राजस्थान के जालौर समेत तमाम इलाकों की समृद्ध लोकसंस्कृति में भाई और बहन के पावन रिश्ते को मजबूत करने वाली कई अनोखी रीतियां आज भी कायम हैं। इनमें से एक बेहद खास और मनमोहक रस्म 'समुंदर हिलोरने' की है, जो भाई-बहन के बीच के बेइंतहा स्नेह, एक-दूसरे की सलामती और पानी के प्रति अगाध श्रद्धा का प्रतीक मानी जाती है। इस पारंपरिक अनुष्ठान के दौरान गांव के किसी तालाब या नाड़ी को समुद्र का रूप मानकर भाई-बहन मिलकर विशेष पूजा और विधि-विधान पूरा करते हैं। इस अनूठी रस्म को निभाने का समय भी अलग-अलग क्षेत्रों में अलग होता है, जहां कुछ जगहों पर इसकी शुरुआत सावन महीने की हरियाली तीज से होती है, तो वहीं कुछ इलाकों में इसे कृष्ण जन्माष्टमी, बछबारस और भाद्रपद पक्ष के दौरान भी पूरे उल्लास के साथ मनाया जाता है।
महिलाओं के पारंपरिक गीत और उत्सव का माहौल
तय नियमों के मुताबिक इस प्राचीन रस्म को पूरा करने के लिए भाई अपनी बहन के साथ जल स्रोत या तालाब के किनारे पहुंचता है। इस दौरान आसपास की महिलाएं पारंपरिक और रंग-बिरंगे परिधानों में सज-धजकर ढोल-नगाड़ों की गूंज के साथ मंगल गीत गाते हुए तालाब तक पहुंचती हैं। इन लोकगीतों के माध्यम से भाई-बहन के बीच का पवित्र प्रेम, सुहावना सावन का मौसम और घर-परिवार में खुशहाली आने की सुंदर भावनाएं मुखरित होती हैं। जल स्रोत तक पहुंचने का यह पूरा सफर लोक संस्कृति के अनूठे रंगों में सराबोर रहता है, जिससे पूरे इलाके में किसी बड़े त्योहार जैसा माहौल बन जाता है।
समुंदर हिलोरने की मुख्य प्रक्रिया और उसका महत्व
तालाब या नाड़ी पर पहुंचने के बाद 'समुंदर हिलोरने' की मुख्य प्रक्रिया शुरू होती है। पानी के भीतर मटका डालकर भाई और बहन दोनों मिलकर उसे हिलाते हैं, जिसे स्थानीय बोलचाल में 'समुंदर हिलोरना' या 'समुंदर हिलाना' पुकारा जाता है। मरुस्थलीय और पानी की किल्लत झेलने वाले इलाकों में समुद्र से कोसों दूर बसे गांवों के तालाबों को ही समंदर का प्रतीक मानने के पीछे जल के प्रति गहरी आस्था और लोकविश्वास काम करता है। जल स्रोत को ही समुद्र का दर्जा देकर इस परंपरा के जरिए पानी के प्रति सम्मान और आभार प्रकट किया जाता है, जो रेगिस्तानी जीवन शैली की एक अहम कड़ी है।
स्नेह का आदान-प्रदान और नए रिश्तों की मजबूती
तालाब के पानी से मटका भरने के बाद भाई अपने हाथों से अपनी बहन को जल पिलाता है, जिसके फौरन बाद बहन अपने भाई की लंबी आयु, सुख और समृद्धि की दुआ मांगती है। इसके बदले में भाई अपनी बहन को चुनरी ओढ़ाकर उसके खुशहाल जीवन का आशीर्वाद देता है। इस पूरी रस्म के दौरान भाई-बहन के बीच का आपसी अपनापन और गहरा भावनात्मक रिश्ता साफ झलकता है। ग्रामीण भंवरलाल ने जानकारी देते हुए बताया कि इस परंपरा का एक बेहद खास पहलू यह भी है कि इसे नई शादी के बाद ससुराल आई बहुओं के साथ भी निभाया जाता है। बहू का भाई उसके ससुराल पहुंचकर इस रस्म को संपन्न कराता है, जो मायके के प्यार को ससुराल की नई जिंदगी से जोड़ने का एक सुंदर माध्यम बनता है।





















