नवजात शिशु के घर आते ही माता-पिता का पूरा ध्यान उसकी हर छोटी गतिविधि पर केंद्रित रहता है। कई बार सोते समय बच्चा अचानक होंठ हिलाने लगता है, उसके चेहरे पर प्यारी सी मुस्कान आ जाती है या वह अचानक कुछ सेकंड के लिए रोने जैसी आवाज निकालता है। ऐसे पलों को देखकर नए माता-पिता के मन में अक्सर यह सवाल उठता है कि क्या शिशु कोई सपना देख रहा है अथवा उसे किसी प्रकार की शारीरिक बेचैनी हो रही है। वास्तव में नवजात शिशुओं की नींद का स्वरूप वयस्कों की तुलना में बिल्कुल अलग होता है। उनके शारीरिक और मानसिक विकास के इस चरण में नींद के दौरान चेहरे के भाव बदलना, हल्की आवाजें निकालना या हाथ-पैर हिलाना पूरी तरह से स्वाभाविक और सामान्य जैविक प्रक्रिया का हिस्सा है।
नवजात शिशुओं की नींद वयस्कों से किस प्रकार भिन्न होती है
व्यस्कों के विपरीत नवजात बच्चे दिन और रात के अंतर को तुरंत नहीं समझ पाते हैं। जन्म के शुरुआती हफ्तों और महीनों में शिशुओं का बायोलॉजिकल क्लॉक यानी जैविक घड़ी पूरी तरह विकसित नहीं होती है। इस कारण उनकी नींद लगातार कई घंटों तक चलने के बजाय छोटे-छोटे हिस्सों में विभाजित रहती है। शिशु कुछ समय के लिए सोते हैं, फिर भूख लगने पर जागते हैं और स्तनपान या दूध पीने के पश्चात पुनः सो जाते हैं। इस शुरुआती चरण में शिशु का मस्तिष्क और तंत्रिका तंत्र तेजी से आकार ले रहा होता है। इसी विकास प्रक्रिया के कारण सोते समय बच्चे का शरीर पूरी तरह से स्थिर नहीं रहता, बल्कि उसमें विभिन्न प्रकार की सूक्ष्म गतिविधियां होती रहती हैं।
नींद में मुस्कुराने और चेहरे के भाव बदलने का वैज्ञानिक कारण
अक्सर अभिभावक यह मान लेते हैं कि सोते समय शिशु की मुस्कान किसी सुंदर सपने का परिणाम है। हालांकि बाल स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार नवजात अवस्था में नींद के दौरान मुस्कुराना अधिकांशतः एक अनैच्छिक रिफ्लेक्स गतिविधि होती है। सोते समय शिशु की चेहरे की मांसपेशियों में स्वतः संकुचन होता है, जिसके कारण वह अचानक मुस्कुरा सकता है, भौंहें सिकोड़ सकता है या अपने होंठ हिला सकता है। यह प्रक्रिया बच्चे के विकसित होते न्यूरोलॉजिकल सिस्टम और नींद के विभिन्न चरणों से जुड़ी होती है। विशेषकर एक्टिव स्लीप या आरईएम फेज के दौरान मस्तिष्क की सक्रियता के कारण चेहरे पर तरह-तरह के भाव उभरते हैं, जो इस बात का संकेत हैं कि शिशु का दिमाग सही तरीके से विकसित हो रहा है।
नींद के दौरान अजीब आवाजें निकालने और सांस की अनिश्चित गति का अर्थ
सोते हुए नवजात शिशुओं से कई प्रकार की हल्की आवाजें सुनाई देना आम बात है। कई बार बच्चा सोते-सोते हल्की सी गुनगुनाहट करता है, कराहने जैसी ध्वनि निकालता है या अचानक दो-तीन सेकंड के लिए रोने की आवाज देता है। इसके अतिरिक्त नवजात शिशुओं की सांस लेने की दर भी बड़ों की तरह एकसमान नहीं होती। कभी शिशु तेजी से सांस लेता महसूस होता है तो कभी उसकी सांस बहुत धीमी हो जाती है। यह अनियमितता उनके श्वसन तंत्र के क्रमिक विकास का परिणाम है। डॉक्टरों की सलाह है कि नींद में शिशु द्वारा निकाली गई हर छोटी आवाज पर माता-पिता को तुरंत घबराकर उसे उठाना नहीं चाहिए। यदि शिशु आराम से सांस ले रहा है और कुछ क्षणों में स्वयं शांत होकर सोने लगता है, तो कुछ समय केवल उस पर नजर रखना ही पर्याप्त होता है।
अचानक नींद में रोने पर माता-पिता को क्या कदम उठाना चाहिए
यदि शिशु नींद के दौरान अचानक रोना शुरू कर दे, तो सबसे पहले यह जांचना आवश्यक है कि वह वास्तव में जाग चुका है या अभी नींद की अवस्था में ही है। कई बार बच्चे आरईएम नींद के दौरान कुछ सेकंड के लिए रोते हैं और फिर बिना जागे खुद को शांत करके दोबारा गहरी नींद में चले जाते हैं। यदि शिशु लगातार रो रहा हो और शांत न हो रहा हो, तो उसकी मूलभूत आवश्यकताओं की जांच करनी चाहिए। शिशु को भूख लगी हो सकती है, उसका डायपर गीला या गंदा हो सकता है, अथवा उसे अधिक गर्मी या ठंड महसूस हो रही हो सकती है। ऐसे में शिशु को गोद में लेकर धीरे से थपथपाना, उसकी पीठ सहलाना और शांत तथा ममतामयी आवाज में उससे बात करना उसे सुरक्षित महसूस कराता है और शांत करने में मदद करता है।
किन गंभीर लक्षणों पर तुरंत बाल रोग विशेषज्ञ से संपर्क करें
यद्यपि नींद में आवाजें निकालना और मुस्कुराना सामान्य है, परंतु कुछ ऐसे संकेत भी हैं जिन्हें नजरअंदाज करना खतरनाक हो सकता है। यदि नींद के दौरान शिशु को सांस लेने में स्पष्ट कठिनाई होती दिखाई दे, उसकी सांस अचानक रुकती लगे, उसके होंठ या चेहरे का रंग नीला पड़ने लगे, शरीर में बार-बार असामान्य झटके आएं या शिशु अत्यधिक सुस्त और अनुत्तरदायी महसूस हो, तो इसे सामान्य नींद की गतिविधि न मानें। ऐसे किसी भी लक्षण के उभरने पर बिना समय गंवाए निकटतम बाल रोग विशेषज्ञ से परामर्श लेना अत्यंत आवश्यक है। नवजात शिशु की देखभाल में धैर्य और सतर्कता सबसे महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। समय के साथ माता-पिता अपने बच्चे के सोने के तरीके और उसकी विभिन्न शारीरिक संकेतों को बेहतर ढंग से समझने लगते हैं।



















