मौत के बाद अब खाद बनेगा इंसानी शरीर, ऑस्ट्रेलिया के इस राज्य ने दी अनोखी कानूनी मंजूरीसोने की चाल 4,000 डॉलर के पास अटकी, सिस्टमैटिक बिकवाली के बीच केंद्रीय बैंकों की खरीदारी ने संभाला मोर्चाईसीबी की नीतिगत बैठक और फ्रांस के बॉन्ड संकट के बीच वैश्विक मुद्रा बाजारों में हलचलयूरोपीय अर्थव्यवस्था में सुस्त विकास और असमान महंगाई के बीच वैश्विक बाजारों में सतर्कताअरुणाचल सीमा विवाद पर बीजिंग की प्रतिक्रिया, भारत से सहयोग की अपीलदमदार निखार के लिए क्या खाएं, डॉक्टर जश्या सरीन ने बताए स्किन फ्रेंडली फूड्सआरबीएनजेड की ब्याज दरों में बढ़ोतरी की उम्मीदों के बीच फिसला न्यूजीलैंड डॉलर27 अक्टूबर को आ रहा है Redmi K100 स्मार्टफोन, बोस साउंड और 165Hz स्क्रीन से लैस होने की चर्चागुजरात में शुरू हुई निम्रत कौर आहूवालिया की नई शूटिंग, शेयर की खास तस्वीरकुंभ राशिफल नवंबर 2026: शनि की चाल से क्या होगा असर और उतरती साढ़ेसाती का हाल
राहुल गांधी पर बरसे किरेन रिजिजू, इतिहास के पन्ने खोलकर कांग्रेस को बताया सहयोगियों को निगलने वाला भस्मासुरराजनीति
18 सित॰ 2026, 6:45 pm (38 दिन पहले)· 2

राहुल गांधी पर बरसे किरेन रिजिजू, इतिहास के पन्ने खोलकर कांग्रेस को बताया सहयोगियों को निगलने वाला भस्मासुर

केंद्रीय मंत्री किरेन रिजिजू और बीजेपी नेता स्मृति ईरानी ने राहुल गांधी के आरोपों पर पलटवार करते हुए कांग्रेस पर क्षेत्रीय दलों को खत्म करने और लोकतंत्र का गला घोंटने का बड़ा आरोप लगाया है।

भारतीय राजनीति में एक बार फिर तीखी बयानबाजी का दौर शुरू हो गया है। केंद्रीय मंत्री किरेन रिजिजू ने कांग्रेस नेता राहुल गांधी के आरोपों पर कड़ा पलटवार करते हुए देश के सबसे पुराने राजनीतिक दल के इतिहास का पूरा ब्योरा जनता के सामने रख दिया है। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि राहुल गांधी जिन आरोपों को भारतीय जनता पार्टी पर मढ़ने की कोशिश कर रहे हैं, असल में वे सभी आरोप स्वयं कांग्रेस पार्टी के ऊपर पूरी तरह फिट बैठते हैं। रिजिजू ने कांग्रेस की तुलना पौराणिक काल के भस्मासुर से करते हुए कहा कि यह दल अपने सहयोगियों के लिए बेहद नुकसानदेह साबित हुआ है। उन्होंने इस बात पर भी जोर दिया कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में बीजेपी ने दुनिया के सबसे बड़े राजनीतिक संगठन के रूप में अपनी पहचान बनाई है, लेकिन यह सफलता किसी भी दल को तोड़कर हासिल नहीं की गई है।

कांग्रेस को पौराणिक पात्र भस्मासुर से क्यों जोड़ा गया

केंद्रीय मंत्री किरेन रिजिजू ने कांग्रेस की राजनीतिक शैली पर गंभीर सवाल खड़े करते हुए कहा कि इस पार्टी के पास दूसरों की नैतिकता पर बात करने का कोई अधिकार नहीं है। X पर साझा किए गए वीडियो में किरेन रिजिजू ने कहा, "कांग्रेस पार्टी वह 'भस्मासुर' है जो अपने संपर्क में आने वाले हर दल को जलाकर भस्म कर देती है।" उनका मानना है कि जो भी क्षेत्रीय पार्टी कांग्रेस के साथ गठबंधन या चुनावी तालमेल में आती है, वह धीरे-धीरे अपनी जमीन खो देती है और उसका अस्तित्व समाप्त हो जाता है। कांग्रेस ने हमेशा अपने सहयोगी संगठनों की ताकत को सोखने और उन्हें कमजोर करने की नीति अपनाई है, जिससे आज की राजनीति में कई छोटे दल हाशिए पर चले गए हैं।

