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अमेरिकी चुनावी सिस्टम में भारत जैसे सुधारों की मांग क्यों तेज हुई?राजनीति
18 अग॰ 2026, 3:23 pm (1 घंटे पहले)· 1

अमेरिकी चुनावी सिस्टम में भारत जैसे सुधारों की मांग क्यों तेज हुई?

डोनाल्ड ट्रंप ने सोशल मीडिया पर भारतीय चुनाव प्रणाली की तारीफ करते हुए 'द सेव अमेरिका एक्ट' को तुरंत लागू करने की वकालत की है। इसके बाद अमेरिकी और भारतीय चुनावी प्रक्रियाओं के अंतर पर चर्चा छिड़ गई है।

अमेरिकी राजनीतिक गलियारों में भारतीय लोकतंत्र की कार्यप्रणाली को लेकर नए सिरे से बहस छिड़ गई है, जिसकी मुख्य वजह शीर्ष स्तर पर हुई एक खास सोशल मीडिया टिप्पणी है। डोनाल्ड ट्रंप ने अपने आधिकारिक ट्रू प्लेटफॉर्म अकाउंट पर एक पोस्ट साझा की, जिसमें उन्होंने दुनिया के सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश भारत की चुनाव व्यवस्था की खुलकर सराहना की। इस पोस्ट में उन्होंने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के उस सवाल का जिक्र किया जिसमें अमेरिकी प्रशासन से यह पूछा गया था कि बिना किसी वैध पहचान पत्र के अमेरिका में मतदान कैसे कराया जा सकता है। इस बात पर जोर दिया गया कि भारत के पिछले आम चुनावों में 64,60,00,000 यानी 64.6 करोड़ से अधिक मतदाताओं ने अपने मताधिकार का इस्तेमाल किया था।

द सेव अमेरिका एक्ट और उसकी जरूरत

इस पूरी चर्चा के केंद्र में एक नया विधायी प्रस्ताव है जिसे द सेव अमेरिका एक्ट का नाम दिया गया है। डोनाल्ड ट्रंप ने इस विधेयक को तुरंत पारित कराने की जोरदार वकालत की है। व्हाइट हाउस की आधिकारिक वेबसाइट पर इस प्रस्ताव के उद्देश्यों और प्रावधानों को विस्तार से समझाया गया है। इस विधेयक के समर्थकों का कहना है कि अमेरिकी नागरिकों को ही अमेरिकी चुनावों के भविष्य का फैसला करना चाहिए। रिपब्लिकन और डेमोक्रेट्स दोनों खेमों से इस कानून को समर्थन देने की अपील की जा रही है ताकि मतदान प्रक्रिया को अधिक पारदर्शी और सुरक्षित बनाया जा सके।

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प्रस्तावित कानून के मुख्य प्रावधान

द सेव अमेरिका एक्ट के तहत कई कड़े नियम लागू करने की रूपरेखा तैयार की गई है। इस विधेयक के लागू होने पर संघीय चुनावों में मतदाता के रूप में पंजीकरण कराने से पहले वैध पहचान पत्र दिखाना अनिवार्य हो जाएगा। इसके साथ ही नागरिकता का पुख्ता प्रमाण देना भी जरूरी किया जाएगा। इस कानून के तहत पोस्टल या मेल-इन बैलेट के जरिए मतदान की सुविधा को लगभग समाप्त कर दिया जाएगा, सिवाय उन चुनिंदा मामलों के जहां मतदाता गंभीर बीमारी, शारीरिक विकलांगता, सैन्य सेवा या फिर यात्रा पर होने के कारण मतदान केंद्र तक नहीं पहुंच सकते हैं।

मतदाता सूची से जुड़े सुधार

इस प्रस्तावित अधिनियम का एक अहम हिस्सा मतदाता सूचियों की शुचिता से जुड़ा हुआ है। यह कानून अमेरिकी राज्यों को यह निर्देश देगा कि वे मतदाता सूचियों से उन सभी लोगों के नाम बाहर करें जो देश के नागरिक नहीं हैं। इसके समर्थकों का तर्क है कि बुनियादी और आवश्यक चुनाव सुरक्षा उपायों को अपनाने के मामले में अमेरिका दुनिया के कई अन्य देशों से पीछे चल रहा है।

