भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय प्रवक्ता और सांसद डॉ. सुधांशु त्रिवेदी ने 'दिमागी नक्सल' के मुद्दे को लेकर कांग्रेस पार्टी पर चौतरफा हमला बोला है। नई दिल्ली में आयोजित एक पत्रकार वार्ता को संबोधित करते हुए उन्होंने पूर्व केंद्रीय मंत्री पी. चिदंबरम की टिप्पणियों पर गहरा ऐतराज जताया और कांग्रेस नेतृत्व से स्पष्टीकरण मांगा। उन्होंने सवाल किया कि कांग्रेस के लिए पूर्व प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह की बात मायने रखती है या फिर पी. चिदंबरम का रुख। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा स्वतंत्रता दिवस के भाषण में उठाए गए इस विषय का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री के वक्तव्य के 24 घंटे के भीतर विरोध में उठी आवाजों ने यह साबित कर दिया है कि वैचारिक नक्सलवाद का प्रभाव कहां तक फैला हुआ है।
'दिमागी नक्सल' पर राजनीतिक विवाद और कांग्रेस की प्रतिक्रिया
डॉ. सुधांशु त्रिवेदी ने संवाददाताओं से बातचीत में कहा कि भारत अपनी आजादी के 80वें वर्ष में प्रवेश कर रहा है। ऐसे ऐतिहासिक मोड़ पर देश के शीर्ष नेतृत्व द्वारा 'दिमागी नक्सल' जैसे गंभीर विषय को रेखांकित करना पूरी तरह सामयिक और आवश्यक है। उन्होंने आरोप लगाया कि कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और पूर्व वित्त मंत्री पी. चिदंबरम ने खुद के लिए इस्तेमाल किए गए 'दिमागी नक्सल' शब्द पर गर्व महसूस किया है। बीजेपी प्रवक्ता के अनुसार, किसी हिंसक या उग्रवादी विचारधारा को मानसिक या वैचारिक समर्थन देना देश के लोकतांत्रिक ढांचे और आंतरिक सुरक्षा व्यवस्था के लिए बेहद खतरनाक प्रवृत्ति है।
मनमोहन सिंह के 2006 के बयान का हवाला और यूपीए काल का रिकॉर्ड
कांग्रेस पार्टी को उसके इतिहास की याद दिलाते हुए बीजेपी सांसद ने 13 अप्रैल 2006 का उल्लेख किया। उस तारीख को तत्कालीन प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह ने देश के शीर्ष अधिकारियों के सम्मेलन में स्पष्ट कहा था कि नक्सलवाद भारत की आंतरिक सुरक्षा के लिए अब तक का सबसे बड़ा खतरा है। डॉ. त्रिवेदी ने पूछा कि क्या कांग्रेस आज अपने ही पूर्व प्रधानमंत्री के उस स्पष्ट दृष्टिकोण से पीछे हट रही है। उन्होंने कहा कि कांग्रेस नीत यूपीए शासन के दौरान नक्सली नेटवर्क का फैलाव देश के बड़े भूभाग में था, जिसे पशुपति से तिरुपति तक फैले 'रेड कॉरिडोर' के रूप में जाना जाता था। उस दौर में देश के 180 से अधिक जिले सीधे तौर पर इस समस्या की चपेट में थे।
दंतेवाड़ा हमला, जन-धन हानि और बुनियादी ढांचे में सुधार
यूपीए सरकार के समय की स्थितियों का ब्योरा देते हुए बीजेपी प्रवक्ता ने अप्रैल 2010 के दंतेवाड़ा नक्सली हमले का जिक्र किया, जिसमें सीआरपीएफ के 75 से अधिक जवान शहीद हो गए थे। उन्होंने आरोप लगाया कि उस समय सुरक्षा बलों पर हुए हमलों के बाद कुछ हलकों में जश्न तक मनाया जाता था, जो वैचारिक उग्रवाद का प्रत्यक्ष प्रमाण है। उन्होंने आंकड़े पेश करते हुए कहा कि पी. चिदंबरम के गृह मंत्री रहते हुए 5,000 से अधिक निर्दोष नागरिकों की जान गई और 1,913 सुरक्षाकर्मी शहीद हुए। इसके अलावा, नक्सलियों के पास मौजूद 92 प्रतिशत से अधिक हथियार पुलिस बलों से लूटे गए थे।
बीजेपी प्रवक्ता ने दावा किया कि जिन चुनौतियों से निपटने में पिछली सरकारें विफल रहीं, उन पर मौजूदा सरकार ने मजबूती से नियंत्रण पाया है। उन्होंने बताया कि प्रभावित क्षेत्रों को मुख्यधारा से जोड़ने के लिए जमीनी स्तर पर व्यापक कार्य किए गए हैं। इन इलाकों में 1,800 से अधिक बैंक शाखाएं खोली गई हैं, 1,200 से ज्यादा एटीएम स्थापित किए गए हैं और 6,000 से अधिक मोबाइल टॉवर लगाए गए हैं। इसके अतिरिक्त, 22 लाख लोगों को आयुष्मान भारत कार्ड जारी कर स्वास्थ्य सुरक्षा प्रदान की गई है। सरकार ने 31 मार्च 2026 तक देश से नक्सलवाद के पूर्ण सफाए का लक्ष्य रखा है।
सुरक्षा बल की कार्रवाई के साथ वैचारिक लड़ाई पर जोर
डॉ. त्रिवेदी ने इस बात पर विशेष बल दिया कि नक्सलवाद को केवल बंदूक और सुरक्षा बलों की कार्रवाई तक सीमित करके नहीं देखा जा सकता। उन्होंने कहा कि इसके पीछे काम करने वाले वैचारिक तंत्र से निपटना भी उतना ही जरूरी है। जब प्रभावित इलाकों में 22 लाख लोगों को स्वास्थ्य कार्ड मिलते हैं या बुनियादी सुविधाएं पहुंचती हैं और कोई इसका विरोध करता है, तो वही रवैया 'दिमागी नक्सल' कहलाता है। बीजेपी ने मांग की है कि कांग्रेस पार्टी को इस वैचारिक दोहरेपन पर देश के सामने अपनी स्थिति साफ करनी चाहिए।



















