उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनाव की सरगर्मी अभी से तेज हो गई है और भारतीय जनता पार्टी ने अपने संगठन के भीतर एक नई सोशल इंजीनियरिंग रणनीति पर काम शुरू कर दिया है, जिसे पार्टी के भीतर 5K Plan नाम दिया गया है। दरअसल 2024 के लोकसभा चुनाव में अखिलेश यादव के पीडीए फॉर्मूले, यानी पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक वोटों को साथ लाने की रणनीति ने बीजेपी को कई सीटों पर बड़ा नुकसान पहुंचाया था। उसी झटके से सबक लेते हुए बीजेपी अब अपने परंपरागत और अति-पिछड़े वोट बैंक को मजबूती से साधने में जुटी है, ताकि 2027 में समाजवादी पार्टी और कांग्रेस को जमीनी स्तर पर घेरा जा सके।
किन पांच जातियों पर टिकी है बीजेपी की नजर
बीजेपी के 5K प्लान के केंद्र में पांच जातीय समूह हैं, कुर्मी, कायस्थ, कुम्हार, कहार और कोइरी यानी मौर्य-शाक्य-कुशवाहा समाज। उत्तर प्रदेश की राजनीति में यह पांच जातियां किसी भी दल के लिए सत्ता की चाबी मानी जाती हैं, क्योंकि इनका बिखराव या एकजुटता चुनावी नतीजों की दिशा बदल सकती है। कुर्मी वोटर प्रदेश में करीब 5 से 6 प्रतिशत हैं और इनकी मौजूदगी रुहेलखंड, पूर्वांचल के कुशीनगर, मिर्जापुर, बरेली और बुंदेलखंड के बांदा जैसे इलाकों में खासी असरदार है। कोइरी यानी मौर्य-कुशवाहा समुदाय की आबादी लगभग 4 से 5 प्रतिशत है और यह तबका मुख्य रूप से मध्य यूपी तथा पूर्वांचल के वाराणसी, गाजीपुर, जौनपुर और प्रयागराज में केंद्रित है। कायस्थ समाज संख्या में भले ही 1.5 से 2 प्रतिशत के बीच सीमित हो, लेकिन लखनऊ, प्रयागराज, गोरखपुर और वाराणसी जैसे शहरी क्षेत्रों में इसका प्रभाव लंबे समय से बीजेपी के पक्ष में रहा है। कुम्हार समाज की आबादी 2.5 से 3 प्रतिशत के बीच है और यह पश्चिमी यूपी, बुंदेलखंड तथा मध्य यूपी में फैला हुआ है। वहीं कहार यानी कश्यप और निषाद जाति की संख्या 2 से 2.5 प्रतिशत के बीच है और यह तबका पूर्वांचल के साथ-साथ पश्चिमी यूपी में भी अच्छी-खासी तादाद में मौजूद है।
15 से 18 प्रतिशत आबादी, 150 सीटों तक असर
अगर इन पांचों जातियों को जोड़ दिया जाए, तो यह समूह उत्तर प्रदेश की कुल आबादी का करीब 15 से 18 प्रतिशत हिस्सा बनता है। यही वजह है कि इसे केवल आंकड़ों का खेल नहीं, बल्कि कम से कम 120 से 150 विधानसभा सीटों के नतीजे बदलने की ताकत रखने वाला वोट बैंक माना जा रहा है। 2024 के लोकसभा चुनाव में मिले झटके के बाद बीजेपी किसी भी स्तर पर जोखिम लेने के मूड में नहीं है, इसलिए संघ और संगठन के समन्वय से पार्टी ने इस 5K समूह को साधने के लिए एक साथ तीन अलग-अलग मोर्चों पर काम शुरू कर दिया है।
तीन मोर्चों पर बीजेपी की रणनीति
