राजस्थान में भर्ती परीक्षाओं को लेकर चल रहे विवादों और युवाओं के प्रदर्शनों के बीच राज्य सरकार ने बड़ा कदम उठाया है। सरकार ने पिछले ढाई साल के दौरान पेपर लीक माफिया और सरकारी भर्ती प्रक्रियाओं में धांधली करने वालों के खिलाफ की गई कड़ी कार्रवाई का पूरा लेखा-जोखा जनता के सामने रखा है। सरकार का कहना है कि उनकी कार्रवाई केवल कागजी दावों तक सीमित नहीं है, बल्कि धरातल पर कड़े कदम उठाए गए हैं, जिससे भर्ती प्रक्रिया में पारदर्शिता और अभ्यर्थियों के विश्वास को बहाल किया जा सके।
परीक्षाओं का आयोजन और पुराने लीक के मामले
प्रशासनिक रिपोर्ट के अनुसार, पिछले ढाई वर्षों की अवधि के भीतर राज्य में कुल 383 भर्ती परीक्षाओं का आयोजन किया गया है। इन परीक्षाओं की विश्वसनीयता बनाए रखने के लिए सरकार ने उम्मीदवारों के भौतिक और डिजिटल सत्यापन की प्रक्रियाओं को पहले की तुलना में काफी सख्त कर दिया है। इसके साथ ही, मौजूदा सरकार ने पिछली कांग्रेस सरकार पर निशाना साधते हुए दावा किया है कि उसके कार्यकाल के दौरान कुल 17 भर्ती परीक्षाओं के पेपर लीक हुए थे। इस धांधली की वजह से राज्य के लाखों योग्य और मेहनती अभ्यर्थियों का भविष्य अंधकार में लटक गया था और व्यवस्था पर उनका भरोसा उठने लगा था।
FIR, गिरफ्तारियां और RPSC पर गाज
पेपर लीक और परीक्षा में अनुचित साधनों के इस्तेमाल को रोकने के लिए सरकार ने बड़े पैमाने पर कानूनी कदम उठाए हैं। जारी किए गए आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, इस अवधि में विभिन्न थानों में कुल 163 FIR दर्ज की गई हैं। इन मामलों की गहन जांच के बाद अब तक 569 आरोपियों को सलाखों के पीछे भेजा जा चुका है। सबसे ज्यादा ध्यान खींचने वाली कार्रवाई सब-इंस्पेक्टर भर्ती परीक्षा में हुई गड़बड़ियों को लेकर की गई है। इस परीक्षा से जुड़े मामलों में पुलिस ने अब तक कुल 150 लोगों को हिरासत में लिया है, जिनमें 71 सब-इंस्पेक्टर शामिल हैं। इसके अलावा, राजस्थान लोक सेवा आयोग (RPSC) के पूर्व सदस्य बाबूलाल कटारा और रामूराम राईका को भी अनियमितताओं में संलिप्तता पाए जाने पर गिरफ्तार किया गया है, जो इस अभियान की गंभीरता को दर्शाता है।
फर्जी नौकरी पाने वालों पर सरकार का कड़ा रुख
केवल अपराधियों को पकड़ने तक ही सरकार की कार्रवाई सीमित नहीं रही है, बल्कि फर्जी तरीकों का सहारा लेकर सरकारी सेवा में घुसपैठ करने वालों को भी बाहर का रास्ता दिखाया गया है। अब तक कुल 188 ऐसे लोक सेवकों की पहचान कर उनकी सेवाएं समाप्त कर दी गई हैं, जिन्होंने अवैध माध्यमों से नौकरियां हासिल की थीं। इसके साथ ही, धांधली के जरिए नियुक्त हुए 135 शारीरिक शिक्षकों के नियुक्ति पत्रों को भी निरस्त कर दिया गया है। फिलहाल, 454 सरकारी कर्मचारियों के खिलाफ संदेह के घेरे में होने के कारण विभागीय और कानूनी जांच की जा रही है। जांच के मुख्य बिंदुओं में ओएमआर शीट में हेरफेर, डमी परीक्षार्थियों को बैठाना और जाली दस्तावेजों के जरिए नौकरी हासिल करना शामिल है।
नई भर्तियों का खाका और राजनीतिक पृष्ठभूमि
युवाओं में फैले असंतोष को दूर करने के लिए सरकार ने रोजगार के नए अवसरों की जानकारी भी साझा की है। सरकार की ओर से बताया गया है कि पिछले ढाई साल में 1.78 लाख से अधिक युवाओं को सरकारी नौकरियों में नियुक्तियां दी जा चुकी हैं। इसके अलावा, लगभग एक लाख और भर्तियों की प्रक्रिया वर्तमान में अलग-अलग चरणों में चल रही है। युवाओं को स्पष्टता देने के लिए सरकार ने 1.25 लाख नई भर्ती परीक्षाओं का एक विस्तृत कैलेंडर भी जारी कर दिया है। सरकार का मानना है कि इन ठोस कदमों से व्यवस्था में पारदर्शिता आई है और प्रदेश के युवाओं का तंत्र पर भरोसा फिर से स्थापित हो रहा है।
गौरतलब है कि वर्ष 2023 में हुए राजस्थान विधानसभा चुनावों के दौरान पेपर लीक का मुद्दा एक बड़ा राजनीतिक हथियार बना था। उस समय विपक्ष में रहते हुए भाजपा ने तत्कालीन अशोक गहलोत सरकार की घेराबंदी करने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी। सत्ता की बागडोर संभालने के बाद मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा ने अपनी पहली प्राथमिकताओं में पेपर लीक मामलों की जांच के लिए एक विशेष जांच दल (SIT) का गठन किया था। सरकार ने दोहराया है कि उसकी नीति इस संवेदनशील मुद्दे पर हमेशा जीरो टॉलरेंस की रही है और दोषियों के खिलाफ यह अभियान आगे भी इसी कड़े तेवर के साथ जारी रहेगा।



















