राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में कांग्रेस मुख्यालय इंदिरा भवन के बाहर उस वक्त राजनीतिक गहमागहमी बढ़ गई, जब बिहार से आए पार्टी के कई वरिष्ठ नेता और कार्यकर्ता धरने पर बैठ गए। इस प्रदर्शन में लगभग 35 पूर्व विधायक, पूर्व जिलाध्यक्ष और प्रदेश स्तर के पूर्व पदाधिकारी शामिल रहे। प्रदर्शनकारियों के हाथों में राहुल गांधी के प्रसिद्ध नारे 'डरो मत' लिखी हुई तख्तियां नजर आईं। दिलचस्प बात यह रही कि यह विरोध प्रदर्शन किसी विपक्षी दल के खिलाफ नहीं, बल्कि बिहार कांग्रेस के वर्तमान संगठन और वहां के स्थानीय नेतृत्व के फैसलों के विरोध में आयोजित किया गया था। असंतुष्ट नेताओं का कहना है कि पार्टी में व्यापक सुधार की आवश्यकता है और चुनाव के दौरान निष्कासित या निलंबित किए गए कार्यकर्ताओं को न्याय दिया जाना चाहिए।
राष्ट्रीय नेतृत्व से मुलाकात और प्रमुख मांगें
प्रदर्शनकारी नेताओं का स्पष्ट कहना है कि बिहार विधानसभा चुनाव के दौरान उन पर पार्टी विरोधी गतिविधियों में शामिल होने के आरोप लगाकर कुछ नेताओं को निलंबित किया गया था, जबकि कई अन्य को निष्कासित कर दिया गया था। अब ये सभी नेता अपने निष्कासन और निलंबन के फैसलों की समीक्षा कराने के उद्देश्य से राष्ट्रीय नेतृत्व के द्वार पर पहुंचे हैं। उनकी सबसे प्राथमिक मांग राहुल गांधी से प्रत्यक्ष मुलाकात करने की है, ताकि वे बिहार में संगठन की वास्तविक धरातलीय स्थिति और जमीनी कार्यकर्ताओं की समस्याओं को उनके समक्ष रख सकें। इसके अतिरिक्त, नाराज नेताओं ने बिहार कांग्रेस के प्रभारी कृष्णा अल्लावरू तथा प्रदेश अध्यक्ष राजेश राम को तत्काल प्रभाव से उनके पदों से हटाने की पुरजोर मांग की है। प्रदर्शनकारियों के अनुसार वे बीते कई महीनों से केंद्रीय नेतृत्व से मिलने का समय मांग रहे थे, परंतु कोई प्रतिक्रिया न मिलने पर उन्हें यह कदम उठाना पड़ा।
चार सूत्री मांग पत्र और सामाजिक न्याय का मुद्दा
नाराज गुट ने केंद्रीय संगठन के समक्ष चार मुख्य शर्तें और मांगें रखी हैं। पहली मांग राहुल गांधी से सीधे वार्ता के लिए समय देने की है। दूसरी मांग के तहत चुनाव के दौरान दिए गए सभी कारण बताओ नोटिस, निलंबन आदेश और निष्कासन पत्रों को बिना शर्त वापस लेने की बात कही गई है। तीसरी मांग में बिहार कांग्रेस प्रभारी कृष्णा अल्लावरू और प्रदेश अध्यक्ष राजेश राम को पदमुक्त करने का आग्रह शामिल है। चौथी और अंतिम मांग में राज्य संगठन में हाल के दिनों में किए गए पदों के वितरण तथा नए सदस्यों को शामिल करने की पूरी प्रक्रिया की निष्पक्ष जांच कराने का आग्रह किया गया है। नेताओं का तर्क है कि संगठन में जिम्मेदारियां तय करते समय सामाजिक न्याय के सिद्धांतों का विशेष ध्यान रखा जाना चाहिए।
10 महीने का लंबा इंतजार और आनंद माधव का बयान
धरना शुरू करने से पूर्व बुलाई गई एक प्रेस वार्ता को संबोधित करते हुए एआईसीसी (AICC) सदस्य आनंद माधव ने संगठन के भीतर चल रही खींचतान की पूरी जानकारी दी। उन्होंने बताया कि 3 नवंबर 2025 को उनके प्रतिनिधिमंडल ने राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे से मुलाकात की थी, जिसमें वरिष्ठ कांग्रेस नेता अशोक गहलोत और नासिर हुसैन भी उपस्थित थे। उस बैठक के दौरान बिहार कांग्रेस के भीतर जारी वित्तीय व सांगठनिक मुद्दों का ब्यौरा सौंपा गया था। उस समय राष्ट्रीय अध्यक्ष ने आश्वासन दिया था कि बिहार चुनाव के संपन्न होते ही सभी असंतुष्ट नेताओं के साथ बैठक कर मामलों का हल निकाला जाएगा। आनंद माधव ने कहा कि इस बात को 10 महीने से अधिक का समय बीत चुका है और लगातार प्रतिवेदन देने के बावजूद उन्हें मिलने का समय नहीं दिया गया। इसी कारण 8 सितंबर को इंदिरा भवन के समक्ष शांतिपूर्ण प्रदर्शन करने का निर्णय लिया गया।
सादाकत आश्रम की स्थिति और बाहरी तत्वों का वर्चस्व
आनंद माधव ने स्पष्ट किया कि उनका यह विरोध कांग्रेस पार्टी या उसकी नीतियों के खिलाफ नहीं है, बल्कि वे केवल बिहार में पार्टी चला रहे वर्तमान नेतृत्व की कार्यशैली से असहमत हैं। उन्होंने स्वयं को पार्टी का समर्पित कार्यकर्ता बताते हुए कहा कि यह प्रयास कांग्रेस को मजबूत करने के उद्देश्य से किया जा रहा है। बातचीत के दौरान नेताओं ने पटना स्थित बिहार कांग्रेस मुख्यालय सादाकत आश्रम की वर्तमान स्थिति पर भी गंभीर सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि सादाकत आश्रम को हर निष्ठावान कांग्रेसी अपने मंदिर के समान पूजता है, लेकिन वर्तमान में वहां अन्य राजनीतिक दलों के लोगों और अराजक तत्वों की गतिविधियां बढ़ गई हैं। निष्ठावान कार्यकर्ताओं को दरकिनार कर दूसरे दलों से आए लोगों को पदों का लालच देकर पार्टी में शामिल कराया जा रहा है, जिससे मूल संगठन कमजोर हो रहा है।



















