राजस्थान की रजिस्टर्ड गौशालाओं की आर्थिक स्थिति को मजबूत बनाने और उन्हें आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में एक नई पहल के रूप में गो-काष्ठ योजना को लागू किया गया है। इस विशेष योजना का मुख्य उद्देश्य गौशालाओं में आय के नए स्रोत तैयार करना है, ताकि वे अपने संचालन के लिए पूरी तरह से अन्य मदों पर निर्भर न रहें। इसके तहत सरकार की ओर से गो-काष्ठ मशीनें खरीदने पर भारी वित्तीय सहायता प्रदान की जा रही है, जिससे गोबर का उपयोग करके लकड़ी के विकल्प के रूप में गो-काष्ठ का उत्पादन किया जा सके।
गो-काष्ठ मशीनों की खरीद पर अस्सी प्रतिशत तक अनुदान
इस योजना की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि सरकार मशीन की कुल लागत का अस्सी प्रतिशत हिस्सा अनुदान के रूप में प्रदान करती है। शेष बीस प्रतिशत राशि का इंतजाम संबंधित गौशाला को अपने स्तर पर करना होता है। इन सभी मशीनों की खरीद की प्रक्रिया गोपालन निदेशालय के स्तर पर पूरी की जाती है। इस प्रकार तैयार होने वाले गो-काष्ठ की अनुमानित कीमत आठ रुपए प्रति किलोग्राम तय की गई है, जिसे बेचकर गौशालाएं अपनी आय में इजाफा कर सकती हैं।
मशीनों के दुरुपयोग पर रोक के लिए दस साल का कड़ा प्रतिबंध
योजना के तहत मिलने वाली मशीनों का किसी भी प्रकार से गलत इस्तेमाल न हो, इसके लिए पशुपालन विभाग ने बहुत सख्त नियम बनाए हैं। स्पष्ट निर्देश दिए गए हैं कि कोई भी लाभार्थी गौशाला अनुदान पर प्राप्त इस मशीन को दस साल का समय पूरा होने से पहले न तो बेच सकेगी और न ही किसी अन्य व्यक्ति या संस्था को हस्तांतरित कर पाएगी। नियमों का उल्लंघन करने वाली संस्थाओं पर विभाग की ओर से कड़ी कार्रवाई की जाएगी।
नियम तोड़ने पर रद्द होगा अनुदान और पंजीकरण
यदि कोई भी गौशाला निर्धारित दस साल की अवधि पूरी होने से पहले मशीन को बेचने या किसी को ट्रांसफर करने का प्रयास करती है, तो उसका सरकारी अनुदान तुरंत प्रभाव से बंद कर दिया जाएगा। इतना ही नहीं, ऐसी लापरवाही बरतने वाली संबंधित गौशाला का आधिकारिक पंजीकरण भी रद्द कर दिया जाएगा। विभाग का यह कदम यह सुनिश्चित करने के लिए है कि योजना का लाभ केवल उन्हीं संस्थाओं तक सीमित रहे जो वास्तव में इसके पात्र हैं और सही दिशा में काम कर रही हैं।
दस दिन के भीतर अनिवार्य रूप से करानी होगी जियो-टैगिंग
गौशाला संचालकों को यह बताना होगा कि मशीन को कहां स्थापित किया गया है और उसकी वास्तविक स्थिति क्या है। इसके लिए गो-काष्ठ मशीन की जियो-टैगिंग को पूरी तरह अनिवार्य कर दिया गया है। जैसे ही गौशाला को मशीन प्राप्त होती है, उसके दस दिनों के भीतर संबंधित पशुपालन विभाग के संयुक्त निदेशक को इसकी जियो-टैगिंग पूरी करनी होगी। इससे विभाग के पास मशीन के सटीक स्थान और उसके उपयोग की ऑनलाइन निगरानी का रिकॉर्ड रहेगा।
मासिक निगरानी और त्रैमासिक आय का हिसाब देना जरूरी
मशीनों के सही तरीके से संचालन और गो-काष्ठ के उत्पादन पर लगातार पैनी नजर रखी जाएगी। इसके लिए जिला स्तरीय गोपालन समिति को हर महीने पर्यवेक्षण करने की जिम्मेदारी सौंपी गई है। इसके अलावा, सभी लाभार्थी गौशालाओं को प्रत्येक तीन महीने में गो-काष्ठ के उत्पादन, उसकी कुल बिक्री और उससे मिलने वाली आय का पूरा विवरण विभाग को सौंपना होगा। इससे यह स्पष्ट होता रहेगा कि योजना से कितनी वास्तविक आमदनी हो रही है और मशीन का उपयोग किस प्रकार हो रहा है।
मोक्ष धाम से लेकर होटल और ढाबों तक होगी बिक्री
तैयार होने वाले गो-काष्ठ का उपयोग पारंपरिक लकड़ी के बेहतरीन विकल्प के रूप में कई जगहों पर किया जा सकता है। गौशालाएं इस उत्पाद को मोक्ष धाम, फैक्ट्रियों के बॉयलरों, होटल और ढाबों के साथ-साथ हवन और पूजन कार्यों के लिए भी ईंधन के रूप में बेच सकेंगी। इस बिक्री से मिलने वाली पूरी की पूरी राशि सीधे गौशाला के बैंक खाते में जाएगी, जिससे वे अपनी वित्तीय स्थिति को खुद मजबूत कर सकेंगी।
योजना का लाभ पाने के लिए तय की गई हैं कड़ी शर्तें
इस योजना का लाभ हर कोई गौशाला प्राप्त नहीं कर सकती है। इसके लिए कुछ खास शर्तें पूरी करनी होंगी, जैसे गौशाला का रजिस्टर्ड होना और कम से कम तीन साल से लगातार संचालित होना जरूरी है। इसके अतिरिक्त, गौशाला के पास दो सौ से अधिक गोवंश, न्यूनतम पांच बीघा जमीन और थ्री-फेज बिजली का कनेक्शन होना अनिवार्य है। जिन संस्थानों के खिलाफ कोई कोर्ट केस लंबित है या जिन्होंने वर्ष 2024-25 के दौरान इस योजना का लाभ पहले ही ले लिया है, वे आवेदन करने के योग्य नहीं होंगी। यदि सौ से अधिक आवेदन प्राप्त होते हैं, तो अधिक गोवंश रखने वाली संस्थाओं को प्राथमिकता दी जाएगी।


















