समाजवादी पार्टी के मुखिया अखिलेश यादव ने बुधवार को लखनऊ में हुई एक प्रेस कांफ्रेंस में अपने चर्चित PDA फॉर्मूले को एक बार फिर नया रंग दे दिया। इस बार उन्होंने फॉर्मूले के 'A' को आदिवासी समाज से जोड़ दिया। दिलचस्प बात यह है कि इससे पहले इसी 'A' को वे कभी अल्पसंख्यक तो कभी अगड़ा वर्ग से जोड़ चुके हैं, और अब इसका तीसरा मतलब आदिवासी बताया गया है।
अखिलेश यादव ने यह बड़ी घोषणा महारानी दुर्गावती के बलिदान दिवस के मौके पर की। उन्होंने ऐलान किया कि अगर 2027 में उनकी पार्टी की सरकार बनती है तो गोमती रिवर फ्रंट पर महारानी दुर्गावती की सोने की विशाल प्रतिमा लगवाई जाएगी।
आदिवासी समाज के लिए वादों की लंबी फेहरिस्त
सपा प्रमुख ने साफ कहा कि PDA का 'A' अब आदिवासी भाइयों के लिए है। उन्होंने भरोसा दिलाया कि आदिवासी समाज की जनगणना कराई जाएगी और आबादी के हिसाब से उन्हें हक और सम्मान दिलाने का काम होगा। अखिलेश के मुताबिक समाजवादी पार्टी की सरकार बनने पर आदिवासी समाज और गौड़ समाज की हर मांग पूरी की जाएगी, और इसके लिए अधिकारी खुद घर-घर पहुंचकर उनके प्रमाण पत्र बनाएंगे।
उन्होंने यह भी कहा कि आदिवासी समाज को न्याय दिलाने के लिए सीबीआई जांच तक कराई जाएगी। वन अधिकार कानून के तहत आदिवासी लोगों को उनका अधिकार मिलेगा और लोहिया आवास के साथ मुफ्त सोलर पैनल भी दिया जाएगा। इतना ही नहीं, अनुसूचित जनजाति को आरक्षण और रोजगार देने का वादा भी किया गया।
शिक्षा और भवन को लेकर बड़े ऐलान
अखिलेश यादव ने ऐलान किया कि अखिल भारतीय गौड़ महासभा के लिए एक PDA भवन भी बनाया जाएगा, जिसमें सभी सुख-सुविधाएं मौजूद होंगी। शिक्षा को लेकर उन्होंने वादा किया कि केजी से लेकर पीजी तक मुफ्त पढ़ाई की व्यवस्था होगी, और अगर किसी को पढ़ाई के लिए विदेश भेजने की जरूरत पड़ी तो समाजवादी पार्टी की ओर से उसका इंतजाम किया जाएगा।
कौन थीं महारानी दुर्गावती
महारानी दुर्गावती गोंडवाना साम्राज्य की बेहद साहसी वीरांगना थीं, जिन्होंने मुगल शासक अकबर से लोहा लिया था। उनका जन्म 5 अक्टूबर 1524 को उत्तर प्रदेश के बांदा जिले में स्थित ऐतिहासिक कालिंजर किले में हुआ था। वे चंदेल वंश के प्रतापी राजा कीर्तिसिंह चंदेल की इकलौती संतान थीं।
साल 1542 में उनका विवाह गोंड वंश के राजा संग्राम शाह के बेटे दलपत शाह से हुआ। दलपत शाह की असमय मृत्यु के बाद रानी ने अपने अल्पायु पुत्र वीर नारायण को गद्दी पर बैठाया और गोंडवाना राज्य की बागडोर खुद अपने हाथों में संभाल ली। उन्होंने अकबर की सेना को कड़ी टक्कर दी और जीते-जी कभी आत्मसमर्पण नहीं किया।













