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उत्तर प्रदेश चुनाव में राहुल गांधी की युवा केंद्रित रणनीति और योगी आदित्यनाथ की पारंपरिक पिच के बीच बढ़ा सियासी घमासानराजनीति
14 अग॰ 2026, 9:47 pm (1 घंटे पहले)· 3

उत्तर प्रदेश चुनाव में राहुल गांधी की युवा केंद्रित रणनीति और योगी आदित्यनाथ की पारंपरिक पिच के बीच बढ़ा सियासी घमासान

उत्तर प्रदेश के आगामी विधानसभा चुनाव को लेकर राजनीतिक हलचल तेज हो गई है, जहां विपक्ष युवा मतदाताओं को रिझाने में जुटा है, वहीं सत्ता पक्ष अपने पारंपरिक हिंदुत्व कार्ड और कोर वोट बैंक पर भरोसा जता रहा है।

उत्तर प्रदेश के आगामी चुनावी समर को ध्यान में रखते हुए प्रमुख राजनीतिक दल नई रणनीतियों पर काम कर रहे हैं। कांग्रेस नेता राहुल गांधी और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के हालिया सियासी बयानों ने राज्य के भावी चुनावी मुद्दों की झलक पेश कर दी है। राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, जहां एक तरफ राहुल गांधी नए हावभाव और आक्रामक तेवरों के साथ युवाओं तथा खासकर जेन ज़ेड वर्ग को अपनी ओर आकर्षित करने की कोशिश में जुटे हैं, वहीं दूसरी तरफ मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ अपनी पुरानी और आजमाई हुई हिंदुत्व केंद्रित रणनीति पर कायम हैं। इस सियासी जोड़-तोड़ के बीच यह सवाल बेहद महत्वपूर्ण हो गया है कि क्या केवल युवाओं का रुझान चुनावी बाजी पलटने के लिए काफी होगा या फिर पारंपरिक समीकरण ही निर्णायक साबित होंगे।

चुनावी राजनीति में 18 से 29 वर्ष के युवा वर्ग का गणित

देश की कुल आबादी में 18 से 29 वर्ष के मतदाताओं, जिन्हें आमतौर पर जेन ज़ेड कहा जाता है, की हिस्सेदारी लगभग 25 प्रतिशत है। राजनीतिक दृष्टि से यह एक बड़ा आंकड़ा है, लेकिन चुनावी विश्लेषकों का मानना है कि केवल इसी आयु वर्ग का असंतोष या रुझान पूरे नतीजे बदलने के लिए पर्याप्त नहीं हो सकता। चुनावी सफलता के लिए बाकी बचे 75 प्रतिशत मतदाताओं को साधे रखना भी उतना ही अनिवार्य है। इसके बावजूद युवा वर्ग की एक विशेष खासियत यह है कि उनकी राजनीतिक निष्ठा स्थायी नहीं होती और वे तेजी से अपनी पसंद बदल सकते हैं। इसके अलावा, युवा मतदाता अपने परिवार के वरिष्ठ सदस्यों और माता-पिता की राजनीतिक सोच को प्रभावित करने की क्षमता भी रखते हैं।

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दक्षिण भारतीय राज्य तमिलनाडु के हालिया विधानसभा चुनाव को इस सामाजिक बदलाव के उदाहरण के रूप में देखा जा रहा है। वहां इंस्टाग्राम जैसे सोशल मीडिया मंचों ने चुनावी विमर्श तैयार करने में बड़ी भूमिका निभाई थी, जहां युवाओं द्वारा बनाए गए नैरेटिव ने उनके परिवारों के बड़े-बुजुर्गों के मतदान के फैसले को भी प्रभावित किया। जंतर-मंतर पर होने वाले युवा प्रदर्शनों और सोशल मीडिया पर उभरते ट्रेंड्स को भी राजनीतिक दल हल्के में नहीं ले सकते। यही वजह है कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और सत्ताधारी दल की ओर से भी युवा पीढ़ी तक अपनी बात पहुंचाने के लिए नए प्रयास किए जा रहे हैं।

'बटोगे तो कटोगे' और हिंदुत्व के जरिए कैडर को साधने की रणनीति

दूसरी ओर, मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का सियासी अंदाज पूरी तरह से उनकी स्थापित पिच पर टिका हुआ है। उनके हालिया बयान 'बटोगे तो कटोगे' को इसी रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है। वर्ष 2017 और 2022 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों में भारतीय जनता पार्टी को मिले स्पष्ट जनादेश के पीछे इसी तरह का वैचारिक और धार्मिक ध्रुवीकरण एक प्रमुख कारक रहा था। ऐसे में अपनी सफल और परखी हुई रणनीति से पीछे हटना उनके लिए राजनीतिक रूप से जोखिम भरा साबित हो सकता है।

यह धारणा भी खारिज की जा रही है कि युवा मतदाता केवल सोशल मीडिया पर सक्रिय रहने वाले शहरी वर्ग तक ही सीमित हैं। हर साल आयोजित होने वाली कांवड़ यात्रा में लाखों युवाओं की भारी भागीदारी इस बात का प्रमाण है कि सांस्कृतिक और धार्मिक मुद्दों का प्रभाव ग्रामीण और अर्ध-शहरी युवाओं पर भी गहराई से बना हुआ है। इसलिए यह मान लेना भूल होगी कि युवा वर्ग पूरी तरह से पारंपरिक राजनीति से दूर हो चुका है।

