उत्तर प्रदेश के सियासी गलियारों में मायावती का सफर किसी रोमांचक कहानी से कम नहीं है। अपने राजनीतिक जीवन के दौरान वह चार बार राज्य की मुख्यमंत्री पद पर आसीन हुईं, लेकिन उनके पूरे सफर का सबसे बड़ा और चर्चित पड़ाव वर्ष 1995 का वह दौर था जब वह पहली बार सत्ता के शीर्ष पर पहुंची थीं। उस समय उनकी उम्र लगभग 39 वर्ष थी। खास बात यह थी कि उनकी यह सरकार न तो खुद के बूते पर वजूद में आई थी, न ही समाजवादी पार्टी के सहयोग से और न ही कांग्रेस के समर्थन से, बल्कि भारतीय जनता पार्टी के साथ मिलकर बनाई गई थी। उस समय की राजनीतिक उठापटक ने उत्तर प्रदेश की सियासत की दिशा और दशा दोनों को पूरी तरह से बदलकर रख दिया था।
कांशीराम के संपर्क में आने से बदला जीवन
मायावती का राजनीति का रास्ता जरा भी आसान नहीं था। शुरुआती दिनों में दिल्ली में पढ़ाई और नौकरी के सिलसिले के दौरान उनकी मुलाकात कांशीराम से हुई। कांशीराम ने ही उन्हें राजनीति में आने के लिए प्रेरित किया, जिसके बाद वह बहुजन समाज पार्टी के साथ सक्रिय तौर पर जुड़ गईं। साल 1984 में कांशीराम ने बहुजन समाज पार्टी की स्थापना की और मायावती धीरे-धीरे पार्टी का एक प्रमुख चेहरा बनती चली गईं। उनकी पहचान मुख्य रूप से दलित समाज की एक बेबाक और मुखर नेता के रूप में स्थापित होने लगी। इसके बाद साल 1989 के लोकसभा चुनाव में मायावती ने बिजनौर सीट से शानदार जीत दर्ज की, जिससे राष्ट्रीय राजनीति में उनका कद तेजी से उभरने लगा।
मुलायम सिंह यादव और कांशीराम का वह गठबंधन
राजनीतिक घटनाक्रम आगे बढ़ते हुए वर्ष 1993 के विधानसभा चुनाव तक पहुंचता है। उस वक्त उत्तर प्रदेश में भारतीय जनता पार्टी सबसे ताकतवर राजनीतिक दल के रूप में सामने आई थी। हालांकि चुनाव के बाद समीकरण बदले और मुलायम सिंह यादव तथा कांशीराम ने एक साथ आने का फैसला किया। समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी ने मिलकर सरकार का गठन किया, जिसमें मुलायम सिंह यादव मुख्यमंत्री बने और मायावती की पार्टी इस सरकार में साझीदार बनी। लेकिन दोनों दलों की यह जोड़ी ज्यादा दिनों तक साथ नहीं चल सकी। समय के साथ दोनों के बीच दूरियां बढ़ती गईं और अंततः यह गठबंधन टूट गया, जिसने सूबे में एक नए राजनीतिक संकट को जन्म दिया।
2 जून 1995 का वह बड़ा सियासी मोड़
वर्ष 1995 में उत्तर प्रदेश के राजनीतिक पटल पर एक ऐसा घटनाक्रम हुआ जिसने पूरे देश का ध्यान अपनी ओर खींच लिया। मायावती ने मुलायम सिंह यादव के नेतृत्व वाली सरकार से अपना समर्थन वापस लेने का कड़ा निर्णय लिया। इस कदम के बाद राज्य में सत्ता का पूरा समीकरण रातों-रात बदल गया। मायावती ने सरकार बनाने का दावा पेश कर दिया, लेकिन उनके पास अकेले अपने दम पर बहुमत का आंकड़ा नहीं था। यहीं से भारतीय जनता पार्टी की भूमिका इस पूरी कहानी में बहुत अहम हो गई।
बीजेपी के समर्थन से खुला मुख्यमंत्री का रास्ता
उस नाजुक दौर में भारतीय जनता पार्टी ने मायावती को समर्थन देने का बड़ा फैसला किया। बीजेपी के इस समर्थन के मिलते ही मायावती के मुख्यमंत्री बनने का रास्ता पूरी तरह साफ हो गया। इसके अगले ही दिन यानी 3 जून 1995 को मायावती ने उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री पद की शपथ ली और इसी के साथ वह राज्य की पहली दलित महिला मुख्यमंत्री बन गईं। भारतीय लोकतंत्र और राजनीति के इतिहास में यह एक अत्यंत ऐतिहासिक पल था। देश के सबसे बड़े और राजनीतिक रूप से संवेदनशील राज्य की सत्ता के सर्वोच्च पद पर एक दलित महिला का पहुंचना अपने आप में एक बहुत बड़ी राजनीतिक घटना थी।
छोटा रहा पहला कार्यकाल और राष्ट्रपति शासन
हालांकि मायावती का यह पहला कार्यकाल बहुत लंबा नहीं चल सका। बीजेपी के समर्थन से वजूद में आई उनकी यह सरकार लगभग चार महीने ही टिक पाई। अक्टूबर 1995 में किसी वजह से उनकी सरकार गिर गई और इसके तुरंत बाद उत्तर प्रदेश में राष्ट्रपति शासन लागू कर दिया गया। लेकिन इन कुछ महीनों के छोटे से कार्यकाल में भी मायावती ने अपनी प्रशासनिक और राजनीतिक क्षमता का ऐसा परिचय दिया कि आने वाले समय में वह यूपी की सियासत की सबसे कद्दावर और ताकतवर नेताओं में शुमार हो गईं।
बीजेपी और बीएसपी के रिश्तों की शुरुआत
साल 1995 का यह राजनीतिक प्रयोग केवल मायावती के व्यक्तिगत करियर के लिए ही महत्वपूर्ण नहीं था, बल्कि इसने भारतीय जनता पार्टी और बहुजन समाज पार्टी के बीच नए राजनीतिक रिश्तों की भी नींव रखी। आने वाले वर्षों में दोनों दलों के बीच कई मौकों पर गठबंधन देखने को मिला। कभी मायावती ने बीजेपी के समर्थन से सरकार चलाई तो कभी बीजेपी ने मायावती की सरकार को समर्थन दिया। यूपी की राजनीतिक गलियारों में यह गठजोड़ उस दौर के सबसे चर्चित और दिलचस्प अध्यायों में गिना जाता है।
पूर्ण बहुमत से लेकर सत्ता के सफर तक
वर्ष 1995 के बाद मायावती ने तीन और बार उत्तर प्रदेश की कमान संभाली। वह साल 1997 में भी मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठीं और इसके बाद वर्ष 2002 में एक बार फिर बीजेपी के समर्थन से उनकी सरकार बनी, हालांकि साल 2003 में बीजेपी ने अपना समर्थन वापस ले लिया और उनकी सरकार चली गई। इसके बाद आया साल 2007, जब मायावती ने किसी के भी सहारे के बिना अपने दम पर पूर्ण बहुमत हासिल किया। यह उनके राजनीतिक जीवन का सबसे स्वर्णिम और मजबूत दौर था, जब उन्होंने पूरे पांच साल का कार्यकाल सफलतापूपर्वक पूरा किया। जिस महिला ने अपने सफर की शुरुआत में दूसरों के समर्थन से सत्ता संभाली थी, उसने बाद में अपने बूते पर सरकार बनाकर सभी को चौंका दिया।