वैश्विक स्तर पर चुनावी सुरक्षा के अलग-अलग पैमाने

तुलनात्मक रूप से देखा जाए तो अन्य लोकतांत्रिक देश चुनावी शुचिता के मामले में बहुत आगे हैं। भारत और ब्राजील जैसे देश अपने मतदाता पहचान पत्रों को बायोमेट्रिक डेटाबेस के साथ मजबूती से जोड़ते हैं, जबकि इसके विपरीत अमेरिका में आज भी नागरिकता के लिए मुख्य रूप से स्व-सत्यापन की व्यवस्था पर ही निर्भर रहना पड़ता है। जर्मनी और कनाडा जैसे राष्ट्र वोटों की गिनती की पूरी प्रक्रिया के दौरान पूरी तरह से पेपर बैलेट की मांग करते हैं, लेकिन अमेरिकी प्रणाली में बुनियादी चैन-ऑफ-कस्टडी सुरक्षा उपायों की भारी कमी महसूस की जाती है।

इसके अलावा डेनमार्क और स्वीडन जैसे यूरोपीय देश समझदारी का परिचय देते हुए पोस्टल मतदान की सुविधा को केवल उन्हीं विशेष नागरिकों तक सीमित रखते हैं जो किसी वाजिब वजह से व्यक्तिगत रूप से मतदान केंद्र पर आने में असमर्थ होते हैं। साथ ही इन देशों में देर से आने वाले वोटों की गिनती पर सख्त पाबंदी है, जबकि अमेरिकी चुनावों में मतदान का दिन बीत जाने के बाद भी बड़े पैमाने पर मेल-इन वोटों के आने और उनकी गिनती का सिलसिला जारी रहता है।

अमेरिकी चुनाव प्रणाली की बुनियादी कमियां

अमेरिका की चुनावी व्यवस्था में कई ऐसी संरचनात्मक समस्याएं हैं जो अक्सर विवादों का कारण बनती हैं। सबसे पहले, वहां नियमों का विकेंद्रीकृत होना एक बड़ी चुनौती है क्योंकि अमेरिका के 50 अलग-अलग राज्यों में वोटिंग के अपने नियम कायदे हैं। पहचान पत्र के प्रमाण से लेकर रजिस्ट्रेशन और मेल-इन बैलेट तक के नियम हर राज्य में अलग हैं, जिससे नागरिकों के बीच भ्रम और अविश्वास की स्थिति पैदा होती है।

दूसरी बड़ी समस्या धीमी मतगणना और उससे जुड़े विवाद हैं। पोस्टल बैलेट पेपर्स की बहुतायत के कारण चुनाव के नतीजे आने में कई-कई दिन और कभी-कभी हफ्ते तक का समय लग जाता है। परिणामों में इस तरह की लंबी देरी के कारण नतीजों में धांधली होने के गंभीर आरोप लगने लगते हैं और अदालती मुकदमों की संख्या में भी भारी इजाफा होता है। इसके अलावा इलेक्टोरल कॉलेज का जटिल पेच भी हमेशा चर्चा में रहता है, जिसकी वजह से कई बार वह उम्मीदवार भी राष्ट्रपति पद की दौड़ जीत जाता है जिसे पूरे देश में सबसे ज्यादा पॉपुलर वोट यानी जनमत नहीं मिला होता है, जैसा कि साल 2016 में भी देखने को मिला था।

भारत और अमेरिका के मॉडलों में जमीन-आसमान का फर्क

भारत और अमेरिका की मतदान पद्धतियों में बुनियादी अंतर साफ नजर आता है। भारत में करोड़ों की विशाल आबादी होने के बावजूद इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों के इस्तेमाल से एक ही दिन के भीतर पूरी तरह पारदर्शी और शांतिपूर्ण तरीके से नतीजे सामने आ जाते हैं। इसके विपरीत अमेरिका में लंबी चलने वाली मतगणना जनता का लोकतांत्रिक प्रक्रिया पर से धीरे-धीरे भरोसा कम करने लगती है।

