूचिस्तान के मस्तूंग जिले के दश्त कंबील इलाके में हुआ।
हमले में कितने मवेशी मारे गए और यह किसके घर पर हुआ?
100 से ज्यादा मवेशी मारे गए, और आरोप है कि यह हमला स्थानीय निवासी मुहम्मद इब्राहिम के घर को निशाना बनाकर किया गया।
क्या हमले में कोई इंसान घायल हुआ?
मीर यार बलोच के मुताबिक इस हमले में परिवार का कोई सदस्य घायल नहीं हुआ, लेकिन मवेशी मारे गए।
मीर यार बलोच कौन हैं और उन्होंने क्या आरोप लगाया?
वे एक बलूच नेता हैं जिन्होंने आरोप लगाया कि पाकिस्तानी सेना जानबूझकर बलूच चरवाहों और किसानों के मवेशी व खेती नष्ट कर रही है।
1973 के सैन्य अभियान से जुड़ा क्या दावा किया गया है?
दावा है कि 1973 में कोहलू, काहान और चमालंग के मरी इलाकों में करीब एक लाख मवेशी लूट लिए गए या बमबारी में मारे गए।
इस आरोप के समर्थन में किन अन्य वैश्विक संघर्षों का हवाला दिया गया?
सूडान के दारफुर, म्यांमार, दक्षिण सूडान और बोस्निया एवं हर्जेगोविना के संघर्षों का हवाला दिया गया, जहां गांव, फसलें और मवेशी निशाना बनाए गए थे।
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