वर्तमान दौर में माता-पिता अपनी संतान को बेहतर जीवन देने के लिए दिन-रात कड़ा परिश्रम कर रहे हैं। महंगे विद्यालयों में दाखिला, अत्याधुनिक गैजेट्स, ट्यूशन और तमाम सुख-सुविधाएं जुटाना हर परिवार की प्राथमिकता बन चुका है। लेकिन क्या कभी यह सवाल मन में आया है कि इन सब के बीच आप अपने घर के नौनिहाल की दुनिया में एक मुख्य अभिनेता की भूमिका निभा रहे हैं या फिर केवल एक दर्शक बनकर रह गए हैं? आधुनिक समय में परवरिश का यह नया पहलू काफ़ी चर्चा का विषय बना हुआ है। आइए गहराई से समझें कि आखिर पैसेंजर पेरेंटिंग क्या होती है और यह बच्चों के उज्ज्वल भविष्य तथा मानसिक विकास को किस प्रकार प्रभावित कर रही है।
सरल शब्दों में परिभाषित किया जाए तो पैसेंजर पेरेंट वे अभिभावक होते हैं जो किसी चलती हुई कार की पिछली सीट पर बैठे यात्री की भांति आचरण करते हैं। वाहन चाहे किसी भी मार्ग पर आगे बढ़े, कितनी भी तीव्र गति पकड़े या किसी गड्ढे में क्यों न जा गिरे, पीछे बैठे यात्री का कार्य केवल चुपचाप बैठे रहना होता है—गाड़ी का स्टेयरिंग व्हील उसके नियंत्रण में बिल्कुल नहीं होता। ठीक इसी प्रकार, जो माता-पिता अपनी संतान के दैनिक जीवन, उनकी भावनाओं, महत्वपूर्ण निर्णयों और गतिविधियों में सक्रिय रूप से हिस्सेदारी करने के बजाय दूर बैठकर सब कुछ तमाशे की तरह देखते रहते हैं, उन्हें इस श्रेणी में रखा जाता है। ये अभिभावक बच्चे की आर्थिक और भौतिक आवश्यकताएं जैसे फीस, परिधान और खान-पान तो बखूबी पूरे करते हैं, परंतु मानसिक एवं भावनात्मक जुड़ाव के मामले में वे बच्चे के जीवन से कोसों दूर होते हैं। बच्चों का लालन-पालन मात्र उनकी वित्तीय ज़रूरतें पूरी करना नहीं है, बल्कि उनके बचपन का एक सच्चा और खूबसूरत साथी बनना भी है।
कई बार लोग अनजाने में ही इस शैली के दायरे में आ जाते हैं। यदि आपके साथ भी कुछ खास लक्षण मेल खाते हैं, तो आपको तुरंत सतर्क होने की आवश्यकता है। जब भी बच्चा किसी बात पर चिढ़ता है या परेशान होता है, तो उसका ध्यान भटकाने के लिए तुरंत मोबाइल फोन या टैबलेट थमा दिया जाता है, ताकि उसकी देखभाल में कोई अतिरिक्त मेहनत न करनी पड़े। इसके अलावा, संवादहीनता एक बड़ा संकेत है। अभिभावकों के पास इतना समय भी नहीं बचता कि वे प्यार से यह पूछ सकें कि आज विद्यालय में उनका दिन कैसा बीता। बातचीत केवल ज़रूरी हिदायतों तक ही सीमित रह जाती है जैसे कि खाना खा लो या होमवर्क पूरा कर लो। बच्चे के मन में क्या चल रहा है, वह किस मानसिक तनाव से जूझ रहा है या उसके मित्र कौन हैं, इन बातों से कोई खास सरोकार नहीं रखा जाता। सब कुछ गैजेट्स और स्कूल के भरोसे छोड़ देना भी इसी का हिस्सा है, जहां यह मान लिया जाता है कि अच्छी जगह भेजने भर से सारी ज़िम्मेदारी खत्म हो गई।
इस प्रकार की परवरिश का बच्चों के मनोवैज्ञानिक और भावनात्मक विकास पर अत्यंत नकारात्मक प्रभाव पड़ता है। जब घर के भीतर ही माता-पिता का संबल और उचित मार्गदर्शन नहीं मिलता, तो बच्चा भीतर से खुद को अकेला महसूस करने लगता है। ऐसे बच्चों के भीतर आत्मविश्वास की भारी कमी देखने को मिलती है क्योंकि उन्होंने कभी अपने अभिभावकों को जीवन के उतार-चढ़ाव का सामना करते या सही सलाह देते हुए नहीं देखा होता। वे अपनी भावनाएं अपनों के सामने खुलकर व्यक्त नहीं कर पाते और कई बार सही मार्गदर्शन के अभाव में गलत संगत की ओर आकर्षित होने लगते हैं। सभी सुख-सुविधाएं होने के बावजूद भीतर की यह तन्हाई कम उम्र में ही तनाव और डिप्रेशन जैसी गंभीर समस्याओं को बुलावा दे देती है।
गलतियों से सबक लेकर समय रहते संभल जाना ही असली समझदारी है। यदि आपको भी इस बात का अहसास हो चुका है कि इस व्यस्त दिनचर्या में आप अनजाने में एक दर्शक माता-पिता की भूमिका में आ गए हैं, तो इसमें निराश होने की कोई बात नहीं है। परवरिश कोई पूर्णता का पैमाना नहीं है, बल्कि यह एक सतत सुधार की प्रक्रिया है। अपनी इस भूमिका में सकारात्मक बदलाव लाकर एक सक्रिय अभिभावक बनना बेहद आसान है, जिसके लिए केवल कुछ छोटे मगर असरदार कदमों को अपनाने की ज़रूरत होती है।
आज के डिजिटल युग में सबसे बड़ी चुनौती स्क्रीन से दूरी बनाना है। दिनभर की भागदौड़ से कम से कम आधा घंटा ऐसा निकालें जिसमें मोबाइल फोन, लैपटॉप और टेलीविजन पूरी तरह से दूर हों। इस निर्धारित समय के दौरान केवल और केवल अपनी संतान के साथ समय बिताएं, खेलें या सामान्य बातचीत करें। यह वह पल होना चाहिए जो किसी भी प्रकार की रुकावट के बिना पूरी तरह बच्चे को समर्पित हो। इसके अलावा, बच्चों को लगातार उपदेश देने या उनकी कमियां गिनाने के बजाय उनकी बात को धैर्यपूर्वक सुनने की आदत डालें। बच्चे को यह विश्वास दिलाएं कि उसकी हर छोटी-बड़ी बात, उसका डर और उसकी खुशी आपके लिए बहुत मायने रखती है। बिना चिल्लाए या डांटे उसकी समस्याओं को समझें ताकि वह बिना किसी भय के अपनी भावनाएं आपके समक्ष रख सके।
बच्चों की परवरिश का अर्थ केवल उनकी आर्थिक ज़रूरतें या विद्यालय की फीस चुकाना नहीं है। उनके स्कूल के प्रोजेक्ट्स, खेलकूद, कला या पसंदीदा गतिविधियों में रचनात्मक रूप से हाथ बंटाएं और उनके दैनिक रूटीन में वास्तविक रुचि प्रदर्शित करें। बच्चों को महंगी गाड़ियां, महंगे गैजेट्स या ढेरों खिलौने नहीं चाहिए, बल्कि उन्हें आपके बहुमूल्य समय, स्नेह और साथ की दरकार होती है। वे बचपन के कुछ खास पड़ाव में ही आपके साथ होते हैं, इसलिए उनके इन खूबसूरत वर्षों में उनके सच्चे साथी बनें।



















