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विभा शर्मा और डायना बॉमराइंड के शोध के आइने में समझें अत्यधिक सख्त पेरेंटिंग के 4 गंभीर प्रभावपेरेंटिंग
20 अग॰ 2026, 1:05 pm (57 मिनट पहले)· 2

विभा शर्मा और डायना बॉमराइंड के शोध के आइने में समझें अत्यधिक सख्त पेरेंटिंग के 4 गंभीर प्रभाव

पेरेंटिंग एक्सपर्ट विभा शर्मा और 1960 में मनोवैज्ञानिक डायना बॉमराइंड द्वारा किए गए अध्ययनों के अनुसार, जरूरत से ज्यादा सख्त माहौल बच्चों के आत्मविश्वास, निर्णय लेने की क्षमता और भावनात्मक विकास को प्रभावित कर सकता है।

घर में बच्चों के पालन-पोषण के दौरान अनुशासन और अत्यधिक नियंत्रण के बीच एक बेहद बारीक रेखा होती है। माता-पिता अक्सर बच्चों के बेहतर भविष्य की खातिर सख्त नियम लागू करते हैं, लेकिन अत्यधिक कठोर माहौल उनके मानसिक और सामाजिक विकास पर विपरीत प्रभाव डाल सकता है। पेरेंटिंग एक्सपर्ट विभा शर्मा का मानना है कि जरूरत से ज्यादा नियंत्रित वातावरण में पलने वाले बच्चों के व्यवहार में कई तरह की चुनौतियां उभरा सकती हैं। दरअसल, बच्चों के विकास पर माता-पिता के आचरण के प्रभाव को समझने की दिशा में वर्ष 1960 में मनोवैज्ञानिक डायना बॉमराइंड ने एक विस्तृत अध्ययन किया था। इस अध्ययन से यह स्पष्ट हुआ कि विभिन्न पेरेंटिंग स्टाइल बच्चों के व्यक्तित्व और उनके सामाजिक कौशल को गहराई से प्रभावित करती हैं, हालांकि प्रत्येक बच्चे पर इसका असर उसकी अपनी प्रकृति के अनुसार अलग-अलग हो सकता है।

1. मन की बात कहने में हिचकिचाहट और संकोच

जब किसी घर का माहौल केवल आदेश देने और जवाब मांगने तक सीमित हो जाता है, तो बच्चे स्वाभाविक रूप से अपनी भावनाओं को दबाने लगते हैं। ऐसे घरों में बच्चों को लगातार यह डर बना रहता है कि अगर वे अपनी बात रखेंगे या किसी बात पर असहमति जताएंगे तो उन्हें डांट-फटकार का सामना करना पड़ेगा। समय के साथ यह डर उनकी आदत बन जाता है। नतीजतन, ऐसे बच्चे बड़े होने के बाद भी अपने दोस्तों, स्कूल के शिक्षकों या आगे चलकर कार्यस्थल पर अपने सहकर्मियों और वरिष्ठों के सामने अपनी जरूरतों, विचारों और भावनाओं को स्पष्ट रूप से व्यक्त करने में भारी हिचकिचाहट महसूस करते हैं।

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2. निर्देशों का पालन करने में आगे, लेकिन नेतृत्व और फैसले लेने में पीछे

अत्यधिक सख्त माहौल में बड़े होने वाले बच्चों की एक खास विशेषता यह होती है कि वे नियमों का पालन करने में बहुत कुशल होते हैं। वे दिए गए निर्देशों का बिना किसी सवाल के पालन करते हैं, जिससे वे स्कूल या नौकरी में जिम्मेदार और अनुशासित नजर आ सकते हैं। हालांकि, जब उन्हें खुद कोई स्वतंत्र फैसला लेना होता है या किसी समूह का नेतृत्व करना पड़ता है, तो वे बेहद असहज हो जाते हैं। बचपन से हर छोटे-बड़े कदम पर निर्देश पाने के कारण उनके भीतर आत्म-विश्वास की कमी हो जाती है। वे अपनी निर्णय क्षमता पर भरोसा करने के बजाय लगातार दूसरों की मंजूरी और मार्गदर्शन पर निर्भर रहने लगते हैं।

3. घर में भावनात्मक सहारे की कमी और बाहर जुड़ाव की तलाश

सख्त पेरेंटिंग का एक बेहद संवेदनशील और महत्वपूर्ण पहलू भावनात्मक सुरक्षा से जुड़ा है। बच्चों को केवल सख्त कायदे-कानूनों की जरूरत नहीं होती, बल्कि उन्हें इस बात का अटूट भरोसा होना चाहिए कि किसी भी कठिन परिस्थिति में उनके माता-पिता उनका साथ देंगे और उनकी बात सुनेंगे। यदि घर के भीतर बच्चे को अपनी भावनाओं को व्यक्त करने की जगह नहीं मिलती, तो वह बड़ा होकर भावनात्मक जुड़ाव और स्वीकार्यता की तलाश घर से बाहर करने लगता है। हालांकि इसका मतलब यह नहीं है कि हर बच्चा किसी गलत राह पर ही चला जाएगा, लेकिन भावनात्मक उपेक्षा के कारण बच्चे अस्वस्थ संबंधों, गलत संगति और अनुचित प्रभावों के प्रति अधिक संवेदनशील हो जाते हैं।

