पाली में मानसून के आगमन के साथ ही एक बार फिर देसूरी रोड की खौफनाक हकीकत सामने आ गई है। मेवाड़ और मारवाड़ को जोड़ने वाली यह महत्वपूर्ण लाइफलाइन अब एक बड़े 'ब्लैक स्पॉट' में बदल चुकी है, जो आए दिन हंसते-खेलते परिवारों को उजाड़ने का कारण बनती है। जयपुर, जोधपुर और पाली जैसे प्रमुख शहरों को आपस में कनेक्ट करने वाली यह सड़क कागजों पर तो कनेक्टिविटी का माध्यम है, लेकिन धरातल पर यह हर मुसाफिर के लिए एक काल का ग्रास साबित हो रही है। मानसून की बारिश के दौरान इस मार्ग की स्थिति और अधिक चुनौतीपूर्ण हो जाती है, जिससे यहाँ सफर करना किसी जोखिम भरे अभियान से कम नहीं है।
खून की प्यासी सड़क
इस मार्ग को स्थानीय स्तर पर खून की प्यासी सड़क कहना कतई अतिशयोक्ति नहीं होगी। सुरक्षा के बुनियादी इंतजामों का अभाव और बारिश में कम होती विजिबिलिटी के कारण यहाँ वाहनों का फिसलना या अनियंत्रित होकर खाई में गिर जाना एक आम बात है। आंकड़ों की माने तो वर्ष 1952 से लेकर 2026 के बीच इस सड़क पर 1000 से अधिक लोग अपनी जान गंवा चुके हैं। सामान्य दिनों में भी यह मार्ग हादसों का केंद्र बना रहता है, लेकिन मानसून की फुहारें पड़ते ही यह और भी घातक हो जाती है।
दो हजार करोड़ का प्रोजेक्ट और वन विभाग की बाधा
इस मार्ग के कायाकल्प के लिए 1800 से 2000 करोड़ रुपये का एक महत्वाकांक्षी प्रोजेक्ट प्रस्तावित है, लेकिन फिलहाल यह वन विभाग की स्वीकृति के इंतजार में अटका हुआ है। योजना के अनुसार, देसूरी नाल में 9 किलोमीटर का हिस्सा या तो एलिवेटेड रोड के रूप में विकसित होगा या फिर वहां सुरंग बनाई जाएगी, जिसका निर्णय अभी होना शेष है। देसूरी और नाडोल होते हुए चारभुजा जाने वाले इस मार्ग के लिए विस्तृत परियोजना रिपोर्ट यानी डीपीआर तैयार की जा चुकी है। इस परियोजना में 9 नए बाइपास बनाने का भी प्रस्ताव है, ताकि वाहनों का दबाव रिहायशी इलाकों और बाजारों से कम हो सके।
प्रोजेक्ट की तकनीकी खासियतें
इस प्रस्तावित फोरलेन सड़क को आधुनिक मानकों के अनुरूप तैयार किया जाना है। इसमें 2 गुणा 7.5 मीटर का कैरिज-वे, दोनों किनारों पर 1.5 मीटर का पक्का शोल्डर और 180 मीटर की सुरक्षित स्टॉपिंग डिस्टेंस सुनिश्चित की जाएगी। विशेष रूप से देसूरी नाल वाले हिस्से में 9 किलोमीटर का सिंगल-पिलर एलिवेटेड रोड बनाने की योजना है ताकि पहाड़ों की कटाई कम हो, वन्यजीव सुरक्षित गुजर सकें और मानसून के समय जाम की स्थिति उत्पन्न न हो। वर्तमान में इस मार्ग पर वाहनों की औसत गति मात्र 30 से 40 किलोमीटर प्रति घंटा है, जिसे इस नई सड़क के निर्माण के बाद 100 किलोमीटर प्रति घंटा की डिजाइन स्पीड तक ले जाने का लक्ष्य है। बेहतर मोड़ और चौड़ी सड़क से औसत गति में दोगुना सुधार की उम्मीद है।
बाइपास से मिलेगी जाम से मुक्ति
ट्रैफिक के बोझ को कम करने के लिए सोनाई मांझी, बूसी, नाडोल, टेवाली, सोमेसर, देवली, खारड़ा, नारलाई और देसूरी जैसे क्षेत्रों के बाहर से बाइपास निकालने की रूपरेखा तैयार की गई है। इस बदलाव से बाजारों में भारी वाहनों का प्रवेश वर्जित होगा, जिससे स्कूलों और अस्पतालों के पास सड़क सुरक्षा बढ़ेगी और आमजन को जाम से होने वाली रोजमर्रा की परेशानी से बड़ी राहत मिलेगी।
अधिकारियों और संसद में उठा सवाल
राष्ट्रीय राजमार्ग के अधीक्षण अभियंता अंजू चौधरी के अनुसार, इस प्रोजेक्ट के लिए पेड़ों की गिनती की जा रही है और टनल या एलिवेटेड रोड के विकल्पों पर मंथन जारी है। वहीं, सांसद पीपी चौधरी ने संसद में इस मुद्दे को प्रमुखता से उठाते हुए कहा कि 83 किलोमीटर लंबा यह मार्ग ज्यामितीय मानकों पर खरा नहीं उतरता है। उन्होंने इस बात पर चिंता जताई कि यह मार्ग रणकपुर जैन मंदिर, जवाई बांध और चारभुजानाथ जैसे प्रमुख धार्मिक और पर्यटन स्थलों को जोड़ता है, लेकिन आबादी वाले क्षेत्रों और तीखे मोड़ों के कारण यह सुरक्षा के लिए एक बड़ा खतरा है।
जनता का दर्द और भविष्य की चिंता
नियमित रूप से इस रास्ते से गुजरने वाले दिनेश और इशांत राय जैसे मुसाफिरों का मानना है कि यदि इस प्रोजेक्ट पर गंभीरता से काम शुरू नहीं हुआ, तो यह मौतों का सिलसिला थमेगा नहीं। बारिश के मौसम में दुर्घटनाओं के साथ-साथ लगने वाले लंबे जाम लोगों के सब्र का बांध तोड़ देते हैं। अब यह सवाल लगातार गूंज रहा है कि आखिर कब तक इस मार्ग पर लोगों को डर के साये में चलना पड़ेगा और कब यह सड़क हकीकत में एक सुरक्षित लाइफलाइन बन पाएगी।











