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बच्चों के सुबह स्कूल जाने के ड्रामे से हैं परेशान? डॉक्टर पवन मंदाविया ने बताया रात की सिर्फ एक आदत बदलने का फॉर्मूलापेरेंटिंग
2 सित॰ 2026, 7:50 am (59 मिनट पहले)· 3

बच्चों के सुबह स्कूल जाने के ड्रामे से हैं परेशान? डॉक्टर पवन मंदाविया ने बताया रात की सिर्फ एक आदत बदलने का फॉर्मूला

सुबह स्कूल जाने में आनाकानी करने वाली सात साल की बच्ची का व्यवहार मां ने बिना डांटे बदल दिया। रात 8 बजे सोने की 60 दिनों की अनुशासित दिनचर्या से न केवल बच्ची की सुबह की चिड़चिड़ाहट खत्म हुई, बल्कि उसकी पढ़ाई और एकाग्रता में भी बड़ा सुधार देखा गया।

अक्सर कई घरों में सुबह का समय माता-पिता और बच्चों के बीच एक तनावपूर्ण मुकाबले की तरह बन जाता है। बच्चे को समय पर जगाना, स्कूल के लिए तैयार करना और बस तक पहुंचाना पेरेंट्स के लिए हर दिन किसी कठिन चुनौती से कम नहीं होता। कई बार बच्चे स्कूल जाने से बचने के लिए पेट दर्द, सिरदर्द या बहुत ज्यादा थकान होने जैसे बहाने बनाने लगते हैं और सुबह-सुबह बहस शुरू कर देते हैं। ऐसी ही समस्या से जूझ रही एक सात साल की बच्ची के मामले का जिक्र पीडियाट्रिशियन डॉक्टर पवन मंदाविया ने किया है। इस बच्ची की मां ने गुस्से या डांट-फटकार का रास्ता चुनने के बजाय एक बेहद समझदारी भरा कदम उठाया। उन्होंने बच्ची की रात की नींद और उसके सोने के रूटीन में बदलाव किया, जिससे महज 60 दिनों के भीतर बच्ची का व्यवहार पूरी तरह बदल गया और सुबह का ड्रामा हमेशा के लिए खत्म हो गया।

डांटने के बजाय रात के रूटीन पर दिया ध्यान

जब सात साल की बच्ची रोज सुबह स्कूल जाने के नाम पर कभी पेट में दर्द तो कभी थकान का बहाना बनाकर मां से जिद करने लगी, तो मां ने यह समझने की कोशिश की कि आखिर समस्या की जड़ कहां है। बाल रोग विशेषज्ञ डॉक्टर पवन मंदाविया के अनुसार, मां ने बच्ची को डांटने या जबरदस्ती करने के बजाय उसके रात के सोने के शेड्यूल पर ध्यान केंद्रित किया। उन्होंने देखा कि देर से सोने और नींद पूरी न होने की वजह से बच्ची सुबह थकान और चिड़चिड़ाहट महसूस करती थी। इसके बाद मां ने एक सख्त लेकिन प्यार भरा नियम बनाया कि बच्ची को हर हाल में रात 8 बजे तक सोने के लिए बिस्तर पर भेज दिया जाएगा और घर की लाइटें बंद कर दी जाएंगी।

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60 दिनों तक नियम में बिना किसी छूट के निरंतरता

इस नए रूटीन को लागू करना शुरुआत में बिल्कुल आसान नहीं था। 8 बजे बिस्तर पर जाने के बाद बच्ची सोने में देरी करने के लिए तरह-तरह के तरीके अपनाती थी। वह बार-बार पानी पीने के लिए उठती, बाथरूम जाने का बहाना बनाती या अलग-अलग बातें करके समय बिताने की कोशिश करती थी। लेकिन मां ने अपने नियम को बिना विचलित हुए लगातार बनाए रखा। सबसे खास बात यह रही कि मां ने इस नियम को केवल स्कूल वाले दिनों तक ही सीमित नहीं रखा। वीकेंड हो, छुट्टियां हों या फिर घर में मेहमान आए हुए हों, रात को सोने का समय हमेशा 8 बजे के आसपास ही रखा गया। धीरे-धीरे बच्ची के शरीर का बायोलॉजिकल क्लॉक इस समय के अनुसार ढलने लगा और उसे सही समय पर नींद आने लगी।

शांत माहौल और सकारात्मक दृष्टिकोण का असर

मां ने इस पूरे बदलाव के दौरान एक बहुत ही महत्वपूर्ण बात का ध्यान रखा। उन्होंने जल्दी सोने के नियम को बच्ची के सामने किसी सजा या पाबंदी की तरह पेश नहीं किया, बल्कि इसे रोजमर्रा की एक सामान्य और सुखद दिनचर्या का हिस्सा बनाया। सोने से कम से कम आधे से एक घंटे पहले घर का माहौल बिल्कुल शांत और तनावमुक्त रखा गया। स्क्रीन टाइम बंद कर दिया गया और धीमी गतिविधियों को बढ़ावा दिया गया ताकि बच्ची का दिमाग और शरीर आराम की स्थिति में आ सके। इस शांत वातावरण से बच्ची को बिना किसी तनाव के सोने में मदद मिली।