कांग्रेस की आपसी फूट से कैसे हुआ तृणमूल कांग्रेस और एनसीपी का जन्म

किरेन रिजिजू ने देश के दो बड़े क्षेत्रीय दलों का उदाहरण देते हुए कांग्रेस के भीतर की गुटबाजी पर निशाना साधा। उन्होंने कहा कि आज देश की राजनीति में मजबूत पकड़ रखने वाली तृणमूल कांग्रेस और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी जैसी ताकतें किसी बाहरी विचारधारा से नहीं उपजी हैं। यह दोनों ही बड़े दल कांग्रेस के भीतर की भारी घुटन, आंतरिक लोकतंत्र की कमी और आपसी फूट के कारण अस्तित्व में आए। उन्होंने सवाल उठाया कि ममता बनर्जी और शरद पवार जैसे कद्दावर नेताओं को आखिर क्यों कांग्रेस का साथ छोड़कर अपनी नई राजनीतिक राह चुननी पड़ी। यह इस बात का स्पष्ट प्रमाण है कि कांग्रेस ने कभी भी अपने भीतर उठने वाली मजबूत आवाजों और क्षेत्रीय नेतृत्व को पनपने नहीं दिया और हमेशा उन्हें दबाने का काम किया।

कर्पूरी ठाकुर के सियासी प्रभाव को दबाने की सुनियोजित कोशिशें

बिहार के सामाजिक और राजनीतिक परिदृश्य में जननायक कर्पूरी ठाकुर का नाम बेहद सम्मान के साथ लिया जाता है। पिछड़ों, वंचितों और गरीबों के हक की लड़ाई लड़ने वाले इस महान समाजवादी नेता के बढ़ते प्रभाव से तत्कालीन कांग्रेस आलाकमान हमेशा असहज महसूस करता था। रिजिजू ने आरोप लगाया कि कर्पूरी ठाकुर के बढ़ते राजनीतिक कद को छोटा करने के लिए कांग्रेस ने बिहार की राजनीति में लगातार गुटबाजी को बढ़ावा दिया। कांग्रेस के रणनीतिकारों ने पर्दे के पीछे से ऐसी गोटियां बिछाईं जिससे गैर-कांग्रेसी ताकतें कभी एकजुट न हो सकें। इस पूरी साजिश के पीछे कांग्रेस का एकमात्र उद्देश्य यह था कि जमीनी स्तर का कोई भी लोकप्रिय समाजवादी नेता उनके एकछत्र साम्राज्य के लिए चुनौती न बन सके।

साल 1977 में कैसे गिराई गई देश की पहली गैर-कांग्रेसी सरकार

आपातकाल के काले दौर के बाद, साल 1977 में देश की जनता ने तानाशाही प्रवृत्तियों के खिलाफ एकजुट होकर एक ऐतिहासिक और निर्णायक जनादेश दिया था। इसके परिणामस्वरूप केंद्र में पहली बार जनता पार्टी के नेतृत्व में एक गैर-कांग्रेसी सरकार का गठन हुआ। हालांकि, कांग्रेस के नेतृत्व को यह लोकतांत्रिक बदलाव बिल्कुल भी पसंद नहीं आया और उन्होंने सत्ता को दोबारा हथियाने के लिए जोड़-तोड़ की अपनी पुरानी रणनीति पर काम करना शुरू कर दिया। इस रणनीति के तहत चौधरी चरण सिंह को देश का प्रधानमंत्री बनाने का लालच दिया गया और उनकी सरकार को बाहर से समर्थन देने का नाटक किया गया। जैसे ही सरकार का गठन हुआ, कुछ ही महीनों के भीतर कांग्रेस ने अपना समर्थन वापस ले लिया। इसके चलते चौधरी चरण सिंह की सरकार बिना संसद का सामना किए ही गिर गई और देश को जबरन एक असमय मध्यावधि चुनाव के दलदल में धकेल दिया गया।

