भारतीय राजनीति का माहौल हमेशा से मौसम की तरह अनिश्चित रहा है। कुछ समय पहले तक ऐसा लग रहा था कि आगामी विधानसभा चुनाव का केंद्र अयोध्या के राम मंदिर में सामने आया चढ़ावा चोरी का विवाद ही रहेगा। उस दौरान समाजवादी पार्टी के प्रमुख अखिलेश यादव इस मामले को लेकर सरकार पर काफी आक्रामक नजर आ रहे थे। लेकिन राष्ट्रीय राजधानी के जंतर-मंतर पर भड़के छात्र आंदोलन, नीट पेपर लीक विवाद और कॉकरोच जनता पार्टी के नेतृत्व वाले युवा प्रदर्शनों ने पूरे राजनीतिक पटल की तस्वीर ही पलट कर रख दी है।
छात्रों के मुद्दों पर केंद्रित हुई सियासत
केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे के बाद सत्तारूढ़ दल और मुख्य विपक्षी दल दोनों ही युवा वर्ग से जुड़े मुद्दों पर पूरी तरह फोकस करने लगे हैं। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की रैलियों में भी छात्रों और युवाओं की चिंताओं को प्रमुखता से उठाया जा रहा है। इसके साथ ही, अखिलेश यादव भी सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर लगातार युवाओं के पक्ष में पोस्ट साझा कर रहे हैं। इस अचानक हुए बदलाव के बाद राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा जोरों पर है कि क्या चुनाव के मुद्दे पूरी तरह बदल चुके हैं।
जंतर-मंतर के प्रदर्शन और परीक्षा विवाद
सोनम वांगचुक और कॉकरोच जनता पार्टी की अगुवाई में जंतर-मंतर पर हुए विरोध प्रदर्शन और अनशन के बाद यह सवाल गंभीर रूप से उठ रहा है कि क्या राम मंदिर का विषय अब पृष्ठभूमि में चला जाएगा। क्या अब आगामी चुनावी बाजी पूरी तरह युवाओं के आक्रोश और उनकी आकांक्षाओं के इर्द-गिर्द ही खेली जाएगी? अयोध्या के मंदिर परिसर में दान राशि की गिनती में गड़बड़ी और उसके बाद हुई कर्मचारियों की बर्खास्तगी को विपक्ष ने एक बड़ा हथियार बना लिया था।
चंदा चोरी से लेकर पेपर लीक तक का सफर
विपक्षी खेमा इस कथित भ्रष्टाचार को हिंदुत्व के केंद्र में रखकर सीधे मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को घेरने का प्रयास कर रहा था। इस प्रकरण के जरिए हर वर्ग के सामने नैतिक सवाल खड़े किए जा रहे थे। हालांकि, नीट-यूजी परीक्षा लीक होने के बाद दिल्ली में कॉकरोच जनता पार्टी का आंदोलन शुरू हुआ और केंद्रीय शिक्षा मंत्री को अपना पद छोड़ना पड़ा। इस घटनाक्रम ने प्रदेश के लाखों प्रतियोगी छात्रों के भीतर भारी असंतोष और उबाल पैदा कर दिया है।
प्रत्येक घर से जुड़ा है परीक्षा का मुद्दा
उत्तर प्रदेश के लगभग हर परिवार से कोई न कोई युवा प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी में जुटा रहता है। राष्ट्रीय राजधानी में छात्रों के ऊपर हुई पुलिस कार्रवाई और एक के बाद एक लगातार रद्द होती परीक्षाओं ने युवाओं के गुस्से को सीधे तौर पर चुनावी राजनीति से जोड़ दिया है। इस स्थिति को भांपते हुए अखिलेश यादव ने बिना कोई वक्त गंवाए दान विवाद के साथ-साथ पेपर लीक और राष्ट्रीय परीक्षण एजेंसी के पुनर्गठन को अपनी मुख्य राजनीतिक रणनीति बना लिया है।
सत्ता पक्ष और विपक्ष की रणनीतियां
अखिलेश यादव इस समय उस राजनीतिक पिच पर बल्लेबाजी कर रहे हैं जिसे युवा असंतोष और पिछड़े, दलित तथा अल्पसंख्यक गठजोड़ के आधार पर तैयार किया गया है। वे प्रशासनिक विफलता, भर्ती परीक्षाओं में धांधली और युवाओं के भविष्य के साथ खिलवाड़ जैसे विषयों पर लगातार हमलावर रुख अपनाए हुए हैं। दूसरी तरफ, मुख्यमंत्री इस बात को भली-भांति समझ चुके हैं कि युवाओं की नाराजगी से आगामी चुनाव में बड़ा राजनीतिक नुकसान उठाना पड़ सकता है।
सरकार के स्तर पर उठाए गए कदम
इस चुनौती से निपटने के लिए केंद्र सरकार ने सख्त एंटी-चीटिंग कानून लागू करने और नंदन नीलेकणि आयोग के गठन जैसे महत्वपूर्ण फैसले लिए हैं। वहीं दूसरी ओर, राज्य सरकार बुलडोजर कार्रवाई के जरिए पेपर लीक माफियाओं पर नकेल कसकर अपनी स्थिति मजबूत करने में जुटी है। विश्लेषकों का मानना है कि राम मंदिर से जुड़ा चंदा चोरी का मामला पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ है, बल्कि राजनीतिक रूप से फिलहाल शांत पड़ गया है।
आगामी चुनाव की असली तस्वीर
जब देश की अदालतें और विशेष जांच दल इस मामले की कानूनी पड़ताल कर रहे हैं, तब प्रशासन इसे एक प्रशासनिक चूक बताकर स्थिति को संभालने का प्रयास कर चुका है। इसके विपरीत, नीट विवाद और बेरोजगारी ऐसे प्रत्यक्ष मुद्दे हैं जो सीधे आम नागरिकों के घरों से जुड़े हुए हैं। यही कारण है कि आगामी चुनाव में मुकाबला मुख्य रूप से हिंदुत्व और विकास बनाम पेपर लीक और बेरोजगारी के बीच ही केंद्रित रहने की पूरी संभावना है।



