4. असफलता और गलती करने का अत्यधिक भय

कठोर अनुशासन वाले माहौल में गलतियों को सीखने के अवसर के रूप में देखने के बजाय एक अपराध की तरह माना जाता है। इस कारण बच्चों के मन में विफलता का डर गहराई से बैठ जाता है और वे नई चीजों को आजमाने या जोखिम लेने से कतराने लगते हैं। परीक्षा में कम अंक आने, खेलकूद की किसी प्रतियोगिता में पिछड़ने या किसी भी काम में असफल होने का भय उनके आत्मविश्वास को बुरी तरह चोट पहुंचाता है। यदि कोई बच्चा लंबे समय तक उदास रहता है, खुद को दूसरों से अलग-थलग कर लेता है या अत्यधिक चिंता में दिखाई देता है, तो माता-पिता को इसे हल्के में नहीं लेना चाहिए और समय रहते बाल मनोवैज्ञानिक या विशेषज्ञ की सलाह लेनी चाहिए।

सख्त नियंत्रण के बजाय संवाद और भरोसे का संतुलन

बच्चों के पालन-पोषण में सख्ती और अनुशासन के बीच का अंतर समझना अत्यंत आवश्यक है। बच्चों के बेहतर मार्गदर्शन के लिए नियम तय करना और सीमाएं निर्धारित करना पूरी तरह से सही है, लेकिन उन नियमों के पीछे के कारणों को समझाना भी उतना ही जरूरी है। उदाहरण के लिए, यदि आप चाहते हैं कि बच्चा देर रात तक मोबाइल फोन का इस्तेमाल न करे, तो केवल फोन छीन लेने या डांटने से बात नहीं बनेगी। इसके बजाय बच्चे के साथ बैठकर नींद की अहमियत, उसकी पढ़ाई और स्क्रीन टाइम के नुकसानों पर खुलकर चर्चा की जानी चाहिए।

अच्छी पेरेंटिंग का मूल मंत्र यह है कि बच्चे को उसकी हर गलती पर दंडित करने के बजाय उसे सुधार करने और नया सीखने का मौका दिया जाए। जब बच्चे को यह विश्वास होता है कि उसके माता-पिता उसकी बात ध्यान से सुनेंगे, तब वह अपनी समस्याओं और परेशानियों को छिपाने के बजाय उनसे साझा करता है। इसलिए, हर माता-पिता को अपने घर में अनुशासन के साथ-साथ भरोसे, खुले संवाद और भावनात्मक सुरक्षा का स्वस्थ संतुलन बनाए रखना चाहिए।

सवाल-जवाब

सख्त पेरेंटिंग बच्चों के व्यवहार को कैसे प्रभावित करती है?
अत्यधिक सख्त माहौल में पले बच्चों में फैसले लेने में झिझक, अपनी भावनाएं न बता पाना और असफलता का ज्यादा डर देखा जा सकता है।
डायना बॉमराइंड ने पेरेंटिंग स्टाइल पर अध्ययन कब किया था?
मनोवैज्ञानिक डायना बॉमराइंड ने वर्ष 1960 में विभिन्न पेरेंटिंग स्टाइल का विस्तृत अध्ययन किया था।
क्या सख्त पेरेंटिंग से बच्चे अच्छे फॉलोअर बन जाते हैं?
हां, लगातार निर्देश मिलने के कारण बच्चे नियमों का पालन करने में कुशल हो जाते हैं, लेकिन उनमें स्वतंत्र निर्णय लेने और नेतृत्व क्षमता की कमी हो सकती है।
बच्चों में मोबाइल फोन के इस्तेमाल पर रोक लगाने का सही तरीका क्या है?
सिर्फ फोन छीनने के बजाय बच्चों से उनकी नींद, पढ़ाई और स्क्रीन टाइम के प्रभावों पर बातचीत करके नियम तय करने चाहिए।
अगर बच्चा लगातार उदास या चिंतित दिखे तो क्या करना चाहिए?
यदि बच्चा लंबे समय तक उदास, अलग-थलग या अत्यधिक चिंतित दिखाई दे, तो विशेषज्ञों या बाल मनोवैज्ञानिक की मदद लेनी चाहिए।
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