वर्ष 2017 में देश के उपराष्ट्रपति पद का संवैधानिक दायित्व ग्रहण करने के साथ ही एम. वेंकैया नायडू ने भारतीय जनता पार्टी की सक्रिय राजनीति से पूरी तरह संन्यास ले लिया था। इसके बाद से वे लगातार राजनीतिक मंचों, पार्टी के कार्यक्रमों और दलगत बयानबाजी से एक तय दूरी बनाए रखते रहे हैं। हालांकि, पूर्व प्रधानमंत्री और भारत रत्न अटल बिहारी वाजपेयी जी की 8वीं पुण्यतिथि के अवसर पर नई दिल्ली में एक अत्यंत भावुक दृश्य देखने को मिला। 77 वर्षीय पूर्व उपराष्ट्रपति अपने मार्गदर्शक और मेंटर के प्रति अगाध श्रद्धा व्यक्त करने के लिए अपने आवास से बाहर निकले और 'सदैव अटल' समाधि स्थल पर जाकर अपने प्रिय नेता को भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित की।
सदैव अटल पर दिखा प्रोटोकॉल से परे परस्पर सम्मान
राजधानी स्थित 'सदैव अटल' समाधि स्थल पर उस समय एक गरिमामयी और संवेदनशील क्षण दर्ज किया गया जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने स्वयं प्रोटोकॉल को दरकिनार करते हुए पीछे हटकर पूर्व उपराष्ट्रपति एम. वेंकैया नायडू को पहले श्रद्धांजलि देने का मार्ग प्रशस्त किया। उस मौन वातावरण में दोनों नेताओं के बीच शब्दों के बिना भी एक गहरा सम्मान और भावनात्मक जुड़ाव साफ झलक रहा था। श्रद्धांजलि अर्पित करने के पश्चात नायडू ने दिल्ली में गरीब और जरूरतमंद लोगों की सुविधा के लिए 25 नई 'अटल कैंटीन' का उद्घाटन भी किया। सार्वजनिक जीवन और राजनीतिक दूरी के बीच वेंकैया नायडू का इस तरह बाहर आना केवल एक औपचारिकता नहीं थी, बल्कि यह उस निश्छल और प्रगाढ़ रिश्ते की गवाही देता है जो वे जीवनभर अटल जी के साथ साझा करते रहे।
नेल्लोर की गलियों में तांगे से प्रचार से लेकर राष्ट्रीय क्षितिज तक
एम. वेंकैया नायडू के व्यक्तिगत और राजनीतिक जीवन पर अटल बिहारी वाजपेयी का प्रभाव किसी अमिट छाप की तरह रहा है। नायडू अपने शुरुआती दिनों की यादों को साझा करते हुए अक्सर 1960 के दशक के उस दौर को याद करते हैं, जब वे आंध्र प्रदेश के अपने गृहनगर नेल्लोर की सड़कों पर तांगे में सवार होकर घूम-घूमकर अटल जी की जनसभाओं का प्रचार करते थे और लोगों को उनके विचार सुनने के लिए आमंत्रित करते थे। उस समय एक साधारण युवा कार्यकर्ता के रूप में नायडू पर अटल जी ने जो स्नेह, मार्गदर्शन और वात्सल्य बरसाया, उसने उनके जीवन की दिशा ही बदल दी। युवा कार्यकर्ताओं के बीच 'तरुण हृदय सम्राट' के रूप में लोकप्रिय अटल जी का सानिध्य पाना नायडू हमेशा अपने सार्वजनिक जीवन का सबसे बड़ा सौभाग्य मानते हैं।
केंद्रीय मंत्रिमंडल का जिम्मा और संगठन का शीर्ष नेतृत्व
वेंकैया नायडू के अनुसार, अटल बिहारी वाजपेयी से हुई पहली औपचारिक मुलाकात उनके जीवन का सबसे बड़ा निर्णायक मोड़ सिद्ध हुई। वाजपेयी जी केवल एक वरिष्ठ राजनेता नहीं थे, बल्कि नायडू के लिए एक पिता समान मार्गदर्शक और जीवन के रोल मॉडल थे। जब केंद्र में अटल जी के नेतृत्व में सरकार बनी, तो उन्होंने नायडू की जन-सरोकारों से जुड़ी प्राथमिकताओं को समझते हुए उन्हें अपनी कैबिनेट में ग्रामीण विकास जैसा महत्वपूर्ण मंत्रालय सौंपा। इतना ही नहीं, भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष पद के लिए भी वेंकैया नायडू के नाम का प्रस्ताव खुद अटल बिहारी वाजपेयी ने ही किया था। एक महान गुरु के इस अटूट भरोसे ने ही नायडू को ईमानदारी, प्रखर राष्ट्रवाद और जनसेवा की भावना से काम करने की निरंतर प्रेरणा दी।
