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जालौर में अनूठी परंपरा, तालाब में मटका हिलाकर भाई-बहन निभा रहे हैं 'समुंदर हिलोरने' की रस्मराजस्थान
10 सित॰ 2026, 3:11 pm (52 मिनट पहले)· 3

जालौर में अनूठी परंपरा, तालाब में मटका हिलाकर भाई-बहन निभा रहे हैं 'समुंदर हिलोरने' की रस्म

राजस्थान के जालौर में भाई-बहन के अटूट रिश्ते को समर्पित 'समुंदर हिलोरने' की परंपरा निभाई जाती है। इस दौरान तालाब के पानी में मटका हिलाकर जल के प्रति आस्था प्रकट की जाती है और आपसी स्नेह का आदान-प्रदान होता है।

राजस्थान के जालौर समेत तमाम इलाकों की समृद्ध लोकसंस्कृति में भाई और बहन के पावन रिश्ते को मजबूत करने वाली कई अनोखी रीतियां आज भी कायम हैं। इनमें से एक बेहद खास और मनमोहक रस्म 'समुंदर हिलोरने' की है, जो भाई-बहन के बीच के बेइंतहा स्नेह, एक-दूसरे की सलामती और पानी के प्रति अगाध श्रद्धा का प्रतीक मानी जाती है। इस पारंपरिक अनुष्ठान के दौरान गांव के किसी तालाब या नाड़ी को समुद्र का रूप मानकर भाई-बहन मिलकर विशेष पूजा और विधि-विधान पूरा करते हैं। इस अनूठी रस्म को निभाने का समय भी अलग-अलग क्षेत्रों में अलग होता है, जहां कुछ जगहों पर इसकी शुरुआत सावन महीने की हरियाली तीज से होती है, तो वहीं कुछ इलाकों में इसे कृष्ण जन्माष्टमी, बछबारस और भाद्रपद पक्ष के दौरान भी पूरे उल्लास के साथ मनाया जाता है।

महिलाओं के पारंपरिक गीत और उत्सव का माहौल

तय नियमों के मुताबिक इस प्राचीन रस्म को पूरा करने के लिए भाई अपनी बहन के साथ जल स्रोत या तालाब के किनारे पहुंचता है। इस दौरान आसपास की महिलाएं पारंपरिक और रंग-बिरंगे परिधानों में सज-धजकर ढोल-नगाड़ों की गूंज के साथ मंगल गीत गाते हुए तालाब तक पहुंचती हैं। इन लोकगीतों के माध्यम से भाई-बहन के बीच का पवित्र प्रेम, सुहावना सावन का मौसम और घर-परिवार में खुशहाली आने की सुंदर भावनाएं मुखरित होती हैं। जल स्रोत तक पहुंचने का यह पूरा सफर लोक संस्कृति के अनूठे रंगों में सराबोर रहता है, जिससे पूरे इलाके में किसी बड़े त्योहार जैसा माहौल बन जाता है।

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समुंदर हिलोरने की मुख्य प्रक्रिया और उसका महत्व

तालाब या नाड़ी पर पहुंचने के बाद 'समुंदर हिलोरने' की मुख्य प्रक्रिया शुरू होती है। पानी के भीतर मटका डालकर भाई और बहन दोनों मिलकर उसे हिलाते हैं, जिसे स्थानीय बोलचाल में 'समुंदर हिलोरना' या 'समुंदर हिलाना' पुकारा जाता है। मरुस्थलीय और पानी की किल्लत झेलने वाले इलाकों में समुद्र से कोसों दूर बसे गांवों के तालाबों को ही समंदर का प्रतीक मानने के पीछे जल के प्रति गहरी आस्था और लोकविश्वास काम करता है। जल स्रोत को ही समुद्र का दर्जा देकर इस परंपरा के जरिए पानी के प्रति सम्मान और आभार प्रकट किया जाता है, जो रेगिस्तानी जीवन शैली की एक अहम कड़ी है।

