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उत्तर प्रदेश चुनाव 2027: ओल्ड पेंशन स्कीम के सहारे अखिलेश यादव, क्या चुनावी राजनीति में काम आएगा यह मास्टरस्ट्रोकराजनीति
28 सित॰ 2026, 4:46 pm (29 दिन पहले)· 8

उत्तर प्रदेश चुनाव 2027: ओल्ड पेंशन स्कीम के सहारे अखिलेश यादव, क्या चुनावी राजनीति में काम आएगा यह मास्टरस्ट्रोक

उत्तर प्रदेश के आगामी 2027 के विधानसभा चुनावों से पहले राजनीतिक दलों ने अपनी तैयारियां तेज कर दी हैं। समाजवादी पार्टी के प्रमुख अखिलेश यादव ने पुरानी पेंशन योजना बहाल करने का वादा किया है, जबकि योगी आदित्यनाथ सरकार महिला वोटबैंक को साधने के लिए आर्थिक सहायता पर विचार कर रही है।

उत्तर प्रदेश में साल 2027 के विधानसभा चुनाव को लेकर चुनाव आयोग ने अभी तक आधिकारिक तारीखों का ऐलान नहीं किया है, लेकिन राजनीतिक दलों के बीच वादों और रणनीतियों की बयार अभी से बहने लगी है। भारतीय जनता पार्टी जहाँ एक बार फिर सत्ता पर काबिज होने के लिए अपनी राजनीतिक बिसात बिछाने में जुटी है, वहीं समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव ने एक बड़ा राजनीतिक दांव चल दिया है। अखिलेश यादव ने राज्य के लाखों कर्मचारियों और शिक्षकों को अपने पाले में करने के लिए पुरानी पेंशन योजना यानी OPS की बहाली का मास्टरकार्ड खेल दिया है। हालांकि, चुनावी राजनीति और अर्थव्यवस्था के आंकड़े इस बात पर गंभीर सवाल खड़े करते हैं कि क्या यह दांव वास्तव में चुनावी नैया पार लगा पाएगा या फिर यह वित्तीय और राजनीतिक मोर्चे पर एक पेचीदा चुनौती साबित होगा।

कांग्रेस के पुराने अनुभवों से क्या सीख मिलती है

अखिलेश यादव जिस पुरानी पेंशन योजना के बल पर सरकारी कर्मचारियों के वोटों को एकजुट करने की कोशिश कर रहे हैं, उसकी चुनावी उपयोगिता का इतिहास बहुत अधिक उत्साहजनक नहीं रहा है। इस वादे की जमीनी हकीकत को उनकी सहयोगी पार्टी कांग्रेस के हालिया ट्रैक रिकॉर्ड के जरिए आसानी से समझा जा सकता है। साल 2022 के विधानसभा चुनावों में कांग्रेस ने हिमाचल प्रदेश में पुरानी पेंशन बहाली का वादा करके जीत हासिल की थी, लेकिन सरकार बनने के बाद उस वादे को जमीन पर उतारने में राज्य को भारी बजट संकट का सामना करना पड़ा। इसी तरह राजस्थान और छत्तीसगढ़ की तत्कालीन कांग्रेस सरकारों ने भी कैबिनेट बैठक में ओल्ड पेंशन स्कीम लागू करने का औपचारिक फैसला लिया था। लेकिन जब साल 2023 के विधानसभा चुनाव हुए, तो कर्मचारियों से किए गए इस बड़े वादे के बावजूद जनता ने कांग्रेस को सत्ता से बाहर का रास्ता दिखा दिया।

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हरियाणा और मध्य प्रदेश में भी नहीं चला पेंशन का जादू

कांग्रेस पार्टी ने हरियाणा और मध्य प्रदेश के विधानसभा चुनावों में भी पुरानी पेंशन योजना की बहाली को अपने प्रचार का सबसे मुख्य मुद्दा बनाया था। इसके बावजूद चुनावी नतीजों में इस वादे का कोई खास असर दिखाई नहीं दिया और दोनों ही राज्यों में भारतीय जनता पार्टी ने अपनी सरकार बनाई। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि सरकारी कर्मचारी बेशक एक बेहद संगठित और मुखर वोट बैंक माने जाते हैं, लेकिन कुल मतदाताओं की संख्या के मुकाबले इनकी हिस्सेदारी अमूमन तीन से पांच प्रतिशत के आसपास ही होती है। आम जनता से जुड़े बड़े और बुनियादी मुद्दे जैसे कि किसान, युवा और महिलाओं के सरोकार इस पेंशन के मुद्दे को अक्सर पीछे धकेल देते हैं।