अंतिम व्यक्ति तक विकास और सुशासन का अटल मॉडल
अटल बिहारी वाजपेयी का दृढ़ विश्वास था कि वास्तविक शासन वही है जो समाज की अंतिम पंक्ति में खड़े व्यक्ति तक पहुंचे और उसके जीवन में सकारात्मक बदलाव लाकर चेहरे पर मुस्कान बिखेर सके। वे केवल प्रशासनिक तंत्र चलाने में नहीं, बल्कि पारदर्शी गुड गवर्नेंस और 'सुराज्य' की स्थापना में यकीन रखते थे। वेंकैया नायडू स्वीकार करते हैं कि उन्होंने जनसेवा के ये बुनियादी सिद्धांत अटल जी के सानिध्य में ही सीखे। स्वास्थ्य सेवाएं, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, शुद्ध पेयजल, स्वच्छता और सुरक्षा जैसी मूलभूत सुविधाओं को सीधे आम नागरिकों तक पहुंचाना उनके शासन का मुख्य ध्येय था। महात्मा गांधी के रामराज्य के विजन की तर्ज पर अटल जी एक ऐसे समतामूलक समाज की कल्पना करते थे जहां किसी के साथ अन्याय या असमानता न हो। उन्होंने आर्थिक आंकड़ों और जीडीपी से आगे बढ़कर विकास को एक मानवीय चेहरा प्रदान किया।
कूटनीतिक दूरदर्शिता, स्वर्णिम चतुर्भुज और राष्ट्रीय सुरक्षा का संकल्प
पूर्व उपराष्ट्रपति नायडू के अनुसार, अटल जी के व्यक्तित्व में एक ऐसा चुंबकीय आकर्षण था जो घोर राजनीतिक विरोधियों को भी उनका प्रशंसक बना देता था। अपने छह दशक लंबे राजनीतिक जीवन में अटल जी ने लगभग 56 वर्ष विपक्ष की भूमिका निभाई, लेकिन अपनी मर्यादा, शालीनता और रचनात्मक दृष्टिकोण से उन्होंने पंडित जवाहरलाल नेहरू से लेकर हर दौर के दिग्गज नेताओं का दिल जीता। अंतरराष्ट्रीय संबंधों को लेकर उनका यह प्रसिद्ध कथन आज भी भारतीय विदेश नीति का मार्गदर्शन करता है कि 'हम अपने दोस्त बदल सकते हैं, लेकिन पड़ोसी नहीं।' देश के बुनियादी ढांचे को आधुनिक बनाने के लिए उन्होंने 'मिशन कनेक्ट इंडिया' के तहत स्वर्णिम चतुर्भुज परियोजना और प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना के माध्यम से पूरे देश को सड़कों के जाल से जोड़ा। जहां एक तरफ वे एक संवेदनशील कवि और कोमल हृदय इंसान थे, वहीं राष्ट्रहित के प्रश्नों पर पोखरण-II परमाणु परीक्षण और कारगिल युद्ध के दौरान उन्होंने चट्टान जैसी दृढ़ता का परिचय दिया। उन्होंने पूर्व प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री के नारे 'जय जवान, जय किसान' में 'जय विज्ञान' जोड़कर देश को तकनीक और नवाचार की शक्ति से जोड़ा।
राजनीति से परे एक अमर गुरु-शिष्य संबंध
पूर्व उपराष्ट्रपति एम. वेंकैया नायडू का राजनीतिक सन्नाटे को तोड़कर 'सदैव अटल' तक पहुंचना कोई तात्कालिक राजनीतिक कदम नहीं था। यह एक समर्पित शिष्य द्वारा अपने महान गुरु, पथ-प्रदर्शक और 'फिलॉसफर किंग' के प्रति अर्पित की गई निष्काम श्रद्धांजलि थी। भले ही अटल बिहारी वाजपेयी आज भौतिक रूप से मौजूद न हों, लेकिन उनकी दूरदर्शी सोच, नीतियां और मानवीय मूल्य उन करोड़ों लोगों के दिलों में हमेशा अमर रहेंगे जिनके जीवन को उन्होंने अपनी राष्ट्रसेवा से छुआ था।



















