फेशियल रिकग्निशन तकनीक के लिए मशहूर कंपनी क्लीयरव्यू एआई ने एक नया और गोपनीय प्रोटोटाइप तैयार किया है, जिसे इंक्वायरीआईक्यू नाम दिया गया है। यह टूल पुलिस अधिकारियों को किसी भी संदिग्ध व्यक्ति की डिजिटल मौजूदगी, सोशल मीडिया अकाउंट्स, रोजगार के इतिहास और व्यक्तिगत संपर्कों का पूरा ब्योरा कुछ ही मिनटों में जुटाकर देने में सक्षम है।
प्रोटोटाइप और एआई मॉडल का परीक्षण
विश्लेषण किए गए कोड के अनुसार, इस प्लेटफॉर्म के इंटरफेस में उम्र, लिंग और नस्ल जैसी जनसांख्यिकीय जानकारियां दर्ज करने का विकल्प दिया गया है ताकि सिस्टम बेहतर निर्णय ले सके। इस प्रणाली के परीक्षण के दौरान स्पेसएक्सएआई के एआई मॉडल्स का भी उपयोग किया गया है, जो एलन मस्क के स्वामित्व वाली कंपनी के अंतर्गत आते हैं। इसके अलावा अमेज़न बेडराॅक का विकल्प भी इसमें शामिल किया गया है, जिसके माध्यम से विभिन्न कंपनियों के मॉडल्स की कार्यक्षमता की जांच की जा सकेगी।
शीर्ष नेतृत्व में बदलाव और कंपनी का सफर
वर्ष 2017 में स्थापित इस कंपनी को शुरुआती दौर में पीटर थील से 2 हजार डॉलर का निवेश मिला था, जिसके बाद इसने अमेरिकी पुलिस विभागों के साथ अनुबंध करना शुरू किया था। वर्ष 2020 में न्यू यॉर्क टाइम्स की एक रिपोर्ट से खुलासा हुआ था कि कंपनी ने फेसबुक, यूट्यूब और वेन्मो जैसी वेबसाइटों से तीन अरब से अधिक तस्वीरें बिना अनुमति के जुटाई हैं। इसके संस्थापकों में शामिल होआन टोन-थट ने दिसंबर 2024 में मुख्य कार्यकारी अधिकारी के पद से इस्तीफा दे दिया और इसके बाद एमास काइलर ने पिछले साल अक्टूबर में यह पद संभाला।
डिजिटल छानबीन और गोपनीयता पर चिंताएं
विशेषज्ञों का मानना है कि इस प्रकार के उपकरण पुलिस अनुसंधान के तरीकों को पूरी तरह बदल सकते हैं, जिससे हफ्तों का काम मिनटों में हो जाएगा। जॉर्ज वाशिंगटन यूनिवर्सिटी के कानून के प्रोफेसर एंड्रयू ग्यूथ्री फर्ग्यूसन ने इसे डिजिटल खंगालने की प्रक्रिया बताया है, जो लोगों द्वारा इंटरनेट पर छोड़े गए डिजिटल निशानों को जोड़कर प्रोफाइल तैयार करती है। वहीं, बोस्टन यूनिवर्सिटी के गोपनीयता विशेषज्ञ वुड्रो हार्टजोग का कहना है कि इस तरह के साधनों से निगरानी पर लगने वाले व्यावहारिक अवरोध समाप्त हो जाते हैं।
मानव नियंत्रण और दस्तावेजों के सत्यापन की अनिवार्यता
क्लीयरव्यू एआई का कहना है कि यह प्रणाली केवल संभावित सुराग पेश करती है और किसी भी तथ्य की सत्यता तय करना पुलिस विश्लेषक का काम है। किसी भी परिणाम को स्वीकार करने से पहले अधिकारी को यह प्रमाणित करना होता है कि उसने स्वतंत्र रूप से इसकी पुष्टि की है। हालांकि कानूनी विशेषज्ञों का तर्क है कि इस तरह की तकनीक में एआई के भ्रमित होने या भ्रामक परिणाम देने का जोखिम बना रहता है, जिससे अदालती मामलों और साक्ष्यों की विश्वसनीयता पर भी असर पड़ सकता है।


















