डोनाल्ड ट्रंप ने कई दिनों तक मिसाइल हमले करके ईरान के साथ टकराव को दोबारा भड़का दिया, और अब इस जंग का सैन्य खर्च बेहद बड़ा शक्ल लेता दिख रहा है। मामले की सीधी जानकारी रखने वाले अधिकारियों के मुताबिक, अमेरिकी खुफिया अधिकारियों का अनुमान है कि पेंटागन के लिए इस युद्ध का कुल खर्च 100 अरब डॉलर के पार जा सकता है।
मई के आखिर तक ये अधिकारी ऑपरेशन एपिक फ्यूरी का कुल खर्च 50 से 100 अरब डॉलर के बीच आंक रहे थे। यह अनुमान कांग्रेस में घूम रहे गोपनीय आकलनों से भी मेल खाता है, जिनमें अब तक का खर्च करीब 80 अरब डॉलर बताया गया।
पक्का आंकड़ा अब तक क्यों नहीं
ट्रंप प्रशासन ने ईरान युद्ध पर अपने खर्च के आंकड़े सार्वजनिक नहीं किए हैं। जून में व्हाइट हाउस ने जंग के कुछ खर्चों को पूरा करने के लिए 88 अरब डॉलर की मांग रखी थी, लेकिन असल खर्च इससे भी ज्यादा है।
आखिरी आंकड़ा सामने न आने की एक बड़ी वजह यह है कि पेंटागन ने अब तक यह तय नहीं किया है कि जंग में तबाह हुए या मरम्मत लायक न बचे सभी विमानों को दोबारा खरीदा जाएगा या नहीं। रक्षा अधिकारियों ने सांसदों को बताया है कि अगर वे कुछ विमानों को दोबारा लेने का फैसला नहीं करते, तो उनके लिए पैसे भी नहीं मांगे जाएंगे, और इस तरह वह नुकसान युद्ध के आधिकारिक खर्च में कभी जुड़ेगा ही नहीं। यही वजह है कि जो बिल आगे सामने आएगा, वह भी पूरी तस्वीर नहीं दिखाएगा।
इस पूरे ब्योरे पर वॉर डिपार्टमेंट के एक अधिकारी ने सिर्फ इतना कहा, "फिलहाल हमारे पास बताने के लिए और कुछ नहीं है।"
विमान और ड्रोन का नुकसान बढ़ता जा रहा
गैर-पक्षपाती कांग्रेसनल रिसर्च सर्विस की 20 मई की एक रिपोर्ट, जो पूरी तरह सार्वजनिक रूप से उपलब्ध जानकारी के आधार पर तैयार की गई थी, में सामने आया कि टकराव शुरू होने के बाद से अमेरिका कम से कम 17 मानवयुक्त विमान और 25 ड्रोन गंवा चुका है।
इसी रिपोर्ट में यह भी दिखा कि ड्रोन का नुकसान लगातार बढ़ रहा है, और इन्हें दोबारा जुटाना बिल्कुल भी सस्ता नहीं है। गिराए गए 25 ड्रोन में एक MQ-4C ट्राइटन भी शामिल था, जो नौसेना का ऊंचाई पर उड़ने वाला निगरानी विमान है और जिसकी एक इकाई की कीमत 600 मिलियन डॉलर से भी ज्यादा है। ऐसे महंगे उपकरणों का नुकसान अकेले ही खर्च का पहाड़ खड़ा कर देता है।
क्षतिग्रस्त ठिकाने बिल और बढ़ा सकते हैं
क्षेत्र में अमेरिकी सैन्य ठिकानों की मरम्मत भी महंगी साबित होगी। अमेरिकी हमलों के जवाब में ईरान ने जवाबी मिसाइलें और एकतरफा हमलावर ड्रोन दागे, जिनसे कई ठिकानों को भारी नुकसान पहुंचा।
बंद दरवाजों के पीछे रक्षा अधिकारियों ने सांसदों से कहा है कि उन्होंने अभी मरम्मत के खर्च का हिसाब नहीं लगाया है और शायद कभी न लगाएं, क्योंकि हो सकता है अमेरिका इनमें से कुछ ठिकानों को पूरी तरह बंद ही कर दे, अगर वे ईरानी हमलों के सामने बहुत कमजोर साबित होते हैं।