शरद पवार को कमजोर करने के लिए सुरेश कलमाड़ी का इस्तेमाल

महाराष्ट्र की राजनीति में शरद पवार हमेशा से एक स्वतंत्र और बेहद मजबूत जनाधार वाले नेता रहे हैं। किरेन रिजिजू के अनुसार, दिल्ली के कांग्रेस हाईकमान को शरद पवार का यह बढ़ता प्रभाव कभी रास नहीं आया। उनके इस दबदबे को नियंत्रित और कमजोर करने के लिए दिल्ली दरबार ने लगातार उनके ही बेहद करीबी सहयोगियों को उनके खिलाफ खड़ा करने की चाल चली। इसी रणनीति के तहत सुरेश कलमाड़ी को पुणे और महाराष्ट्र की राजनीति में तेजी से आगे बढ़ाया गया ताकि शरद पवार के राजनीतिक प्रभाव को काटा जा सके। कांग्रेस की हमेशा से यह स्थापित शैली रही है कि राज्यों के भीतर ताकतवर नेताओं के समानांतर एक दूसरा सत्ता केंद्र खड़ा कर दिया जाए ताकि कोई भी नेता केंद्रीय नेतृत्व को चुनौती न दे सके। इसी आपसी अविश्वास और उपेक्षा के कारण अंततः शरद पवार को कांग्रेस से अपनी राहें पूरी तरह अलग करनी पड़ीं।

साल 1980 में हरियाणा में हुआ दलबदल का सबसे बड़ा खेल

साल 1980 का दौर भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में दलबदल की राजनीति के एक काले अध्याय के रूप में दर्ज है। केंद्र की सत्ता में इंदिरा गांधी की दोबारा वापसी होते ही राज्यों की गैर-कांग्रेसी सरकारों पर केंद्रीय एजेंसियों और राजनीतिक तौर पर भारी दबाव बनाना शुरू कर दिया गया। उस समय हरियाणा में भजन लाल के नेतृत्व में जनता पार्टी की सरकार सुचारू रूप से चल रही थी। लेकिन सत्ता हासिल करने की होड़ में कांग्रेस ने एक ऐसा कदम उठाया जिसने लोकतांत्रिक मर्यादाओं को तार-तार कर दिया। कांग्रेस ने रातों-रात पूरी की पूरी राज्य सरकार का ही अपने दल में विलय करवा लिया। मुख्यमंत्री भजन लाल अपने दर्जनों विधायकों के साथ रातों-रात पाला बदलकर कांग्रेस में शामिल हो गए। यह घटना देश की संसदीय राजनीति में सिद्धांतों और शुचिता की हत्या का सबसे बड़ा उदाहरण बनकर सामने आई।

स्मृति ईरानी ने कांग्रेस के इतिहास को लेकर राहुल गांधी को घेरा

इस पूरे मामले पर बीजेपी की वरिष्ठ नेता स्मृति ईरानी ने भी राहुल गांधी के बयानों की कड़ी आलोचना की। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी ने बीजेपी पर कीचड़ उछालने के चक्कर में अपनी ही पार्टी के काले और दमनकारी इतिहास को देश के युवाओं के सामने फिर से उजागर कर दिया है। उन्होंने याद दिलाया कि साल 1980 में कांग्रेस की केंद्र सरकार ने संविधान के अनुच्छेद 356 का बेरहमी से इस्तेमाल करते हुए देश की नौ लोकतांत्रिक रूप से चुनी हुई राज्य सरकारों को एक झटके में बर्खास्त कर दिया था। इतना ही नहीं, साल 2005 में यूपीए शासनकाल के दौरान भी बिहार विधानसभा को आनन-फानन में अलोकतांत्रिक तरीके से भंग कर दिया गया था, जिसे बाद में देश की सर्वोच्च अदालत यानी सुप्रीम कोर्ट ने पूरी तरह असंवैधानिक और अवैध करार दिया था। स्मृति ईरानी ने यह गंभीर सवाल भी उठाया कि संवैधानिक संस्थाओं और चुनाव आयोग की गरिमा को लगातार ठेस पहुंचाकर राहुल गांधी देश में किसका एजेंडा पूरा करना चाहते हैं।