एक हफ्ते में दिखा शुरुआती बदलाव, 60 दिन में पूरा सुधार

लगातार इस रूटीन का पालन करने के महज एक हफ्ते के भीतर ही परिवार को बच्ची के व्यवहार में साफ फर्क नजर आने लगा। सुबह के समय बच्ची बिना किसी ज्यादा बहस के आसानी से उठने लगी। उसकी सुबह की चिड़चिड़ाहट, गुस्सा और स्कूल न जाने के बहाने धीरे-धीरे कम होते चले गए। इससे न केवल बच्ची का मूड अच्छा रहने लगा, बल्कि मां के लिए भी सुबह का समय तनावमुक्त और आसान हो गया। 60 दिनों के लगातार अभ्यास के बाद यह बच्ची की स्थायी आदत बन गई और सुबह का पूरा माहौल खुशनुमा हो गया।

पढ़ाई में एकाग्रता और क्लासरूम में दिखा बेहतर प्रदर्शन

डॉक्टर पवन मंदाविया ने बताया कि सही नींद का असर केवल सुबह उठने तक ही सीमित नहीं रहा, बल्कि कुछ हफ्तों के भीतर बच्ची की अटेंशन स्पैन और सीखने की क्षमता में भी बड़ा सुधार देखा गया। बच्ची अब पढ़ाई के दौरान लंबे समय तक ध्यान लगा पा रही थी। पहले जहां वह छोटी-छोटी बातों पर चिढ़ जाती थी या काम छोड़ देती थी, अब वह चुनौतियों का सामना करते हुए अपना काम पूरा करने का प्रयास करती थी। स्कूल में उसकी टीचर ने भी उसके व्यवहार, सक्रियता और ध्यान लगाने की क्षमता में आए इस सकारात्मक बदलाव को नोटिस किया और मां की तारीफ की।

माता-पिता के लिए डॉक्टर पवन मंदाविया की खास सलाह

इस मामले के जरिए डॉक्टर पवन मंदाविया ने सभी पेरेंट्स के लिए एक बेहद जरूरी संदेश दिया है। उनका कहना है कि जब भी बच्चा सुबह स्कूल जाने से मना करे या जिद करे, तो सबसे पहले उसे आलसी, जिद्दी या कामचोर मान लेना सही नहीं है। पेरेंट्स को यह गहराई से देखना चाहिए कि बच्चा रात में किस समय सो रहा है, उसकी नींद कितने घंटे की पूरी हो रही है और सोने से पहले उसका रूटीन कैसा रहता है। पर्याप्त नींद न मिलने पर बच्चे का मानसिक और शारीरिक संतुलन प्रभावित होता है, जिससे वह अगले दिन थका हुआ, चिड़चिड़ा और पढ़ाई में कमजोर महसूस कर सकता है।

नींद की समस्या और स्कूल फोबिया में अंतर समझें

डॉक्टर ने यह भी स्पष्ट किया कि हालांकि एक तय रूटीन बनाने से अधिकांश बच्चों की सुबह की समस्याएं हल हो जाती हैं, लेकिन हर बच्चे की स्थिति अलग हो सकती है। अगर कोई बच्चा किसी खास डर, अत्यधिक चिंता, स्कूल में बुलिंग या किसी अन्य गंभीर परेशानी की वजह से लगातार स्कूल जाने से बच रहा है, तो केवल सोने का समय बदलने से काम नहीं चलेगा। ऐसे मामलों में माता-पिता को बच्चे से शांत मन से बैठकर बात करनी चाहिए, उसकी बात को ध्यान से सुनना चाहिए और यदि आवश्यकता हो तो किसी पीडियाट्रिशियन या बाल विशेषज्ञ से परामर्श लेना चाहिए।

सवाल-जवाब

सात साल की बच्ची स्कूल जाने से क्यों मना करती थी?
बच्ची रात में सही समय पर न सोने के कारण सुबह थकान महसूस करती थी और पेट दर्द या चिड़चिड़ेपन का बहाना बनाकर स्कूल जाने से बचती थी।
मां ने बच्ची का व्यवहार बदलने के लिए क्या कदम उठाया?
मां ने डांटने के बजाय रात 8 बजे सोने का एक निश्चित रूटीन बनाया और उसे लगातार 60 दिनों तक बिना किसी छूट के लागू किया।
सोने का नया रूटीन लागू करते समय क्या चुनौतियां आईं?
शुरुआत में बच्ची बार-बार पानी मांगने, उठने और सोने में देरी करने के बहाने बनाती थी, लेकिन मां ने नियम नहीं बदला।
60 दिनों के सोने के नियम से बच्ची में क्या बदलाव दिखे?
बच्ची सुबह आसानी से उठने लगी, उसकी सुबह की चिड़चिड़ाहट खत्म हुई, और स्कूल में उसकी अटेंशन स्पैन तथा पढ़ाई में सुधार हुआ।
डॉक्टर पवन मंदाविया ने पेरेंट्स को क्या सलाह दी है?
डॉक्टर ने सलाह दी कि बच्चे को जिद्दी कहने से पहले उसकी नींद और सोने के रूटीन की जांच करें, तथा जरूरत पड़ने पर शांत होकर बात करें या विशेषज्ञ से सलाह लें।
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