छोटे पर्दे पर अपनी बेहतरीन अदायगी से दर्शकों के दिलों में खास जगह बनाने वाली मशहूर अभिनेत्री स्नेहा वाघ इन दिनों अपनी जिंदगी के एक बिल्कुल नए और शांत पड़ाव पर हैं। उन्हें अब चकाचौंध और ग्लैमर की दुनिया से ज्यादा मानसिक शांति और सुकून की तलाश है। इसी सिलसिले में वह हाल ही में अपने नए टेलीविजन शो ‘महादेव एंड संस’ के प्रचार के लिए उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ पहुंची थीं। इस दौरान उन्होंने मीडिया से खुलकर बातचीत की और अपने निजी जीवन के संघर्षों, अध्यात्म की तरफ झुकाव, टूटे रिश्तों और अभिनय जगत में आए बड़े बदलावों के बारे में कई दिलचस्प बातें साझा कीं।
मुंबई की भागदौड़ से दूर अध्यात्म का सफर
स्नेहा वाघ अब अपना अधिकांश समय मुंबई के अलावा वृंदावन और मथुरा के छटीकरा में गुजारती हैं। उन्होंने अपने निजी जीवन के कड़े संघर्षों और दो टूटी हुई शादियों के दर्द का भी खुलकर जिक्र किया। अभिनेत्री ने बताया कि जिंदगी के एक दौर में उनका इंसानी रिश्तों से पूरी तरह भरोसा उठ चुका था। उन्हें ऐसा लगने लगा था कि इस दुनिया में हर शख्स किसी न किसी मतलबी रिश्ते से जुड़ा हुआ है। इसी गहरी निराशा और मानसिक उथल-पुथल के दौर में उन्होंने अध्यात्म का दामन थामा और ईश्वर की शरण में जाने का फैसला किया।
वृंदावन की पहली यात्रा और एक अनोखा अनुभव
अपनी पहली वृंदावन यात्रा को याद करते हुए स्नेहा ने बताया कि जब उन्हें किसी मंदिर की ओर से वहां आने का न्योता मिला था, तो उन्हें लगा था कि यह कोई स्कैम या धोखा है। लेकिन जब वह असल में वहां पहुंचीं, तो वहां बिताए महज तीन दिनों ने उनकी पूरी सोच और जीवन की दिशा ही बदल दी। उन्होंने कहा कि उन्हें इस बात का अहसास हुआ कि वह मुंबई की इस अंधी भागदौड़ के लिए नहीं बनी हैं। उन्हें बांके बिहारी के चरणों में और पावन वृंदावन की गलियों में जो अद्भुत शांति मिली, उसने उनकी भटकती आत्मा को पूरी तरह से तृप्त कर दिया।
ईश्वर की भक्ति में मिला बिना शर्त प्यार
दो असफल शादियों के बाद स्नेहा को जिस बिना शर्त और सच्चे प्यार की तलाश थी, वह उन्हें इंसानों में तो नहीं मिला, बल्कि भगवान की भक्ति में जरूर मिल गया। उन्होंने बेहद भावुक होते हुए कहा कि अब उन्हें किसी भी आम इंसानी रिश्ते की कोई आवश्यकता महसूस नहीं होती है, क्योंकि भगवान श्रीकृष्ण ने उनके दिल के हर सूनेपन और खालीपन को पूरी तरह भर दिया है। वह अपनी इस आध्यात्मिक दुनिया में इतनी ज्यादा संतुष्ट और खुश हैं कि वह अब इससे बाहर निकलने का बिल्कुल नहीं सोचती हैं।
भविष्य के रिश्तों पर क्या बोलीं अभिनेत्री
जब स्नेहा से यह सवाल किया गया कि क्या वह भविष्य में दोबारा शादी करने के बारे में सोचती हैं, तो उन्होंने मुस्कुराते हुए जवाब दिया कि उन्होंने अपनी जिंदगी में शादी के दरवाजे हमेशा के लिए बंद नहीं किए हैं। हालांकि, उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि उन्होंने अपने जीवन में एक निश्चित सीमा जरूर तय कर ली है। आने वाले कल में क्या होगा, इस बारे में कोई भी पुख्ता तौर पर कुछ नहीं कह सकता है।
सोशल मीडिया के आंकड़ों से परे है अभिनय का असली मोल
स्नेहा वाघ के लिए अभिनय की दुनिया में सफलता का मतलब सोशल मीडिया पर मिलने वाले लाइक्स या फॉलोअर्स की संख्या नहीं है, बल्कि सीधे तौर पर दर्शकों के दिलों को जीतना है। अपने शुरुआती करियर को याद करते हुए उन्होंने बताया कि जब उन्होंने एक्टिंग की दुनिया में कदम रखा था, तब उन्होंने किसी भी पेशेवर एक्टिंग स्कूल से कोई ट्रेनिंग नहीं ली थी। उन्होंने कैमरे के सामने काम करते-करते ही अभिनय की बारीकियों को सीखा। उनका कहना है कि आज भी जब कोई आम दर्शक उन्हें सड़क पर अचानक पहचान लेता है और अपना प्यार जताता है, तो वह पल उनके लिए किसी बड़ी उपलब्धि से कम नहीं होता है।
फैंस का अनोखा प्यार और हरदोई का एक किस्सा
उन्होंने एक वाकया साझा करते हुए बताया कि उत्तर प्रदेश के हरदोई में एक महिला उनके पास हाथ में गुलाब लेकर आई थी और उनसे अपने बेइंतहा प्यार का इजहार करते हुए फफक-फफक कर रोने लगी थी। स्नेहा के लिए दर्शकों का ऐसा निश्छल प्यार दुनिया के किसी भी बड़े अवॉर्ड से कहीं ज्यादा मूल्यवान है। उनका दृढ़ विश्वास है कि किसी भी कलाकार की असल पहचान उसके सोशल मीडिया फॉलोअर बेस से नहीं, बल्कि उसकी बेहतरीन कला और अभिनय से होनी चाहिए।
ओटीटी के दौर में टेलीविजन का मजबूत भविष्य
स्नेहा ने इस बात को स्वीकार किया कि वीडियो स्ट्रीमिंग प्लेटफॉर्म्स यानी ओटीटी के आने और कोविड-19 महामारी के बाद से टेलीविजन इंडस्ट्री के सामने कई नई और गंभीर चुनौतियां खड़ी हो गई थीं। उस वक्त कार्यक्रम निर्माताओं के सामने यह असमंजस था कि आखिर दर्शक अब किस तरह का कंटेंट देखना पसंद करेंगे। हालांकि, वक्त के साथ टीवी ने अपनी सबसे बड़ी और मूल ताकत को एक बार फिर अच्छी तरह पहचान लिया, जो कि पूरे परिवार के साथ बैठकर देखा जाने वाला पारिवारिक मनोरंजन है। उनका मानना है कि ओटीटी पर मौजूद हर सामग्री को परिवार के साथ बैठकर नहीं देखा जा सकता, जबकि टेलीविजन लंबे समय से भारतीय घरों में संपूर्ण पारिवारिक मनोरंजन का एक मजबूत माध्यम बना हुआ है।


















