जीवन के अंतिम पड़ाव के बाद अंतिम संस्कार के पारंपरिक तरीकों से हटकर अब दुनिया में नए विकल्प तलाशे जा रहे हैं। इसी कड़ी में ऑस्ट्रेलिया ने एक अनूठा कदम उठाया है, जहां अब मृत्यु के बाद इंसानी शरीर को मिट्टी या खाद में बदला जा सकेगा। इस प्रक्रिया को ह्यूमन कंपोस्टिंग या टेरामेशन के नाम से जाना जाता है और वहां की सरकार ने इसे कानूनी रूप से वैध कर दिया है। वैज्ञानिक और प्राकृतिक तरीकों पर आधारित इस विधि में मृत देह को विशेष परिस्थितियों के बीच विघटित किया जाता है ताकि वह उपजाऊ खाद में परिवर्तित हो सके।
कानूनी मान्यता और प्रक्रिया की शुरुआत
न्यू साउथ वेल्स ऑस्ट्रेलिया का ऐसा पहला राज्य बन चुका है जिसने इस अनोखी प्रथा को कानूनी रूप से स्वीकार कर लिया है। हालांकि इस व्यवस्था के जमीन पर उतरने और इसके लिए जरूरी बुनियादी ढांचा तैयार होने में अभी लंबा वक्त लगने वाला है। अनुमान लगाया जा रहा है कि वर्ष 2029 से पहले इस तरह की सेवाएं चालू होने की कोई संभावना नहीं है। इसके लिए स्थानीय प्रशासन और स्वास्थ्य विभागों को विस्तृत नियम कायदे तय करने होंगे।
किस तरह काम करती है ह्यूमन कंपोस्टिंग
इस तकनीक में मृत शरीर को किसी प्राकृतिक वस्त्र में लपेटकर एक विशेष चैंबर या पात्र के अंदर रखा जाता है। उस पात्र के भीतर लकड़ी के महीन टुकड़े, सूखा भूसा और अल्फाल्फा जैसी जैविक सामग्री मिलाई जाती है ताकि प्राकृतिक विघटन के लिए पर्याप्त हवा और नमी बनी रहे। इस पूरी प्रक्रिया को तकनीकी तौर पर नेचुरल ऑर्गेनिक रिडक्शन भी कहा जाता है।
तापमान और सूक्ष्मजीवों का प्रबंधन
पात्र के भीतर तापमान को करीब 55 से 70 डिग्री सेल्सियस के बीच नियंत्रित रखा जाता है, साथ ही ऑक्सीजन और नमी के स्तर की भी निगरानी की जाती है। इन अनुकूल परिस्थितियों के कारण शरीर के ऊतक बहुत तेजी से गलने लगते हैं और बीमारी फैलाने वाले तमाम हानिकारक सूक्ष्मजीव भी समाप्त हो जाते हैं। लगभग दो से तीन महीने की अवधि में यह पूरा जैविक कचरा पौधों के लिए बेहद उपयोगी पोषक तत्वों से भरपूर खाद में बदल जाता है।
हड्डियों और कृत्रिम अंगों का निपटान
हालांकि इस पूरी प्रक्रिया में शरीर का अधिकांश हिस्सा गल जाता है, लेकिन दांत और हड्डियां पूरी तरह से नष्ट नहीं होतीं। इन्हें अलग करके बारीक पीसना पड़ता है। इसके अलावा शरीर में मौजूद किसी भी तरह के कृत्रिम जोड़, धातु के स्क्रू या अन्य मेडिकल प्रत्यारोपण को प्रक्रिया शुरू होने से पहले ही बाहर निकालना अनिवार्य होता है ताकि खाद की शुद्धता बनी रहे।
पारंपरिक अंतिम संस्कार से तुलना
अब तक दुनिया भर में शवों को या तो दफनाने का चलन रहा है या फिर उनका दाह संस्कार किया जाता है। लेकिन इन दोनों ही पारंपरिक तरीकों के साथ पर्यावरण से जुड़ी कुछ गंभीर चिंताएं जुड़ी हुई हैं। दफनाने की प्रक्रिया में ताबूत, जमीन और रसायनों की जरूरत होती है, जबकि दाह संस्कार में भारी मात्रा में ईंधन जलता है और वायुमंडल में कार्बन डाइऑक्साइड जैसी हानिकारक गैसें छोड़ती हैं। दूसरी ओर, प्राकृतिक दफन में बिना किसी रसायन के शरीर को मिट्टी में मिलाया जाता है।
टेरामेशन की शुरुआत का इतिहास
इस अनूठी अवधारणा की नींव अमेरिका में कैटरीना स्पेड द्वारा रखी गई थी। उन्होंने वर्ष 2014 में अर्बन डेथ प्रोजेक्ट की शुरुआत की थी और बाद में रिकंपोज नाम से पर्यावरण के अनुकूल अंतिम संस्कार सेवा की स्थापना की। वर्तमान समय में अमेरिका के कुल 14 राज्यों में मानव कंपोस्टिंग की पूरी अनुमति दी जा चुकी है। अब ऑस्ट्रेलिया भी इसी नक्शए-कदम पर आगे बढ़ रहा है और न्यू साउथ वेल्स में कानून पारित होने के बाद इस दिशा में रास्ता साफ हो गया है।
पर्यावरण के लिए कितना बेहतर विकल्प
यह सवाल अभी भी बहस का विषय बना हुआ है कि क्या यह तरीका बाकी सभी विकल्पों से ज्यादा असरदार है या नहीं। पारंपरिक दफन, दाह संस्कार और टेरामेशन, इन सभी के अपने कुछ लाभ और हानियां हैं। किसी एक पद्धति को सबसे बेहतर ठहराने के लिए अभी पर्याप्त वैज्ञानिक आंकड़े और रिसर्च उपलब्ध नहीं हैं। इसके अलावा लोगों की धार्मिक भावनाएं, सांस्कृतिक मान्यताएं और पारिवारिक इच्छाएं भी इस मामले में बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।
व्यक्तिगत फैसला और जागरूकता
मृत्यु के उपरांत शरीर के साथ क्या किया जाए, यह पूरी तरह से हर इंसान का अपना व्यक्तिगत निर्णय होता है। विशेषज्ञों का मानना है कि लोगों को इन सभी आधुनिक विकल्पों की पूरी जानकारी होनी चाहिए और अपनी अंतिम इच्छा अपने परिजनों के साथ पहले ही साझा कर लेनी चाहिए। इससे कठिन समय में परिवारों को सही और समय पर निर्णय लेने में बड़ी मदद मिलती है।

