स्नेह का आदान-प्रदान और नए रिश्तों की मजबूती

तालाब के पानी से मटका भरने के बाद भाई अपने हाथों से अपनी बहन को जल पिलाता है, जिसके फौरन बाद बहन अपने भाई की लंबी आयु, सुख और समृद्धि की दुआ मांगती है। इसके बदले में भाई अपनी बहन को चुनरी ओढ़ाकर उसके खुशहाल जीवन का आशीर्वाद देता है। इस पूरी रस्म के दौरान भाई-बहन के बीच का आपसी अपनापन और गहरा भावनात्मक रिश्ता साफ झलकता है। ग्रामीण भंवरलाल ने जानकारी देते हुए बताया कि इस परंपरा का एक बेहद खास पहलू यह भी है कि इसे नई शादी के बाद ससुराल आई बहुओं के साथ भी निभाया जाता है। बहू का भाई उसके ससुराल पहुंचकर इस रस्म को संपन्न कराता है, जो मायके के प्यार को ससुराल की नई जिंदगी से जोड़ने का एक सुंदर माध्यम बनता है।

सवाल-जवाब

समुंदर हिलोरने की परंपरा मुख्य रूप से किस राज्य में निभाई जाती है?
यह परंपरा राजस्थान के जालौर समेत कई क्षेत्रों की लोकसंस्कृति का हिस्सा है।
इस रस्म के दौरान मुख्य प्रक्रिया क्या होती है?
इसमें भाई और बहन पानी के अंदर मटका डालकर दोनों मिलकर उसे हिलाते हैं।
गांव के तालाब को किस रूप में माना जाता है?
समुद्र से दूर बसे गांवों के तालाब या नाड़ी को इस रस्म के दौरान समुद्र का प्रतीक माना जाता है।
मटका भरने के बाद भाई और बहन क्या करते हैं?
भाई अपनी बहन को अपने हाथों से जल पिलाता है और बहन भाई की लंबी उम्र की कामना करती है।
इस परंपरा का नया शादीशुदा महिलाओं से क्या जुड़ाव है?
नई शादी होकर ससुराल आई बहुओं के मायके से भाई आकर इस रस्म को पूरा करता है।
संपादकीय नीति सुधार नीति

टिप्पणियाँ 2

Karan Malhotra@karan-malhotra·26 मिनट पहले

एक अपराध और जाँच संवाददाता के रूप में, मैं इस लोक-संस्कृति को समाजशास्त्र और सार्वजनिक सुरक्षा के दृष्टिकोण से देखता हूँ। राजस्थान जैसे मरुस्थलीय इलाकों में जहाँ जल संकट से निपटने के लिए पारंपरिक जल स्रोतों का संरक्षण जीवन-मरण का प्रश्न रहा है, इस रस्म ने पानी और पर्यावरण के प्रति सामुदायिक संवेदनशीलता को जीवित रखा है। जब भाई-बहन तालाब में मटका हिलाकर जल के प्रति आस्था जताते हैं, तो यह केवल पारिवारिक स्नेह तक सीमित नहीं रहता, बल्कि यह सामूहिक सहभागिता के जरिए जल संरक्षण और सामाजिक समरसता का एक ऐसा सुरक्षा कवच तैयार करता है जो किसी भी आधुनिक कानूनी प्रावधान से अधिक प्रभावी साबित होता है।

Rohan Verma@rohan-verma·25 मिनट पहले

राजस्थान के मरुस्थलीय क्षेत्रों में पानी की कमी और सूखे जैसी चुनौतियों के बीच, लोक-संस्कृति से जुड़ी यह परंपराएं केवल सांस्कृतिक विरासत तक सीमित नहीं हैं। जब समुदाय जल स्रोतों के प्रति ऐसी गहरी आस्था और भावनात्मक जुड़ाव महसूस करता है, तो यह अनजाने में ही जल संरक्षण की सामूहिक जिम्मेदारी को मजबूत करता है। समाजशास्त्रीय दृष्टिकोण से, यह व्यवस्था जल प्रबंधन को सामाजिक और पारिवारिक सरोकारों से जोड़कर पर्यावरण संरक्षण का एक अनूठा और प्रभावी माध्यम बनाती है, जो ग्रामीण समाज में जल सुरक्षा के लिए एक मजबूत सामाजिक ढांचा प्रदान करता है।

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