भरणी नक्षत्र और मंगलवार के पावन संयोग में करें ये अचूक उपाय, जीवन के सभी संकट होंगे दूरपति पत्नी और पंगा में छलके रोहित राज गोयल के आंसू, दीपिका सिंह को लेकर कही यह बड़ी बाततुला राशि राशिफल 27 अक्टूबर: राहु के प्रभाव से व्यक्तिगत जोखिम लेने की इच्छा, शनि देंगे सुधार का संदेशआयुर्वेद से बदली तकदीर, नौकरी छोड़कर शुरू किया कारोबार और पहुंच गया 20 करोड़ के पारपश्चिम एशिया में कूटनीतिक बातचीत के बीच सोना 4,000 डॉलर के पार निकला, फेडरल रिजर्व की बैठक पर टिकी नजरेंछतरपुर के डॉ विदित सोनकिया बिना डॉक्टर परिवार के कैसे बने हड्डी रोग विशेषज्ञअमेरिकी डॉलर के मुकाबले जापानी येन में लौटी मजबूती, जानिए प्रमुख वैश्विक बाजारों का रुखत्वचा की खुजली और चकत्तों को न करें नजरअंदाज, जान लें डॉक्टर के पास जाने का सही समयगोवा की फिश करी का क्या है राज, क्यों कोकम और नारियल का मेल बनाता है इसे खासकर्क राशिफल 27 अक्टूबर: नौकरी में नया काम मिले तो इन बातों का रखें खास ध्यान
स्वाधीनता दिवस पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने दी 'दिमागी नक्सल' की चेतावनी, समझिए इस शब्द के सियासी मायने और इतिहासराजनीति
15 अग॰ 2026, 4:20 pm (73 दिन पहले)· 3

स्वाधीनता दिवस पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने दी 'दिमागी नक्सल' की चेतावनी, समझिए इस शब्द के सियासी मायने और इतिहास

15 अगस्त को लाल किले से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हथियारबंद नक्सलवाद के कमजोर होने के बाद 'दिमागी नक्सल' को देश के लिए नई चुनौती बताया. जानिए इस शब्द की पृष्ठभूमि, 'अर्बन नक्सल' से इसका संबंध और इस पर शुरू हुई राजनीतिक चर्चा के तमाम पहलू.

15 अगस्त के ऐतिहासिक अवसर पर लाल किले की प्राचीर से राष्ट्र को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देश की आंतरिक सुरक्षा और वैचारिक चुनौतियों को लेकर एक महत्वपूर्ण विचार प्रस्तुत किया. उन्होंने अपने संबोधन में 'दिमागी नक्सल' शब्द का प्रयोग करते हुए यह स्पष्ट किया कि लंबे समय तक हिंसा का मार्ग अपनाने वाला हथियारबंद नक्सलवाद अब अपने अंतिम दौर में पहुंच चुका है. हालांकि, सुरक्षा बलों की निरंतर कार्रवाइयों के कारण जंगलों में गोलियां चलाने वाले गुट तो कमजोर हुए हैं, लेकिन वैचारिक धरातल पर समाज को भ्रमित करने और अराजकता की राह खोजने वाले तत्व अब भी एक बड़ी चुनौती बने हुए हैं. प्रधानमंत्री का यह वक्तव्य देश के सामने मौजूद इस नए वैचारिक खतरे को रेखांकित करता है और इसे पहचानकर अलग-थलग करने का आह्वान करता है.

'दिमागी नक्सल' की अवधारणा और प्रधानमंत्री मोदी का संदेश

लाल किले के भाषण के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हथियारबंद वामपंथी उग्रवाद के इतिहास और उसके कारण देश को पहुंचे नुकसान का विस्तार से उल्लेख किया. उन्होंने कहा कि लगभग चार दशकों तक देश के विस्तृत भूभाग और विशाल आबादी को बंदूक के बल पर भयभीत करके रखा गया. इस उग्रवादी सोच ने भारतीय संविधान के मूल्यों को भारी क्षति पहुंचाई और देश की शांति को छिन्न-भिन्न कर दिया. नागरिकों की जीवन-रक्षा और कानून-व्यवस्था बनाए रखने के दायित्व को निभाते हुए सुरक्षा बलों के 3,500 से अधिक पुलिसकर्मी और जवान वीरगति को प्राप्त हुए. हिंसा के इस लंबे दौर ने भारत की धरती को रक्तरंजित किया और विकास की गति को रोक दिया.