क्षेत्रीय दलों को कुचलने के लिए अनुच्छेद 356 का मनमाना इस्तेमाल

कांग्रेस का संपूर्ण इतिहास राज्यों की चुनी हुई सरकारों को मनमाने ढंग से और दुर्भावनापूर्ण तरीके से बर्खास्त करने के उदाहरणों से भरा पड़ा है। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 356, जिसके तहत राज्यों में राष्ट्रपति शासन लगाया जाता है, का इतिहास में सबसे ज्यादा दुरुपयोग करने का रिकॉर्ड कांग्रेस पार्टी के नाम दर्ज है। केरल में देश की पहली लोकतांत्रिक कम्युनिस्ट सरकार को बर्खास्त करने से लेकर पंजाब, तमिलनाडु और उत्तर प्रदेश में विभिन्न गैर-कांग्रेसी सरकारों को समय से पहले गिराने के लिए इस संवैधानिक प्रावधान का हथियार की तरह इस्तेमाल किया गया। इन राज्यों में स्वतंत्र क्षेत्रीय आवाजों को दबाने के लिए राज्यपालों के प्रतिष्ठित पद का खुला राजनीतिक इस्तेमाल किया गया। रिजिजू ने अंत में कहा कि जिस राजनीतिक दल ने दशकों तक भारतीय लोकतंत्र का गला घोंटने का काम किया है, वह आज दूसरों को लोकतांत्रिक मूल्यों और मर्यादाओं का पाठ पढ़ाने की कोशिश कर रहा है, जो बेहद हास्यास्पद है।

ये भी पढ़ें

सवाल-जवाब

किरेन रिजिजू ने कांग्रेस को 'भस्मासुर' क्यों कहा?
किरेन रिजिजू के अनुसार, कांग्रेस अपने संपर्क में आने वाले हर सहयोगी दल को धीरे-धीरे कमजोर करके उसका अस्तित्व समाप्त कर देती है, इसलिए उन्होंने इसकी तुलना भस्मासुर से की।
शरद पवार और ममता बनर्जी ने कांग्रेस क्यों छोड़ी थी?
बीजेपी नेताओं के अनुसार, कांग्रेस के भीतर दमघोंटू माहौल, आंतरिक लोकतंत्र की कमी और लगातार उपेक्षा के कारण इन दोनों बड़े नेताओं को कांग्रेस छोड़नी पड़ी थी।
साल 1977 में जनता पार्टी की सरकार कैसे गिरी थी?
कांग्रेस ने चौधरी चरण सिंह को प्रधानमंत्री पद का लालच देकर समर्थन दिया था, लेकिन सरकार बनने के कुछ ही महीनों बाद समर्थन वापस लेकर उसे बिना संसद का सामना किए गिरा दिया था।
साल 1980 में हरियाणा में भजन लाल की सरकार के साथ क्या हुआ था?
केंद्र में इंदिरा गांधी की वापसी के बाद, हरियाणा के मुख्यमंत्री भजन लाल अपने दर्जनों विधायकों के साथ रातों-रात पाला बदलकर पूरी सरकार सहित कांग्रेस में शामिल हो गए थे।
स्मृति ईरानी ने साल 2005 के बिहार विधानसभा मामले का क्या जिक्र किया?
स्मृति ईरानी ने बताया कि साल 2005 में यूपीए सरकार ने बिहार विधानसभा को अलोकतांत्रिक ढंग से भंग कर दिया था, जिसे बाद में सुप्रीम कोर्ट ने असंवैधानिक करार दिया था।
संपादकीय नीति सुधार नीति

