मानसून के दौरान मौसम में आने वाले बदलावों और रह-रहकर होने वाली बारिश के कारण ग्वार फली की खेती करने वाले किसानों के लिए चुनौतियां बढ़ जाती हैं। ऐसे मौसम में फसल पर रस चूसक कीटों का हमला होने की आशंका काफी बढ़ जाती है। ये छोटे कीट पौधों के कोमल भागों और पत्तियों से रस चूसकर उनकी वृद्धि को रोक देते हैं। यदि समय रहते इनका प्रबंधन न किया जाए तो पौधों में फलियों और फूलों की संख्या काफी घट जाती है, जिससे अंतिम उत्पादन में भारी गिरावट आ सकती है। किसानों को इस समय अपनी फसल की लगातार देखभाल करने और शुरुआती लक्षणों को पहचानने की सख्त आवश्यकता है।
ग्वार में रस चूसक कीटों के मुख्य लक्षण और पहचान
ग्वार की फसल को सबसे ज्यादा नुकसान सफेद मक्खी, माहू और थ्रिप्स जैसे रस चूसक कीट पहुंचाते हैं। कृषि विशेषज्ञ बजरंग सिंह के अनुसार, ये कीट बहुत छोटे होते हैं और आमतौर पर पत्तियों की निचली सतह पर छिपे रहते हैं। इसी वजह से शुरुआत में किसान इन्हें आसानी से नहीं देख पाते हैं। जब इनका प्रकोप बढ़ता है, तब पौधों पर स्पष्ट लक्षण दिखने लगते हैं। प्रभावित पौधों की पत्तियां धीरे-धीरे पीली पड़ने लगती हैं, किनारे सिकुड़ने लगते हैं और पूरे पौधे की स्वाभाविक बढ़वार थम जाती है। कीटों के इस प्रभाव से बचाव के लिए किसानों को सप्ताह में कम से कम दो बार अपने खेतों का ध्यानपूर्वक निरीक्षण करना चाहिए। खासतौर पर नई निकली पत्तियों, कोमल टहनियों और पत्तियों के निचले हिस्से की गहराई से जांच करनी चाहिए।
इमिडाक्लोप्रिड 17.8 एसएल के प्रयोग और छिड़काव की सही विधि
कीटों का हमला दिखाई देने पर रासायनिक नियंत्रण के उपाय अपनाए जा सकते हैं। कृषि विशेषज्ञ बजरंग सिंह की सलाह के अनुसार, जब मौसम बिल्कुल साफ हो, तब इमिडाक्लोप्रिड 17.8 एसएल का छिड़काव करना प्रभावी साबित होता है। इस कीटनाशक की अनुशंसित मात्रा 200 मिलीलीटर प्रति हेक्टेयर निर्धारित की गई है। ICAR की खरीफ फसल संबंधी एडवाइजरी में भी सफेद मक्खी, माहू और थ्रिप्स जैसे कीटों के नियंत्रण के लिए इमिडाक्लोप्रिड 17.8 एसएल के इस्तेमाल का सुझाव दिया गया है। हालांकि, किसानों को कोई भी रसायन प्रयोग करने से पहले अपनी स्थानीय फसल की स्थिति और स्थानीय कृषि विभाग की स्वीकृत सिफारिशों का पालन अवश्य करना चाहिए।
छिड़काव के समय मौसम और तकनीक का रखें ध्यान
कीटनाशी के छिड़काव के दौरान मौसम का सटीक आकलन करना बेहद जरूरी है। यदि आसमान में बादल छाए हों या बारिश की संभावना बनी हो, तो छिड़काव का काम स्थगित कर देना चाहिए। बारिश होने पर पत्तियों पर लगी दवा धुल जाती है, जिससे दवा का असर खत्म हो जाता है और किसानों की मेहनत तथा लागत दोनों बेकार चली जाती हैं। इसलिए हमेशा साफ और सूखे मौसम में ही दवा का प्रयोग करें। छिड़काव करते समय इस बात का विशेष ध्यान रखें कि दवा का घोल पौधों की ऊपरी और निचली दोनों सतहों पर अच्छी तरह पहुंचे। इसके लिए पर्याप्त मात्रा में पानी का घोल तैयार करना चाहिए और उचित नोजल वाले स्प्रेयर का इस्तेमाल करना चाहिए ताकि पूरे पौधे पर दवा का बेहतर कवरेज मिल सके।
कीट प्रतिरोधक क्षमता और अत्यधिक इस्तेमाल से बचाव
बिना जरूरत के या केवल आशंका के आधार पर बार-बार कीटनाशकों का छिड़काव करने से बचना चाहिए। कीटनाशी का प्रयोग केवल तभी करें जब खेत में कीटों की मौजूदगी स्पष्ट रूप से दिखाई दे। साथ ही, निर्धारित 200 मिलीलीटर प्रति हेक्टेयर की मात्रा से अधिक दवा का इस्तेमाल बिल्कुल न करें। यदि किसान बार-बार एक ही रसायन या एक ही प्रभाव-प्रणाली वाले कीटनाशी का प्रयोग करते हैं, तो कीटों में उस दवा के प्रति प्रतिरोधक क्षमता विकसित हो जाती है, जिससे बाद में दवाएं बेअसर साबित होने लगती हैं। आवश्यकता पड़ने पर अलग-अलग कार्य-प्रणाली वाले कीटनाशकों को बदल-बदल कर उपयोग में लाना चाहिए। ICAR की गाइडलाइन में भी साफ तौर पर चेतावनी दी गई है कि कई रसायनों को आपस में मिलाकर या आवश्यकता से अधिक मात्रा में छिड़काव करने से फसल को नुकसान पहुंच सकता है।
खरपतवार नियंत्रण और प्राकृतिक बचाव के उपाय
रासायनिक छिड़काव के अलावा खेत की साफ-सफाई रखकर भी कीटों के हमले को काफी हद तक नियंत्रित किया जा सकता है। कृषि विशेषज्ञ बजरंग सिंह के अनुसार, खेत की मेड़ों और आसपास उगने वाले अनावश्यक खरपतवारों को तुरंत नष्ट कर देना चाहिए। ये खरपतवार कीटों के लिए वैकल्पिक आश्रय स्थल का काम करते हैं, जहां से कीट आसानी से मुख्य ग्वार फसल पर स्थानांतरित हो जाते हैं। इसके अतिरिक्त, जिन पत्तियों पर कीटों का अत्यधिक हमला हो चुका हो, उन्हें तोड़कर खेत से दूर ले जाकर नष्ट कर देना चाहिए। यदि शुरुआती चरण में कीटों की संख्या कम हो, तो किसान खेत में पीले चिपचिपे ट्रैप (येलो स्टिकी ट्रैप) लगा सकते हैं। ये ट्रैप रस चूसक कीटों को आकर्षित कर चिपका लेते हैं, जिससे बिना रसायन के भी कीटों की शुरुआती निगरानी और जैविक नियंत्रण में बड़ी मदद मिलती है।



