युवा मतदाता वर्ग का सामाजिक ढांचा और 2024 के चुनावी सबक

राजनीतिक जानकारों का स्पष्ट कहना है कि युवाओं को एक समान सोच वाला वोट बैंक मानना बहुत बड़ी भूल होगी। युवा वर्ग के भीतर भी जाति, धर्म, ग्रामीण बनाम शहरी पृष्ठभूमि, शैक्षणिक स्तर और आर्थिक स्थिति के आधार पर गहरा विभाजन मौजूद है। यही वजह है कि विभिन्न सामाजिक पृष्ठभूमि से आने वाले युवाओं की प्राथमिकताएं और राजनीतिक पसंद एक-दूसरे से काफी अलग होती हैं।

अगर उत्तर प्रदेश में पिछले चुनावों के आंकड़ों पर नजर डालें तो 2019 के लोकसभा चुनाव, 2022 के विधानसभा चुनाव और हालिया 2024 के लोकसभा चुनाव के दौरान वोट प्रतिशत में उतार-चढ़ाव देखने को मिला है। 2024 के लोकसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी के वोट शेयर में आई गिरावट और विपक्षी गठबंधन के प्रदर्शन ने यह साबित किया है कि किसी भी एक वोट ब्लॉक को हमेशा के लिए अपने साथ मान लेना सही नहीं है। जनसांख्यिकीय बदलावों के साथ मतदाताओं की अपेक्षाएं भी बदल रही हैं।

रोजगार का सवाल, प्रशासनिक चुनौतियां और भावी चुनावी मुद्दे

युवाओं के लिए सबसे बड़ा और संवेदनशील मुद्दा रोजगार और बेरोजगारी का बना हुआ है। हालांकि विपक्ष और राहुल गांधी लगातार बेरोजगारी पर सरकार को घेर रहे हैं, लेकिन विश्लेषकों का मानना है कि विपक्ष की ओर से अब तक रोजगार सृजन का कोई स्पष्ट और ठोस ढांचा जनता के सामने पेश नहीं किया गया है। दूसरी तरफ, सत्ता पक्ष की यह जिम्मेदारी है कि वह रोजगार, आर्थिक वृद्धि और सरकारी योजनाओं की जमीनी उपलब्धियों से जुड़े तथ्यों को युवाओं तक ज्यादा प्रभावी ढंग से पहुंचाए।

आगामी उत्तर प्रदेश चुनाव में सत्ता विरोधी लहर के कई अन्य कारक भी सामने आ सकते हैं। स्थानीय विधायकों के प्रति जनता और कार्यकर्ताओं की नाराजगी तथा निचले स्तर की नौकरशाही में व्याप्त भ्रष्टाचार चुनाव के प्रमुख मुद्दे बन सकते हैं। इसके अलावा, सरकारी नौकरियों की भर्ती में पेपर लीक की घटनाएं, बेरोजगारी, महंगाई और राम मंदिर निर्माण जैसे विषय चुनावी विमर्श का केंद्र बने रहेंगे। जहां विपक्ष के सामने जटिल जातीय समीकरणों को साधने की चुनौती होगी, वहीं सत्ता पक्ष हिंदू वोटों के एकत्रीकरण के जरिए मुकाबले को अपने पक्ष में मोड़ने का प्रयास करेगा।

सवाल-जवाब

उत्तर प्रदेश की कुल आबादी में 18 से 29 वर्ष के मतदाताओं का कितना हिस्सा है?
देश और राज्य की कुल आबादी में 18 से 29 वर्ष के युवाओं (जेन ज़ेड) की हिस्सेदारी लगभग 25 प्रतिशत है।
क्या केवल युवा वोटरों का समर्थन उत्तर प्रदेश चुनाव का नतीजा बदल सकता है?
नहीं, क्योंकि बाकी 75 प्रतिशत मतदाता भी चुनावी नतीजे तय करने में बराबर की भूमिका निभाते हैं, हालांकि युवा अपने परिवार को प्रभावित करने की क्षमता रखते हैं।
तमिलनाडु चुनाव का उदाहरण इस चर्चा में क्यों दिया गया?
तमिलनाडु में इंस्टाग्राम और सोशल मीडिया के जरिए बने नैरेटिव ने युवाओं के माध्यम से उनके परिवार के बड़े सदस्यों के मतदान के फैसलों पर भी असर डाला था।
आगामी उत्तर प्रदेश चुनाव में युवाओं के लिए मुख्य मुद्दे क्या हैं?
रोजगार, भर्ती परीक्षाओं में पेपर लीक, महंगाई, स्थानीय विधायकों से नाराजगी और प्रशासनिक भ्रष्टाचार मुख्य मुद्दे बने हुए हैं।
संपादकीय नीति सुधार नीति

टिप्पणियाँ 2

Karan Malhotra@karan-malhotra·18 मिनट पहले

अपराध और कानून-व्यवस्था के मोर्चे पर चुनावों के दौरान युवाओं की भूमिका का आकलन करना आवश्यक है। यह स्पष्ट है कि 18 से 29 वर्ष के मतदाताओं का यह 25 प्रतिशत वर्ग केवल राजनीतिक दिशा ही तय नहीं करता, बल्कि सोशल मीडिया के माध्यम से सुरक्षा, न्याय और राज्य में कानून के राज जैसे संवेदनशील मुद्दों पर सार्वजनिक बहस की दिशा को भी सीधे तौर पर प्रभावित करता है।

Rohan Verma@rohan-verma·17 मिनट पहले

अपराध और शासन के मामलों में यह युवा वर्ग अब पारंपरिक दावों से आगे बढ़कर डिजिटल साक्ष्यों और त्वरित जवाबदेही की मांग कर रहा है। ज़मीनी स्तर पर कानून-व्यवस्था का यह बदलता एजेंडा आगामी चुनावों में राजनीतिक दलों के पारंपरिक बयानों को परखने का एक बड़ा माध्यम बनने जा रहा है।

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