भारतीय राजनीति में बयानों और नए शब्दों के जरिए एक-दूसरे पर हमला बोलने का सिलसिला काफी पुराना है, लेकिन हाल के दिनों में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा इस्तेमाल किए गए कुछ नए शब्दों ने देश के सियासी पारे को चढ़ा दिया है। स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर दिए गए भाषण से लेकर सार्वजनिक मंचों तक, प्रधानमंत्री ने अपने विरोधियों पर निशाना साधने के लिए कई अनूठे राजनीतिक जुमले गढ़े हैं। इन बयानों के सामने आने के बाद कांग्रेस और अन्य विपक्षी पार्टियों के नेताओं ने भी आक्रामक रुख अपना लिया है। विपक्षी दल इन तंजों का जवाब देने के लिए नए तर्क गढ़ रहे हैं, जिससे सत्तापक्ष और विपक्ष के बीच शब्दों की एक नई जंग छिड़ गई है।
लाल किले से दिया गया संबोधन और 'दिमागी नक्सली' पर छिड़ी बहस
15 अगस्त 2026 को स्वतंत्रता दिवस के पावन अवसर पर लालकिले की प्राचीर से राष्ट्र को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 'दिमागी नक्सली' जैसे नए शब्द युग्म का प्रयोग किया था। आम तौर पर नक्सलवाद को देश की व्यवस्था, शांति और विकास के लिए एक हिंसक तथा विनाशकारी विचारधारा माना जाता है। हिंसा और खून-खराबे की नीति को सामान्य नागरिक कभी स्वीकार नहीं करते हैं। ऐसे में प्रधानमंत्री द्वारा इस शब्द का प्रयोग किए जाने के बाद उम्मीद जताई जा रही थी कि राजनीतिक दल इससे दूरी बनाएंगे। हालांकि, इसके बिल्कुल उलट राजनीतिक गलियारों में एक नई बहस देखने को मिली।
कांग्रेस और आम आदमी पार्टी सहित इंडिया ब्लॉक के कई प्रमुख नेताओं ने खुद को इस शब्दावली से जोड़ते हुए अपनी प्रतिक्रियाएं देनी शुरू कर दीं। पूर्व वित्त मंत्री और कांग्रेस के वरिष्ठ नेता पी. चिदंबरम ने सबसे पहले पहल करते हुए खुद को इस श्रेणी में परिभाषित किया। उन्होंने सोशल मीडिया पर इस मुद्दे को लेकर तीखी टिप्पणी की। इसके तुरंत बाद कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने भी प्रधानमंत्री के बयान पर पलटवार किया। खड़गे ने कहा, "अगर अधिकारों की बात करना दिमागी नक्सली होना है, तो हम सब दिमागी नक्सली हैं।" इस तरह विपक्ष के शीर्ष नेताओं ने इस तंज को एक नया राजनीतिक मोड़ देने का प्रयास किया।
विपक्षी दलों की एकजुटता और पलटवार की रणनीति
प्रधानमंत्री के इस बयान के बाद केवल कांग्रेस ही नहीं, बल्कि विपक्ष के कई अन्य बड़े चेहरे भी मैदान में उतर आए। आम आदमी पार्टी के राष्ट्रीय संयोजक और दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने इस मुद्दे पर सरकार को घेरने की कोशिश की। केजरीवाल ने कहा, "प्रधानमंत्री की परिभाषा के अनुसार, जो भी सड़ी-गली व्यवस्था को बदलने की बात करता है, उसे दिमागी नक्सली कह दिया जाता है।" उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार से तीखे सवाल पूछने वालों को दबाने के लिए ऐसे राजनीतिक ठप्पे लगाए जाते हैं।
इसी तरह कांग्रेस नेता पी. चिदंबरम ने एक ही दिन में सोशल मीडिया मंच पर दो अलग-अलग पोस्ट साझा कर अपनी बात रखी। उन्होंने अपने बयान में कहा, "I am proud to be a dimagi naxal!" यानी उन्हें इस पहचान पर गर्व है। इसके साथ ही उन्होंने दूसरे पोस्ट में यह भी जोड़ा कि यह शब्द भारतीय जनता पार्टी का पुराना राजनीतिक हथियार रहा है। राष्ट्रीय जनता दल के सांसद मनोज झा, पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी की प्रमुख महबूबा मुफ्ती और तृणमूल कांग्रेस के सांसद कीर्ति आजाद जैसे नेताओं ने भी इस मामले में अपने-अपने ढंग से प्रतिक्रिया दी और प्रधानमंत्री के बयान को चुनौती दी।