टिप्पणियाँ 5

Sneha Kulkarni@sneha-kulkarni·37 दिन पहले

यह बयानबाजी भले ही राजनीतिक गलियारों में चर्चा का विषय हो, लेकिन इसका सीधा असर जनमानस और लोकप्रिय मीडिया नैरेटिव पर भी पड़ता है। आने वाले दिनों में क्षेत्रीय दलों और राष्ट्रीय गठबंधनों के बीच की गतिशीलता सिनेमाई पटकथा की तरह और अधिक नाटकीय होने की पूरी संभावना है, जिससे चुनावी मंच और मनोरंजन दोनों जगह राजनीतिक रणनीतियां मुख्य केंद्र में रहेंगी।

Ravikash Gupta@ravikash·37 दिन पहले

किरेन रिजिजू का यह बयान ऐसे समय में आया है जब भारतीय राजनीतिक गलियारों में क्षेत्रीय दलों और राष्ट्रीय गठबंधनों की ताकत को लेकर नए सिरे से बहस छिड़ गई है। ऐतिहासिक संदर्भों के जरिए राजनीतिक अस्तित्व और गठबंधन की राजनीति पर यह टिप्पणी इस बात को रेखांकित करती है कि आने वाले चुनावी समीकरणों में क्षेत्रीय क्षत्रपों और राष्ट्रीय दलों के बीच का यह वैचारिक संघर्ष और अधिक तीव्र हो सकता है, जिससे चुनावी रणनीतियों पर दूरगामी असर पड़ना तय है।

Yuki Tanaka@yuki-tanaka·37 दिन पहले

यह वैचारिक टकराव केवल बयानबाजी तक सीमित नहीं है, बल्कि यह आगामी विधानसभा चुनावों में राष्ट्रीय दलों और क्षेत्रीय ताकतों के बीच सीटों के तालमेल और वोट ट्रांसफर की गणित को सीधे प्रभावित करेगा। जब मुख्य राष्ट्रीय दल अपनी ऐतिहासिक रणनीतियों का हवाला देते हुए क्षेत्रीय सहयोगियों के भविष्य पर सवाल उठाते हैं, तब गठबंधन धर्म का पालन करना और भी अधिक जटिल हो जाता है। इससे भविष्य के राजनीतिक गठजोड़ और क्षेत्रीय दलों की सौदेबाजी की क्षमता पर दूरगामी और रणनीतिक असर पड़ेगा।

Karan Malhotra@karan-malhotra·37 दिन पहले

राजनीतिक बयानबाजी के इस दौर में केंद्रीय मंत्री किरेन रिजिजू के आरोप और कांग्रेस का इतिहास एक बड़े वैचारिक संघर्ष को उजागर करता है। जब राजनीतिक दल सहयोगियों को निगलने और आंतरिक फूट के आरोप-प्रत्यारोप में उलझते हैं, तो इसका सीधा असर जनता के बीच विश्वास और देश की विधायी स्थिरता पर पड़ता है। आने वाले दिनों में यह देखना अहम होगा कि क्या यह जुबानी जंग किसी नए कानूनी या सियासी मोड़ की तरफ बढ़ती है या सिर्फ चुनावी मंचों तक सीमित रहती है।

Rohan Verma@rohan-verma·37 दिन पहले

किरेन रिजिजू के बयानों से यह साफ है कि आने वाले दिनों में क्षेत्रीय दलों और राष्ट्रीय गठबंधनों की राजनीति में नए समीकरण बन सकते हैं। जब कांग्रेस और उसके पुराने सहयोगी दलों के इतिहास को खंगाला जाता है, तो उत्तर प्रदेश और अन्य राज्यों के आगामी चुनावों में यह मुद्दा क्षेत्रीय क्षत्रपों के रुख को तय करने में अहम भूमिका निभाएगा।

नागरिक पत्रकारिता

TrendKia पत्रकार बनें

जनता की आवाज़

अपने आसपास की ख़बरें, तस्वीरें और वीडियो ट्रेंडकिआ के साथ साझा करें और अपनी आवाज़ देश तक पहुँचाएँ। हर नागरिक एक पत्रकार।

अभी जुड़ें
CH 01 लाइव
TrendKia TV ON AIR
Chamar no WhatsApp