ये भी पढ़ें

इसी संदर्भ को आगे बढ़ाते हुए प्रधानमंत्री ने 2014 के बाद अपनी सरकार द्वारा उठाए गए कदमों का विवरण दिया. उन्होंने कहा कि वर्ष 2014 में सत्ता संभालने के बाद सरकार ने देश को नक्सली उग्रवाद से पूरी तरह मुक्त कराने का दृढ़ संकल्प लिया था. एकीकृत रणनीतियों और निरंतर सुरक्षा अभियानों के परिणामस्वरूप आज माओवादी हिंसा अंतिम सांसें गिन रही है. जिन क्षेत्रों में कभी नक्सली बंदूकें चला करते थे, आज वहां विकास, जनविश्वास और सामूहिक प्रयास का तिरंगा लहरा रहा है. परंतु, इसी सफलता के साथ प्रधानमंत्री ने सचेत किया कि भौतिक रूप से कमजोर होने के बाद अब यह चुनौती 'दिमागी नक्सल' के रूप में सामने आ रही है, जो गुप्त रूप से हिंसा और सामाजिक वैमनस्य का आधार तैयार करने का प्रयास कर रहे हैं.

राजनीतिक शब्दावली और 'अर्बन नक्सल' से इसकी तुलना

प्रधानमंत्री के भाषण के बाद 'दिमागी नक्सल' शब्द को लेकर देश के राजनीतिक और बौद्धिक हलकों में गंभीर मंथन शुरू हो गया है. वास्तव में, यह शब्द किसी भी भारतीय कानून या वैधानिक संहिता में दर्ज कोई आधिकारिक कानूनी श्रेणी नहीं है. यह एक राजनीतिक और वैचारिक अभिव्यक्ति है, जिसका प्रयोग उन व्यक्तियों या समूहों को इंगित करने के लिए किया जा रहा है जिन पर माओवादी अथवा नक्सली विचारधारा को बौद्धिक और नैतिक समर्थन देने के आरोप लगाए जाते हैं. भारतीय विधि व्यवस्था के अनुसार केवल किसी राजनीतिक श्रेणी या लेबल के आधार पर किसी व्यक्ति को अभियुक्त नहीं ठहराया जा सकता; किसी भी कानूनी कार्रवाई के लिए ठोस साक्ष्य और तय न्यायिक प्रक्रिया अनिवार्य होती है.

इस शब्द को बेहतर ढंग से समझने के लिए हाल के वर्षों में व्यापक रूप से प्रयुक्त हुए 'अर्बन नक्सल' शब्द के संदर्भ को देखना आवश्यक है. सत्तारूढ़ पार्टी और सरकार के समर्थकों द्वारा 'अर्बन नक्सल' शब्द का प्रयोग ऐसे कार्यकर्ताओं, विचारकों, शिक्षाविदों और बुद्धिजीवियों के लिए किया जाता रहा है जिन पर शहरी क्षेत्रों में रहकर माओवादी प्राथमिकताओं को आगे बढ़ाने का संदेह जताया जाता रहा है. अब प्रधानमंत्री द्वारा 'दिमागी नक्सल' कहे जाने के बाद इस विमर्श का दायरा और अधिक व्यापक हो गया है. इसके अंतर्गत उन लोगों को देखा जा रहा है जो प्रत्यक्ष हिंसा में भाग न लेते हुए भी वैचारिक आवरण में अराजकता को तर्कसंगत ठहराने का प्रयास करते हैं.