पहला मोर्चा कुर्मी और कोइरी जातियों को लेकर है। बीजेपी ने अपने सहयोगी दलों, खासतौर पर अपना दल (सोनेलाल) और सुभासपा के साथ तालमेल और बढ़ाने का फैसला किया है। इसके साथ ही केशव प्रसाद मौर्य और भूपेंद्र चौधरी जैसे शीर्ष ओबीसी चेहरों के जरिए इन जातियों तक यह संदेश पहुंचाया जा रहा है कि प्रशासनिक और राजनीतिक भागीदारी सिर्फ बीजेपी के साथ रहने पर ही संभव है।
दूसरा मोर्चा कायस्थ समुदाय का है, जो लंबे समय से बीजेपी का वैचारिक और कोर कैडर रहा है। 2024 में टिकट बंटवारे को लेकर इस तबके में जो नाराजगी दिखी थी, उसे दूर करने के लिए बीजेपी ने शहरी निकायों, विभिन्न बोर्डों और आने वाले 2027 के टिकट वितरण में कायस्थ समाज को ज्यादा हिस्सेदारी देने की योजना बनाई है। बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नबीन, जो खुद कायस्थ समाज से आते हैं, इस रणनीति में एक बड़ा फैक्टर माने जा रहे हैं।
तीसरा मोर्चा कुम्हार यानी प्रजापति और कहार यानी कश्यप-निषाद जातियों को लेकर है। इन दोनों समुदायों को साधने के लिए मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ माटी कला बोर्ड जैसी जनकल्याणकारी योजनाओं के जरिए पहले से ही सक्रिय हैं, ताकि इन अति-पिछड़ी जातियों में सरकार की पकड़ बनी रहे और उन्हें लगे कि उनकी भागीदारी सत्ता में सुनिश्चित है।
अगर अखिलेश ने 5K में सेंध लगाई तो क्या होगा
दूसरी तरफ अखिलेश यादव का पीडीए मिशन भी लगातार गैर-यादव ओबीसी जातियों, यानी कुर्मी, कोइरी और कुम्हार को अपने पाले में लाने के लिए सक्रिय है। अगर अखिलेश यादव इस 5K वोट बैंक में 15 से 20 प्रतिशत तक भी सेंध लगाने में कामयाब हो जाते हैं, तो 2027 का पूरा चुनावी गणित पलट सकता है और सूबे की सियासी तस्वीर पूरी तरह बदल सकती है।
बीजेपी के लिए खतरा कहां छिपा है
बीजेपी की मौजूदा ताकत अपर कास्ट, गैर-यादव ओबीसी और अति-दलित वोटों के गठजोड़ पर टिकी है। अगर इसी गठजोड़ में से कुर्मी और कोइरी वोट बैंक खिसकता है, तो रुहेलखंड और पूर्वांचल की करीब 60 से 70 सीटों पर बीजेपी को सीधा नुकसान झेलना पड़ सकता है। इसी तरह अगर कुम्हार और कहार जैसी अति-पिछड़ी जातियां अखिलेश यादव के जातीय जनगणना और हिस्सेदारी के वादे से प्रभावित होती हैं, तो समाजवादी पार्टी का पीडीए फॉर्मूला केवल कागजी नारा नहीं रह जाएगा, बल्कि 2027 में सत्ता परिवर्तन की असली वजह बन सकता है।
2027 की लड़ाई किस मोड़ पर
यूपी चुनाव 2027 की असली लड़ाई अब इसी सवाल पर टिकी नजर आ रही है कि क्या बीजेपी अपने 5K प्लान के जरिए अपने परंपरागत और अति-पिछड़े वोट बैंक की किलेबंदी बचाए रखने में कामयाब होती है, या फिर अखिलेश यादव का पीडीए रथ इसी 5K समूह में बड़ी सेंध लगाकर लखनऊ की सत्ता तक पहुंच बनाता है। कांग्रेस भी इस पूरे राजनीतिक घटनाक्रम पर करीबी नजर बनाए हुए है, क्योंकि गठबंधन की सियासत में यह जातीय समीकरण उसकी भी रणनीति को सीधे प्रभावित करेगा।



