उत्तर प्रदेश में ओल्ड पेंशन स्कीम लागू करने की बड़ी वित्तीय चुनौतियां

यदि साल 2027 के चुनाव में समाजवादी पार्टी की सरकार बन भी जाती है, तो उत्तर प्रदेश जैसे विशाल राज्य में पुरानी पेंशन योजना को दोबारा लागू करना वित्तीय रूप से बेहद कठिन और चुनौतीपूर्ण साबित होगा। इस समय उत्तर प्रदेश में पंद्रह लाख से अधिक नियमित सरकारी कर्मचारी और शिक्षक कार्यरत हैं। यदि वर्तमान में चल रही नई पेंशन योजना यानी NPS की जगह पुरानी पेंशन योजना को फिर से बहाल किया जाता है, तो राज्य के सरकारी खजाने पर हर साल हजारों करोड़ रुपये का अतिरिक्त बोझ पड़ जाएगा। मौजूदा समय में भी उत्तर प्रदेश सरकार के कुल बजट का एक बहुत बड़ा हिस्सा केवल कर्मचारियों के वेतन और पेंशन के भुगतान में ही खर्च हो जाता है। ऐसी स्थिति में ओल्ड पेंशन स्कीम के लागू होने से सड़क निर्माण, एक्सप्रेसवे, मेट्रो परियोजनाओं और तमाम जनकल्याणकारी योजनाओं के बजट पर बहुत बुरा असर पड़ सकता है।

केंद्र सरकार की यूनिफाइड पेंशन स्कीम का असर

केंद्र सरकार की ओर से हाल ही में लाई गई यूनिफाइड पेंशन स्कीम यानी UPS ने ओल्ड पेंशन स्कीम के इस राजनीतिक मुद्दे की धार को काफी हद तक कम कर दिया है। यूपीएस के तहत पुरानी व्यवस्था की तुलना में एक निश्चित पेंशन यानी कर्मचारी के अंतिम वेतन का पचास प्रतिशत हिस्सा मिलने की गारंटी दी गई है, जिससे कर्मचारियों का एक बड़ा वर्ग संतुष्ट नजर आ रहा है। इस केंद्र सरकार की योजना ने राज्य स्तर पर विपक्ष के इस बड़े चुनावी हथियार के असर को थोड़ा हल्का कर दिया है, जिससे राजनीतिक दलों को अब और अधिक रणनीतिक मंथन करने की जरूरत महसूस हो रही है।

अखिलेश यादव के सामने सबसे बड़ी राजनीतिक और आर्थिक परीक्षा

अखिलेश यादव के लिए पुरानी पेंशन योजना का यह ऐलान केवल सरकारी कर्मचारियों को रिझाने भर का जरिया नहीं है, बल्कि यह बीजेपी के लाभार्थी और कल्याणकारी एजेंडे का सीधा मुकाबला करने की एक बड़ी कोशिश है। हालांकि, चुनावी जमीन पर केवल पेंशन के सहारे चुनावी बाजी को पलट देना आसान काम नहीं होगा। यदि अखिलेश यादव को साल 2027 में सत्ता में वापसी करनी है, तो उन्हें इस वादे के साथ-साथ राज्य के विशाल किसान वर्ग, बेरोजगार युवाओं और अति-पिछड़े समुदायों के लिए भी एक ठोस और वित्तीय रूप से व्यावहारिक विजन पेश करना होगा।