संस्थागत प्रभाव और सरकार का दृष्टिकोण

सरकार के दृष्टिकोण के अनुसार 'दिमागी नक्सल' की श्रेणी में वे लोग आते हैं जो माओवादी सोच को बौद्धिक वैधता प्रदान करते हैं, युवाओं के मानस को प्रभावित करते हैं और लोकतांत्रिक नीतियों में व्यवधान उत्पन्न करने की चेष्टा करते हैं. प्रधानमंत्री मोदी ने अपने संबोधन में इस बात की ओर भी ध्यान दिलाया कि एक लंबे कालखंड तक इस विचारधारा से प्रभावित लोग सत्ता के गलियारों और प्रमुख संस्थाओं के आसपास प्रभावी स्थिति में रहे. उनके अनुसार ऐसे तत्वों ने विभिन्न समितियों, परामर्शदात्री निकायों और नीति-निर्माण की प्रक्रियाओं को प्रभावित करने का प्रयास किया, जिससे देश के संतुलित विकास में बाधाएं उत्पन्न हुईं.

इस चुनौती से निपटने के लिए प्रधानमंत्री ने दोहरी कार्ययोजना पर बल दिया. प्रथम, ऐसे तत्वों की मंशा को पहचानकर उन्हें सामाजिक और बौद्धिक स्तर पर अलग-थलग किया जाए. द्वितीय, देश की युवा पीढ़ी को भटकने से बचाकर उन्हें 'विकसित भारत' के राष्ट्रीय निर्माण अभियान की मुख्यधारा से जोड़ा जाए. सरकार मानती है कि सुरक्षा बलों का कार्य मैदान में शांति स्थापित करना है, किंतु देश के बौद्धिक वातावरण को सुरक्षित रखना और युवाओं के विचारों को रचनात्मक दिशा देना एक व्यापक सामाजिक व प्रशासनिक दायित्व है.

नक्सलवाद का ऐतिहासिक सफर: 1967 से वर्तमान तक

भारत में वामपंथी उग्रवाद की शुरुआत वर्ष 1967 में पश्चिम बंगाल के नक्सलबाड़ी क्षेत्र से हुई थी. एक छोटे से ग्रामीण उथल-पुथल से शुरू हुआ यह आंदोलन धीरे-धीरे देश के मध्य और पूर्वी भागों के एक बड़े भूभाग में फैल गया. आने वाले दशकों में छत्तीसगढ़, झारखंड, ओडिशा और बिहार जैसे राज्य इस उग्रवादी हिंसा से सर्वाधिक प्रभावित रहे. नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में कानून-व्यवस्था की स्थिति अत्यंत विकट हो गई थी, जिससे आम ग्रामीण और आदिवासी समुदाय वर्षों तक मूलभूत सुविधाओं से वंचित रहे.

इस समस्या के समाधान के लिए भारत सरकार ने केवल सैन्य या पुलिस कार्रवाई पर निर्भर रहने के बजाय एक समन्वित नीति अपनाई. एक ओर जहां उग्रवादी गुटों के विरुद्ध सुरक्षा अभियान चलाए गए, वहीं दूसरी ओर प्रभावित इलाकों में सड़कों का निर्माण, विद्यालयों की स्थापना, स्वास्थ्य सेवाओं का विस्तार और रोजगार के अवसरों का सृजन किया गया. विकास और सुरक्षा के इस संतुलित मॉडल ने उग्रवाद के जनाधार को कमजोर करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है, जिसके कारण आज यह आंदोलन अपने सबसे निचले स्तर पर पहुंच गया है.

