राजस्थान के विभिन्न सरकारी मेडिकल केंद्रों में हाल के समय में प्रसूताओं की असमय मृत्यु ने स्वास्थ्य ढांचे की कार्यप्रणाली पर गंभीर प्रश्नचिह्न लगा दिए हैं। कोटा, अजमेर और भीलवाड़ा जैसे शहरों के प्रमुख अस्पतालों में प्रसव के बाद महिलाओं के देहांत की घटनाओं ने राजनीतिक गलियारों में हलचल पैदा कर दी है और विपक्ष लगातार राज्य सरकार की नीतियों व व्यवस्थाओं की आलोचना कर रहा है। शुरुआती मेडिकल पड़ताल में दवाओं की संदिग्ध गुणवत्ता, मरीजों को गंभीर हालत में रेफर करने की प्रक्रिया और प्रसव के दौरान उपजी जटिलताओं जैसे कई संवेदनशील बिंदु सामने आए हैं। इन त्रासदपूर्ण घटनाओं के मद्देनजर राज्य प्रशासन ने सक्रियता दिखाते हुए जांच की गति बढ़ा दी है और चिकित्सा सेवाओं के हर पहलू की व्यापक समीक्षा का निर्णय लिया है।
स्वास्थ्य मंत्री की प्रतिक्रिया और कार्रवाई का संकल्प
प्रदेश के चिकित्सा एवं स्वास्थ्य मंत्री गजेंद्र सिंह खींवसर ने इन घटनाओं को अत्यंत चिंताजनक बताया है। एक बातचीत में उन्होंने स्पष्ट किया कि सरकार इस पूरे प्रकरण को पूरी संवेदनशीलता के साथ देख रही है और प्रत्येक मामले की गहराई से तहकीकात की जा रही है। गजेंद्र सिंह खींवसर ने जोर देकर कहा कि अगर जांच में किसी भी स्तर पर कोई कोताही या लापरवाही उजागर होती है, तो संबंधित अधिकारियों व अन्य जिम्मेदार व्यक्तियों के विरुद्ध दंडात्मक कार्रवाई में देरी नहीं की जाएगी। सरकार की मंशा इन घटनाओं की पुनरावृत्ति रोकने की है।
कोटा, बीकानेर और भीलवाड़ा की घटनाओं का विवरण
राज्य के कई जिलों में प्रसूताओं की मौतों के आंकड़े सामने आए हैं। कोटा के न्यू मेडिकल कॉलेज और जे.के. लोन अस्पताल में प्रसव के बाद 5 माताओं ने दम तोड़ दिया। वहीं बीकानेर के पीबीएम अस्पताल में किडनी की समस्या और संक्रमण के चलते 6 महिलाओं की स्थिति बिगड़ी, जिनमें से 2 ने इलाज के दौरान दम तोड़ दिया। ताजा घटनाक्रम भीलवाड़ा के महात्मा गांधी अस्पताल का है, जहां मात्र 6 दिनों में 5 प्रसूताओं की जान चली गई। प्राथमिक जांच के अनुसार, इनमें से अधिकांश महिलाएं अन्य स्थानों से अत्यंत नाजुक स्थिति में रेफर होकर आई थीं। संक्रमण, अत्यधिक रक्तस्राव और प्रसव की जटिलताएं प्रमुख कारण बनीं। कोटा में इस्तेमाल हुए ऑक्सीटोसिन इंजेक्शन की गुणवत्ता को लेकर उठे विवाद की भी जांच की जा रही है।
उच्चस्तरीय समीक्षा बैठक और मातृ मृत्यु दर पर स्थिति
मंत्री गजेंद्र सिंह खींवसर ने स्वीकार किया कि राजस्थान में मातृ मृत्यु दर अन्य राज्यों की तुलना में काफी नियंत्रण में है, फिर भी हालिया घटनाएं कतई स्वीकार्य नहीं हैं। समस्या का समाधान निकालने के लिए जयपुर में सोमवार को एक उच्चस्तरीय बैठक आहूत की गई है। इसमें राज्य भर के नामी गायनेकोलॉजिस्ट, मेडिकल कॉलेजों के प्राचार्य और विशेषज्ञ चिकित्सक शामिल होंगे। इस बैठक में मेडिकल ऑडिट रिपोर्ट्स, रेफरल सिस्टम की खामियों और उपचार प्रोटोकॉल की विस्तृत समीक्षा की जाएगी।
रेफरल सिस्टम और दवाओं की गुणवत्ता का विवाद
बड़े सरकारी अस्पतालों पर दबाव की चर्चा करते हुए गजेंद्र सिंह खींवसर ने बताया कि वहां हमेशा क्रिटिकल केस पहुंचते हैं। उन्होंने स्पष्ट किया कि सरकारी अस्पतालों में निशुल्क इलाज की सुविधा है और किसी को भी उपचार देने से मना नहीं किया जाता। कोटा में जिस ऑक्सीटोसिन इंजेक्शन का मुद्दा उठा था, उसमें यह पता चला कि उस बैच की कुछ शीशियों में दवा के बजाय साधारण फ्लूइड मौजूद था। केंद्र सरकार ने उस दवा निर्माता कंपनी को ब्लैकलिस्ट करने के साथ ही उनकी फैक्ट्री को सील भी कर दिया है। सरकार ने दवाओं के सैंपल लैब में भिजवा दिए हैं और संदिग्ध बैच को तुरंत प्रभाव से उपयोग से बाहर कर दिया है। चिकित्सा प्रोटोकॉल का पालन न करने वाले संस्थानों पर सख्त निगरानी रखने के निर्देश जारी किए गए हैं।











