पारंपरिक रूप से बच्चों के पालन-पोषण की पूरी जिम्मेदारी अक्सर माताओं के कंधों पर ही डाल दी जाती है। बच्चे की तबियत खराब होने पर मां का दौड़ना, स्कूल की बैठकों में शामिल होना और टिफिन से लेकर होमवर्क तक की हर फिक्र केवल मां करना—इस पुरानी सोच को बदलने का समय आ चुका है। बच्चों को केवल वित्तीय सहायता देने वाले पिता की नहीं, बल्कि ऐसे मार्गदर्शक की आवश्यकता होती है जो उनके जीवन की छोटी-बड़ी गतिविधियों में सक्रिय रूप से शामिल रहे।
बच्चों की परवरिश किसी एक व्यक्ति का अकेला कर्तव्य नहीं है। पिता की उपस्थिति बच्चों के भीतर सुरक्षा की भावना, मजबूत आत्मविश्वास और सही दृष्टिकोण का विकास करती है। पिता जितना अधिक समय अपने बच्चों के साथ बिताते हैं, बच्चे खुद को उतना ही सुरक्षित और आत्मविश्वासी महसूस करते हैं। इसके लिए किसी प्रकार के भारी बदलाव की आवश्यकता नहीं होती, बल्कि रोजमर्रा की सामान्य दिनचर्या में कुछ छोटे लेकिन महत्वपूर्ण सुधार करने की जरूरत होती है।
बच्चों के साथ गुणवत्तापूर्ण समय बिताएं
बच्चों को महंगे खिलौने या दिखावटी उपहारों की उतनी चाहत नहीं होती जितनी उन्हें अपने पिता के साथ और वक्त की जरूरत होती है। दिनभर की व्यस्तता से कुछ पल निकालकर बच्चों के साथ खेलें, कोई किताब पढ़ें, पार्क में टहलने जाएं या उनके साथ बैठकर सामान्य बातचीत करें। इस दौरान अपने मोबाइल फोन और दफ्तर के कामों को खुद से दूर रखना बेहद जरूरी है ताकि बच्चे को यह अहसास हो सके कि आप उसके साथ जो समय बिता रहे हैं वह आपके लिए बहुत कीमती है।
बच्चों की बातें कई बार बड़ों को बहुत मामूली या बचकानी लग सकती हैं, लेकिन उस नन्हे मन के लिए वह बहुत अहमियत रखती हैं। इसलिए जब भी आपका बच्चा आपसे कुछ साझा करने आए, तो तुरंत प्रतिक्रिया देने या डांटने के बजाय धैर्य के साथ उसकी पूरी बात सुनें। स्कूल में किसी सहपाठी के साथ अनबन हुई हो या किसी बात से मन में डर बैठा हो, उसकी बात को बिना किसी पूर्वाग्रह के सुनें। इससे बच्चों के मन में यह विश्वास पैदा होता है कि वे बेझिझक अपनी हर परेशानी अपने पिता के साथ साझा कर सकते हैं।
घरेलू और परवरिश के कार्यों में बराबर हाथ बंटाएं
बच्चों का स्कूल बैग व्यवस्थित करने से लेकर उनके होमवर्क की जांच करना, उन्हें भोजन कराना या जरूरत पड़ने पर चिकित्सक के पास ले जाना—ये सभी काम केवल मां के हिस्से के नहीं हैं। पिता भी इन कार्यों में पूरी तरह सहयोग कर सकते हैं। ऐसा करने से न केवल जीवनसाथी का मानसिक और शारीरिक बोझ कम होता है, बल्कि बच्चों के सामने भी मिलजुलकर जिम्मेदारियां उठाने का एक बेहतरीन उदाहरण पेश होता है।
बातचीत का दायरा केवल पढ़ाई और अंकों तक सीमित नहीं होना चाहिए। रोज यह पूछने के बजाय कि होमवर्क पूरा हुआ या नहीं या परीक्षा में कितने अंक मिले, यह भी पूछना चाहिए कि आज स्कूल में क्या अच्छा लगा या कोई ऐसी घटना तो नहीं हुई जिससे मन उदास हुआ हो। बच्चों को अपनी भावनाओं को खुलकर व्यक्त करने का अवसर दें और उन्हें समझाएं कि डरना, रोना या उदास महसूस करना बिल्कुल स्वाभाविक प्रक्रिया है।
गलतियों से सीखना सिखाएं
बच्चों से गलतियां होना एक आम बात है। हर छोटी-दूसरी गलती पर तुरंत गुस्सा होने के बजाय उनके साथ बैठकर यह चर्चा करें कि वह परिस्थिति क्यों उत्पन्न हुई और भविष्य में उसे कैसे सुधारा जा सकता है। एक आदर्श पिता का उद्देश्य बच्चे को हर मुश्किल से बचाना नहीं होता, बल्कि उसे अपनी गलतियों से सीखकर आगे बढ़ना सिखाना होता है। स्नेह के साथ उचित सीमाएं निर्धारित करना बच्चों को जिम्मेदार और स्वावलंबी बनने में सहायता करता है.
एक बेहतरीन और आदर्श पिता बनने के लिए किसी भी व्यक्ति का हर वक्त परफेक्ट होना अनिवार्य नहीं है। इसका वास्तविक अर्थ बच्चे के जीवन में उसकी हर स्थिति में मौजूद रहना है। उसकी बात सुनना, उसे समझना, समय देना और आवश्यकता पड़ने पर ढाल बनकर उसके साथ खड़े होना ही असल परवरिश है। जब माता और पिता दोनों मिलकर बच्चों के लालन-पालन की जिम्मेदारी संभालते हैं, तो बच्चों को केवल स्नेह ही नहीं बल्कि अटूट भरोसा, सुरक्षा और एक सशक्त भावनात्मक संबल प्राप्त होता है।



