लोकतांत्रिक असहमति और उग्रवाद के बीच का अंतर

प्रधानमंत्री के इस भाषण के उपरांत राजनीतिक पटल पर एक विरोधी दृष्टिकोण भी सामने आ रहा है. विपक्षी दलों और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं का तर्क है कि सरकार को इस प्रकार के व्यापक राजनीतिक संबोधनों का प्रयोग करते समय अत्यंत सतर्क रहना चाहिए. लोकतंत्र में सरकार की नीतियों की आलोचना करना, शांतिपूर्ण प्रदर्शन करना और असहमति व्यक्त करना प्रत्येक नागरिक का संवैधानिक अधिकार है. इसलिए, उग्रवादी हिंसा का समर्थन करने और सरकार की नीतियों से असहमत होने के बीच के अंतर को स्पष्ट रूप से समझा जाना चाहिए.

कानूनी विशेषज्ञों का भी यही मत है कि लोकतंत्र की मजबूती के लिए रचनात्मक आलोचना आवश्यक है. किसी भी व्यक्ति के विरुद्ध दंडात्मक कदम उठाने के लिए केवल वैचारिक असहमति पर्याप्त नहीं हो सकती, बल्कि उसके खिलाफ गैर-कानूनी गतिविधियों में संलिप्तता का स्पष्ट और प्रमाणिक आधार होना चाहिए. इस प्रकार, लाल किले से दिए गए इस वक्तव्य ने देश में सुरक्षा, विकास, वैचारिक विमर्श और लोकतांत्रिक अधिकारों के संतुलन पर एक नई बहस को जन्म दे दिया है.

सवाल-जवाब

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 'दिमागी नक्सल' किसे कहा है?
प्रधानमंत्री के अनुसार 'दिमागी नक्सल' वे लोग हैं जो हथियारबंद नक्सलवाद कमजोर होने के बाद वैचारिक स्तर पर हिंसा, अराजकता और असंतोष को बढ़ावा देने का प्रयास करते हैं.
भाषण के अनुसार नक्सली हिंसा में कितने सुरक्षाबल शहीद हुए हैं?
प्रधानमंत्री के भाषण के मुताबिक पिछले चार दशकों में नक्सलवाद से नागरिकों की रक्षा करते हुए 3,500 से अधिक पुलिस और सुरक्षा बल के जवान शहीद हुए हैं.
क्या 'दिमागी नक्सल' भारतीय कानून में कोई परिभाषित कानूनी अपराध है?
नहीं, 'दिमागी नक्सल' भारतीय कानून में परिभाषित कोई आधिकारिक कानूनी श्रेणी नहीं है. किसी भी कानूनी कार्रवाई के लिए तय साक्ष्यों और अदालती प्रक्रिया की आवश्यकता होती है.
भारत में नक्सली आंदोलन की शुरुआत कब और कहां से हुई थी?
भारत में नक्सली आंदोलन की शुरुआत वर्ष 1967 में पश्चिम बंगाल के नक्सलबाड़ी क्षेत्र से हुई थी.
'दिमागी नक्सल' और 'अर्बन नक्सल' में क्या अंतर या संबंध है?
'अर्बन नक्सल' का प्रयोग शहरों में माओवादी विचारधारा का समर्थन करने का आरोप झेलने वाले बुद्धिजीवियों के लिए होता रहा है, जबकि 'दिमागी नक्सल' शब्द वैचारिक और मानसिक स्तर पर फैलाए जा रहे प्रभाव को दर्शाता है.
इस बयान पर विपक्ष का क्या रुख है?
विपक्ष का कहना है कि सरकार की नीतियों की आलोचना करना लोकतंत्र में संवैधानिक अधिकार है और शांतिपूर्ण असहमति को हिंसा के समर्थन से अलग देखा जाना चाहिए.
संपादकीय नीति सुधार नीति

टिप्पणियाँ 5

Ayesha Siddiqui@ayesha-siddiqui·72 दिन पहले

प्रधानमंत्री का यह बयान भारत की आंतरिक सुरक्षा नीति में एक महत्वपूर्ण वैचारिक बदलाव का संकेत देता है, जहां अब सशस्त्र संघर्ष के स्थान पर बौद्धिक और वैचारिक स्तर पर नियंत्रण पाने की रणनीति पर ज़ोर दिया जा रहा है। दक्षिण एशिया के सुरक्षा परिदृश्य के मद्देनज़र, यह देखना अहम होगा कि कानून और वैधानिक परिभाषाओं के दायरे से बाहर इस अवधारणा को किस प्रकार लागू किया जाता है और इसके दीर्घकालिक सामाजिक-राजनीतिक प्रभाव क्या होंगे।