विपक्षी खेमे की रणनीति और चुनावी मुकाबला

एक तरफ जहां अखिलेश यादव अपने पीडीए और ओल्ड पेंशन स्कीम के दांव के साथ मैदान में उतर रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ योगी आदित्यनाथ सरकार राज्य की आधी आबादी को साधने के लिए पचास हजार रुपये तक की आर्थिक सहायता वाली प्रोत्साहन योजना लाने पर विचार कर रही है। अब आने वाला समय ही यह तय करेगा कि समाजवादी पार्टी का यह पेंशन वाला दांव भारतीय जनता पार्टी की जनकल्याणकारी योजनाओं के सामने कितना टिक पाता है और मतदाता किस दिशा में अपना मन बनाते हैं।

सवाल-जवाब

उत्तर प्रदेश में आगामी विधानसभा चुनाव किस वर्ष होने हैं?
उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव वर्ष 2027 में प्रस्तावित हैं।
अखिलेश यादव ने चुनाव से पहले कौन सा मुख्य वादा किया है?
अखिलेश यादव ने 2027 में समाजवादी पार्टी की सरकार बनने पर पुरानी पेंशन योजना बहाल करने का ऐलान किया है।
उत्तर प्रदेश में कुल कितने सरकारी कर्मचारी और शिक्षक हैं?
उत्तर प्रदेश में लगभग 15 लाख से अधिक सरकारी कर्मचारी और शिक्षक हैं।
केंद्र सरकार ने पेंशन को लेकर कौन सी योजना शुरू की है?
केंद्र सरकार ने यूनिफाइड पेंशन स्कीम शुरू की है जिसके तहत अंतिम वेतन का 50 प्रतिशत निश्चित पेंशन की गारंटी दी गई है।
योगी आदित्यनाथ सरकार महिलाओं के लिए कौन सी योजना पर विचार कर रही है?
योगी सरकार आधी आबादी को साधने के लिए 50,000 रुपये तक की आर्थिक सहायता योजना लाने पर विचार कर रही है।
कांग्रेस ने किस राज्य में ओपीएस के सहारे चुनाव जीता था?
कांग्रेस ने साल 2022 के विधानसभा चुनाव में हिमाचल प्रदेश में पुरानी पेंशन बहाली के वादे के साथ जीत दर्ज की थी।
कुल मतदाताओं की तुलना में सरकारी कर्मचारियों की हिस्सेदारी कितनी है?
सरकारी कर्मचारियों की हिस्सेदारी कुल मतदाताओं की तुलना में लगभग 3 से 5 प्रतिशत होती है।
ओपीएस लागू होने से राज्य के खजाने पर क्या असर पड़ेगा?
ओपीएस लागू होने से राज्य के खजाने पर सालाना हजारों करोड़ रुपये का अतिरिक्त पेंशन बोझ पड़ेगा।
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टिप्पणियाँ 5

Ayesha Siddiqui@ayesha-siddiqui·28 दिन पहले

कर्मचारियों को लुभाने के लिए पुरानी पेंशन का दांव तो चल दिया, पर यूपी जैसे बड़े राज्य का खजाना इसका बोझ कैसे उठाएगा?

Neha Verma@neha-verma·28 दिन पहले

आयशा जी, वही तो! हिमाचल और राजस्थान के हाल देख कर लगता नहीं कि ये दांव यूपी की बड़ी अर्थव्यवस्था संभाल पाएगा।

Karan Malhotra@karan-malhotra·28 दिन पहले

सरकारी कर्मचारियों के वोट के चक्कर में पुराना दांव फिर चल दिया है। हिमाचल और राजस्थान में कांग्रेस का हश्र देख चुके हैं, फिर भी वही गलती दोहराई जा रही है। यूपी का बजट वैसे ही भारी दबाव में है, ऐसे में यह वादा सिर्फ कागजी साबित होगा।

Ravikash Gupta@ravikash·28 दिन पहले

करण भाई, बात बिल्कुल सही कही। हिमाचल और राजस्थान का हाल सबने देखा है, फिर भी चुनावी फायदे के लिए ऐसे दांव खेले जा रहे हैं जो आगे चलकर बजट बिगाड़ देते हैं।

Rohan Verma@rohan-verma·28 दिन पहले

लखनऊ के सरकारी दफ्तर में जब भी जाता हूँ, कर्मचारी ओपीएस पर ही बात करते मिलते हैं। पर वोट सिर्फ इनसे थोड़ी मिलते हैं।

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