नक्सलवाद के खिलाफ कड़ा रुख और कांग्रेस का ऐतिहासिक रिकॉर्ड
देश से नक्सलवाद का पूरी तरह सफाया करने का श्रेय केंद्र सरकार अपनी प्रमुख उपलब्धियों में गिनती है। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह की ओर से लाल गलियारे यानी रेड कॉरिडोर के असर को समाप्त करने के लिए व्यापक अभियान चलाए गए हैं। आंकड़ों के अनुसार, एक समय देश के करीब 126 जिले नक्सल प्रभाव की चपेट में थे। गृह मंत्री ने 31 मार्च 2026 तक देश से नक्सलवाद को जड़ से खत्म करने का कड़ा संकल्प लिया था, जिसके परिणामस्वरूप अनेक चरमपंथियों को मुख्यधारा में लौटने और हथियार डालने पर मजबूर होना पड़ा है।
ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में देखा जाए तो कांग्रेस पार्टी भी खुद नक्सलवादी हिंसा के खिलाफ रही है। वर्ष 1970 के दशक में पश्चिम बंगाल में जब नक्सली आंदोलन उग्र था, तब वहां की तत्कालीन कांग्रेस सरकार ने बेहद सख्त कदम उठाए थे। उस दौरान की गई सैन्य व पुलिस कार्रवाई के कारण कई लोगों की जान गई थी। हालांकि, उस कठोर कार्रवाई और हिंसा के दौर को बंगाल की जनता ने पसंद नहीं किया, जिसके चलते वामपंथी दलों को राज्य में लंबे समय तक शासन करने का अवसर मिल गया था। बाद के वर्षों में जब मनमोहन सिंह देश के प्रधानमंत्री बने, तो उन्होंने भी खुले तौर पर यह स्वीकार किया था कि नक्सलवाद भारत की आंतरिक सुरक्षा और आर्थिक प्रगति के मार्ग में सबसे बड़ी बाधा है। इसके बावजूद वर्तमान राजनीतिक माहौल में मोदी विरोध के चलते विपक्षी नेता इस शब्द से खुद को जोड़ते दिख रहे हैं।
'चौकीदार चोर है' से लेकर 'नाराज फूफा' तक: बयानों का राजनीतिक चक्र
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर हमला बोलने की चक्कर में विपक्ष अक्सर ऐसे बयानों के जाल में उलझ जाता है, जिसका फायदा आखिरकार भारतीय जनता पार्टी को ही मिलता है। वर्ष 2019 के लोकसभा चुनाव के दौरान जब राहुल गांधी ने राफेल विमान समझौते में गड़बड़ी का आरोप लगाते हुए 'चौकीदार चोर है' का नारा दिया था, तब प्रधानमंत्री ने उसे एक जन-अभियान में तब्दील कर दिया था। भाजपा ने 'मैं भी चौकीदार' अभियान चलाकर विपक्ष के उस हमले की धार को पूरी तरह कुंद कर दिया था और चुनावी समर में बाजी मार ली थी।
हालिया दिनों में प्रधानमंत्री ने दो नए राजनीतिक तंज कसे हैं, जिन्होंने विपक्षी दलों को दोबारा सोचने पर मजबूर कर दिया है। 'दिमागी नक्सली' के अलावा दूसरा चर्चित शब्द 'नाराज फूफा' है। प्रधानमंत्री ने श्रीराम कॉलेज ऑफ कॉमर्स के एक कार्यक्रम को संबोधित करते हुए कहा था कि समाज में दो तरह की सोच वाले लोग होते हैं। एक वे जो राष्ट्र की प्रगति में योगदान देते हैं और दूसरे वे जो शादियों में बिना बात मुंह फुलाने वाले 'नाराज फूफा' की तरह हर नई विकास परियोजना का विरोध करते हैं। इस बयान पर कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की। खड़गे ने आरोप लगाया कि प्रधानमंत्री हर साल आंदोलनजीवी, अर्बन नक्सल, खान मार्केट गैंग और नाराज फूफा जैसे नए विशेषण गढ़कर अपनी प्रशासनिक विफलताओं को छिपाने का प्रयास करते हैं। वहीं राहुल गांधी ने कहा कि जब भी जनता या विपक्ष हादसों, सुरक्षा और विफलताओं पर सवाल उठाता है, तो सरकार ऐसे तंज कसकर मुख्य मुद्दों से ध्यान भटकाने की कोशिश करती है।



