ईरान मध्य पूर्व के कई अहम ठिकानों को एक से ज्यादा बार निशाना बना चुका है, जिनमें बहरीन के नेवल सपोर्ट एक्टिविटी में मौजूद अमेरिकी नौसेना की फिफ्थ फ्लीट का मुख्यालय भी शामिल है। पेंटागन ने इस हमले को सार्वजनिक तौर पर कभी स्वीकार नहीं किया।
अब तक का इकलौता सार्वजनिक आंकड़ा
किसी वरिष्ठ रक्षा अधिकारी की ओर से आया अकेला आधिकारिक आंकड़ा तत्कालीन कार्यवाहक पेंटागन कंट्रोलर जे हर्स्ट का है, जिन्होंने मई में एक निगरानी सुनवाई में कहा था कि युद्ध पर खर्च करीब 29 अरब डॉलर तक पहुंच चुका है।
मंगलवार को स्थायी रूप से कंट्रोलर बनने के लिए हुई अपनी नामांकन सुनवाई में हर्स्ट ने ताजा आंकड़ा देने से इनकार कर दिया। उन्होंने बताया कि वह 29 अरब डॉलर मुख्य रूप से गोला-बारूद और मध्य पूर्व के आसपास दो अमेरिकी विमानवाहक पोतों को चलाते रहने में लगने वाले ईंधन जैसे खर्चों का था।
"गोल्ड ईगल" नाम की नई साइबर कवायद
इसी मंगलवार को ट्रंप प्रशासन ने एक ऐसा केंद्र शुरू किया, जिसका मकसद सॉफ्टवेयर की खामियों को ढूंढकर ठीक करना है, इससे पहले कि दुश्मन ताकतें सबसे शक्तिशाली AI मॉडलों की मदद से उन्हें हैक कर सकें।
"गोल्ड ईगल" नाम के इस केंद्र को साइबरसिक्योरिटी एंड इंफ्रास्ट्रक्चर सिक्योरिटी एजेंसी चलाएगी, जो इन खामियों को पहचानने के लिए खुद ऐसे AI मॉडलों का इस्तेमाल करेगी, जो आम जनता के लिए उपलब्ध नहीं हैं।
गोल्ड ईगल ट्रंप के 2 जून के कार्यकारी आदेश के तहत उठाया गया पहला बड़ा कदम है। इस आदेश का मकसद उन्नत AI सिस्टम से पैदा हो रहे तेजी से बढ़ते खतरे पर निगरानी का ढांचा तैयार करना है।
असली इम्तिहान अभी आगे है
प्रशासन के सामने मुश्किल काम अभी बाकी है। यही कार्यकारी आदेश अधिकारियों को यह भी कहता है कि वे एक गोपनीय बेंचमार्किंग प्रक्रिया बनाएं, ताकि किसी AI मॉडल के जारी होने से पहले उसकी क्षमताओं को परखा जा सके और तय किया जा सके कि उस पर पाबंदियां लगनी चाहिए या नहीं।
यह कदम इसलिए अहम है क्योंकि अब तक प्रशासन एंथ्रोपिक जैसी कंपनियों पर दबाव डालकर AI उद्योग को काबू में रखता आया है, ताकि वे मिथोस जैसे अपने सबसे शक्तिशाली मॉडलों की क्षमता को आम इस्तेमाल के लिए सीमित रखें।
उद्योग के जानकारों का मानना है कि अगले छह से 12 महीनों में चीन AI की इस दौड़ में बराबरी कर लेगा और ऐसे मॉडल सार्वजनिक रूप से जारी करने लगेगा, जो उतने ही ताकतवर होंगे लेकिन अमेरिकी सरकार के प्रति जवाबदेह नहीं होंगे। यह अब भी साफ नहीं है कि प्रशासन इन मॉडलों को गलत मंसूबे वाले लोगों के हाथों संवेदनशील सिस्टम में सेंध लगाने से कैसे रोकेगा।