Ravikash Gupta@ravikash·72 दिन पहले

लाल किले से दिए गए इस संबोधन में सुरक्षा बलों की सफलताओं के बीच आंतरिक वैचारिक चुनौतियों का जो नया आयाम रखा गया है, वह कॉर्पोरेट治理, स्टार्टअप इकोसिस्टम और निवेशकों के दृष्टिकोण से बेहद महत्वपूर्ण है। जब देश की आंतरिक सुरक्षा और वैचारिक स्थिरता की बात होती है, तो इसका सीधा असर वैश्विक निवेशकों के भरोसे, वित्तीय बाजारों के जोखिम मूल्यांकन और दीर्घकालिक कॉर्पोरेट रणनीतियों पर पड़ता है। बाजार की अनिश्चितताओं के इस दौर में आंतरिक स्थिरता और सुशासन ही वह आधार है जो देश को वैश्विक निवेश का एक सुरक्षित और आकर्षक केंद्र बनाता है।

Meera Joshi@meera-joshi·72 दिन पहले

एक रिश्ते एवं वेलनेस विशेषज्ञ के रूप में, मैं इस बात को रेखांकित करना चाहूँगी कि वैचारिक धरातल पर पनपने वाला यह तनाव समाज के मानसिक स्वास्थ्य और आपसी जुड़ाव पर गहरा असर डालता है। जब समाज में वैचारिक ध्रुवीकरण और अविश्वास की स्थिति बढ़ती है, तो इसका सीधा प्रभाव पारिवारिक संबंधों, कार्यस्थलों और व्यक्तिगत मानसिक कल्याण पर पड़ता है। आंतरिक शांति और भावनात्मक स्थिरता ही किसी स्वस्थ समाज और मजबूत राष्ट्र की नींव होती है।

Rohan Verma@rohan-verma·72 दिन पहले

लाल किले से प्रधानमंत्री द्वारा 'दिमागी नक्सल' का मुद्दा उठाया जाना यह संकेत देता है कि अब सुरक्षा एजेंसियों की रणनीति केवल जंगलों तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि वैचारिक मोर्चे पर भी इसका दायरा बढ़ाया जाएगा। उत्तर प्रदेश और अन्य हिंदी पट्टी के राज्यों में इस शब्दावली के आने से राजनीतिक बयानबाजी और तेज होगी, जिससे बौद्धिक और वैचारिक बहसों का एक नया दौर शुरू होना तय है।

Karan Malhotra@karan-malhotra·72 दिन पहले

प्रधानमंत्री के इस संबोधन के बाद अब सुरक्षा एजेंसियों के सामने एक नया और जटिल टास्क होगा। जंगलों में हथियारबंद उग्रवाद से लड़ने के बाद, खुफिया इकाइयों को अब उन नेटवर्क को ट्रैक करना होगा जो वैचारिक स्तर पर समाज को प्रभावित कर रहे हैं। कानूनी दायरे में रहकर इन गतिविधियों की निगरानी करना पुलिस और जांच एजेंसियों के लिए एक बड़ी चुनौती साबित होगा, क्योंकि वैचारिक मतभेद और आपराधिक षड्यंत्र के बीच की बारीक रेखा को साबित करना अदालतों में आसान नहीं होगा।

नागरिक पत्रकारिता

TrendKia पत्रकार बनें

जनता की आवाज़

अपने आसपास की ख़बरें, तस्वीरें और वीडियो ट्रेंडकिआ के साथ साझा करें और अपनी आवाज़ देश तक पहुँचाएँ। हर नागरिक एक पत्रकार।

अभी जुड़ें
CH 01 लाइव
TrendKia TV ON AIR
Chamar no WhatsApp