भारत में एक केंद्रीय और पूरी तरह स्वतंत्र संस्था यानी भारत निर्वाचन आयोग देश भर में एक समान और निष्पक्ष नियमों के तहत चुनाव संपन्न कराती है। वहीं अमेरिका में राजनीतिक दल अपने-अपने राज्यों में राजनीतिक सुविधा के हिसाब से नियमों में बदलाव करते रहते हैं। भारत में वोटर आईडी कार्ड और वीवीपैट पर्ची की मौजूदगी फर्जी मतदान की गुंजाइश को लगभग शून्य कर देती है, जबकि अमेरिका में फोटो आईडी की अनिवार्यता और मेल-इन बैलेट की सुरक्षा को लेकर हमेशा राजनीतिक खींचतान बनी रहती है। यही वजह है कि भारत की यह तकनीकी रूप से उन्नत और केंद्रीकृत व्यवस्था अमेरिका के विचारकों और राजनेताओं को आकर्षित करती है।

सवाल-जवाब

डोनाल्ड ट्रंप ने किस सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर भारत की चुनाव प्रणाली की तारीफ की?
डोनाल्ड ट्रंप ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ट्रू पर भारत की चुनाव प्रक्रिया की प्रशंसा की।
भारत के पिछले चुनावों में कितने मतदाताओं ने हिस्सा लिया था?
भारत के पिछले चुनाव में 64,60,00,000 यानी 64.6 करोड़ मतदाताओं ने मतदान किया था।
द सेव अमेरिका एक्ट का मुख्य उद्देश्य क्या है?
इस विधेयक का मुख्य उद्देश्य संघीय चुनावों में पंजीकरण के लिए वैध पहचान पत्र और नागरिकता का प्रमाण अनिवार्य करना है।
अमेरिका और भारत की चुनाव प्रणालियों में सबसे बड़ा अंतर क्या है?
भारत में एक केंद्रीय आयोग द्वारा ईवीएम के जरिए एक ही दिन में नतीजे आ जाते हैं, जबकि अमेरिका में विकेंद्रीकृत नियम और पोस्टल बैलेट के कारण मतगणना लंबी चलती है।
संपादकीय नीति सुधार नीति

टिप्पणियाँ 2

Ravikash Gupta@ravikash·48 मिनट पहले

भारतीय चुनाव प्रणाली की विशालता और बायोमेट्रिक डेटाबेस आधारित सुरक्षा पर अमेरिकी राजनीतिक गलियारों में हो रही यह चर्चा वैश्विक वित्तीय और कूटनीतिक दृष्टिकोण से बेहद अहम है। यदि 'द सेव अमेरिका Act' पारित होता है, तो इससे अमेरिकी चुनावी तंत्र में कड़े पहचान पत्र और नागरिकता के प्रमाण जैसे नियम लागू होंगे। दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के प्रशासनिक मॉडल का इस तरह वैश्विक स्तर पर रेखांकित होना यह बताता है कि आने वाले समय में लोकतांत्रिक और तकनीकी मानकों पर देशों के बीच तुलनात्मक नीतिगत बदलाव और तेज होंगे।

Karan Malhotra@karan-malhotra·48 मिनट पहले

एक क्राइम और कानूनी मामलों के संवाददाता के तौर पर मेरा मानना है कि चुनावी प्रक्रिया में पहचान पत्र और नागरिकता की अनिवार्यता केवल प्रशासनिक सुधार नहीं, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा और डेटा अखंडता का गंभीर कानूनी विषय है। अमेरिकी प्रणाली में स्व-सत्यापन की निर्भरता और मेल-इन बैलेट पर कानूनी पाबंदियों की यह बहस आगे चलकर अन्य पश्चिमी देशों में भी कठोर चुनावी कानूनों की नींव रख सकती है, जिससे आपराधिक फर्जीवाड़े पर लगाम लगेगी।

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