उत्तर प्रदेश की राजनीति में 2027 के विधानसभा चुनाव की तपिश अभी से साफ महसूस होने लगी है। सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों ही मतदाताओं की नब्ज पकड़ने के लिए पूरी ताकत झोंक रहे हैं। इस सियासी अखाड़े में दोनों प्रमुख दल रणनीतिक नैरेटिव गढ़ने में लगे हैं। सूबे के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ कानून व्यवस्था, बुलडोजर कार्रवाई और सांस्कृतिक हिंदुत्व के अपने पुराने एजेंडे को धार दे रहे हैं। इसके विपरीत, समाजवादी पार्टी के मुखिया अखिलेश यादव पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक यानी पीडीए गठबंधन के साथ माइक्रो लेवल रणनीति तैयार कर रहे हैं। हालांकि पिछले चंद महीनों की हलचल पर नजर डालें तो कई ऐसे मुद्दे उभरे, जिन पर राजनीतिक तापमान अचानक चढ़ा जरूर, मगर सरकार के पलटवार के बाद उनका सियासी असर उतनी ही तेजी से शांत भी हो गया।
रोजगार और भर्ती परीक्षाओं पर छिड़ा सियासी घमासान
राजधानी लखनऊ की सड़कों पर पिछले दिनों बेरोजगार युवाओं का जबरदस्त आंदोलन देखने को मिला। अभ्यर्थी यूपीएसएसएससी परीक्षाओं में वेटिंग लिस्ट प्रणाली अनिवार्य करने की मांग को लेकर लामबंद हुए थे। माहौल भांपते हुए अखिलेश यादव तुरंत युवाओं के बीच पहुंच गए। उन्होंने प्रदर्शनकारियों को भरोसा दिलाया कि सूबे में समाजवादी पार्टी की सरकार बनते ही प्रतीक्षा सूची का नियम तुरंत अमल में लाया जाएगा। सपा के इस दांव से सरकार पर दबाव बनने लगा था, लेकिन मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने बिना देर किए बड़ा प्रशासनिक कदम उठा लिया। उन्होंने आने वाले छह महीनों के भीतर एक लाख सरकारी पदों पर पारदर्शी भर्तियां करने का एलान कर दिया। जैसे ही इस भारी भरकम भर्ती योजना की घोषणा हुई, विपक्ष का तीखा विरोध अचानक कमजोर पड़ता दिखाई देने लगा।
अपराध नियंत्रण और पुलिसिया एक्शन से पलटी हवा
कानून व्यवस्था को लेकर भी दोनों पक्षों के बीच तीखी रार देखने को मिली है। प्रदेश में सामने आई आपराधिक वारदातों को मुद्दा बनाकर अखिलेश यादव ने सरकारी तंत्र पर सवाल खड़े किए और कानून व्यवस्था के पूरी तरह पटरी से उतरने का आरोप लगाया। सपा ने इसे चुनावी हथियार बनाने की भरपूर कोशिश की। इसके जवाब में पुलिस प्रशासन ने ताबड़तोड़ एक्शन शुरू किए। बदमाशों के खिलाफ ऑपरेशन लंगड़ा के तहत मुठभेड़ों का सिलसिला तेज हुआ। साथ ही मुख्यमंत्री ने अपराध के प्रति अपनी सरकार की जीरो टॉलरेंस नीति का बार-बार उल्लेख किया। सरकारी मशीनरी के इस कड़े रुख ने विपक्ष के आरोपों की धार कुंद कर दी और सुरक्षा का विमर्श एक बार फिर सत्ताधारी दल के अनुकूल खड़ा हो गया।
मेरठ के मंच से उठा वैचारिक टकराव और पोस्टर वॉर
चुनावी जंग में विचारधारा और प्रतीकों की लड़ाई भी खुलकर सामने आ चुकी है। हाल ही में मेरठ में आयोजित एक जनसभा के दौरान मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कड़े शब्दों का इस्तेमाल करते हुए कहा कि प्रभु राम के नाम से दूरी बनाने वाले असल में बाबर की सोच पर चलते हैं। इसके साथ ही उन्होंने बजरंगी ताकतों को एकजुट होने का संदेश दिया। इस सीधे वैचारिक वार के जवाब में अखिलेश यादव ने कोई उग्र बयान देने के बजाय प्रतीकात्मक राजनीति का सहारा लिया। उन्होंने लखनऊ स्थित सपा मुख्यालय पर भगवान हनुमान के आशीर्वाद को दर्शाने वाला विशाल पोस्टर लगवा दिया। इस सधे हुए कदम से सपा ने यह संदेश देने की कोशिश की कि वह आस्था के मंच पर सत्ता पक्ष को एकतरफा बढ़त नहीं लेने देगी। इसी दौरान मुख्यमंत्री ने 2017 से पहले की सरकारों का जिक्र करते हुए यह याद दिलाया कि किस तरह उस दौर में सरकारी संपत्तियों पर भू-माफिया का बोलबाला रहता था।
रणनीतिक मुकाबले में किसका पलड़ा दिख रहा भारी?
अगर बीते कुछ महीनों के राजनीतिक घटनाक्रम को तौलें तो मुकाबला कांटे का नजर आ रहा है। अखिलेश यादव ने अपने सांगठनिक ढांचे को काफी कसा है। राज्य के सभी 75 जनपदों के लिए 75 अलग-अलग चुनावी घोषणापत्र तैयार करने का उनका कदम स्थानीय मुद्दों को प्रमुखता से उठाने में असरदार साबित हुआ है। इसके बावजूद सपा की एक पुरानी कमजोरी सामने आ रही है। पार्टी भर्ती परीक्षा या अपराध जैसे मुद्दों पर शुरुआत में जोरदार माहौल तो बनाती है, लेकिन सरकार के जवाबी कदम या योजना आते ही सपा उस विमर्श को लंबे समय तक खींच नहीं पाती।
दूसरी ओर, मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ अपने तयशुदा राजनीतिक ट्रैक पर अडिग बने रहते हैं। विपक्षी दल जब भी प्रशासनिक खामियों या सामाजिक प्रश्नों को लेकर घेराबंदी करता है, वे फौरन माफिया विरोधी छवि और सांस्कृतिक पहचान का जिक्र छेड़कर चर्चा की दिशा मोड़ देते हैं। हालांकि युवा वर्ग के भीतर सरकारी नौकरियों को लेकर बनी बेचैनी ऐसा पेचीदा सवाल है, जिसका हल सिर्फ कड़े बयानों से ढूंढना लंबे समय तक आसान नहीं रहेगा।
हालिया समीकरणों के आधार पर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ अपनी त्वरित प्रतिक्रिया और प्रशासनिक कार्यशैली की बदौलत अखिलेश यादव पर बेहद बारीक बढ़त बनाए हुए दिख रहे हैं। वे विपक्षी चक्रव्यूह को तेजी से भेदने में सफल रहते हैं। इसके बावजूद जमीनी स्तर पर सक्रिय पीडीए का गणित 2027 के इस दंगल को पूरी तरह खुला और बेहद कड़ा बनाए हुए है।























