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मदन दिलावर के परिवार में सियासी घमासान, बेटे-बहू का वोटर आवेदन खारिज और भाई की दावेदारी पर चर्चाराजस्थान
29 अग॰ 2026, 11:09 am (43 मिनट पहले)· 2

मदन दिलावर के परिवार में सियासी घमासान, बेटे-बहू का वोटर आवेदन खारिज और भाई की दावेदारी पर चर्चा

राजस्थान के शिक्षा मंत्री मदन दिलावर के परिवार में अटरू नगरपालिका चुनावों को लेकर राजनीतिक हलचल तेज हो गई है। वार्ड नंबर 21 की मतदाता सूची में नाम जुड़वाने के लिए मंत्री के बेटे और बहू द्वारा दिए गए आवेदन को एसडीएम ने खारिज कर दिया है।

राजस्थान की राजनीति में एक बार फिर शिक्षा मंत्री मदन दिलावर चर्चा के केंद्र में आ गए हैं। इस बार वजह विभाग का कोई आदेश नहीं बल्कि उनके गृह जिले बारां के अटरू नगरपालिका चुनाव हैं। पहली बार होने जा रहे इन स्थानीय निकाय चुनावों के कारण वार्ड नंबर 21 इन दिनों खासी सुर्खियां बटोर रहा है, जहां पारिवारिक स्तर पर राजनीतिक सरगर्मी तेज हो गई है। इसी वार्ड की मतदाता सूची में नाम शामिल कराने के वास्ते दिए गए आवेदनों पर प्रशासनिक कार्रवाई होने के बाद से ही सियासी गलियारों में तरह-तरह की चर्चाएं शुरू हो गई हैं।

वार्ड 21 की मतदाता सूची को लेकर विवाद

विवाद की शुरुआत तब हुई जब 21 अगस्त को पवन दिलावर और उनकी पत्नी हेमलता दिलावर ने अटरू नगरपालिका के वार्ड संख्या 21 के अंतर्गत भाग-1 की मतदाता सूची में अपना नाम दर्ज कराने के लिए आधिकारिक आवेदन प्रस्तुत किया। इस आवेदन पत्र में बस स्टैंड के नजदीक स्थित मकान नंबर 10 का पता लिखा गया था। जब यह आवेदन एसडीएम अंजना सहरावत के कार्यालय में पहुंचा, तो उसमें दर्ज पते को लेकर कुछ संशय पैदा हुआ। स्थिति की सच्चाई का पता लगाने के लिए पांच सदस्यीय जांच समिति का गठन किया गया। समिति के सदस्यों ने मौके पर पहुंचकर पड़ोस के पांच मकानों के निवासियों के बयान दर्ज किए और वस्तुस्थिति का जायजा लिया। जांच में यह तथ्य सामने आया कि दोनों आवेदक न तो पहले कभी इस पते पर रहे थे और न ही वर्तमान में वहां निवास कर रहे हैं। इसके अलावा वार्ड 21 में रहने का कोई पुख्ता दस्तावेज भी प्रस्तुत नहीं किया जा सका, जबकि आवेदन के साथ जो आधार कार्ड लगाया गया था वह रंगबाड़ी का था।

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एसडीएम द्वारा आवेदन निरस्त करने की कार्रवाई

जांच दल की रिपोर्ट मिलने के बाद एसडीएम ने पवन दिलावर और हेमलता दिलावर के मतदाता सूची में नाम जोड़ने वाले दोनों आवेदनों को खारिज कर दिया। प्रशासनिक आदेश में इस बात का विशेष रूप से जिक्र किया गया कि दस्तावेजों पर हस्ताक्षर करने की बजाय अंगूठे का निशान लगाया गया था। आदेश के मुताबिक, आवेदक शिक्षित होने के बावजूद हस्ताक्षर के स्थान पर अंगूठे का प्रयोग किए जाने से पूरे मामले की प्रामाणिकता पर सवाल खड़े हो गए। अटरू नगरपालिका का यह पहला ही चुनाव है, इसलिए मंत्री के परिवार के सदस्यों द्वारा इस प्रकार आवेदन किए जाने से स्थानीय स्तर पर कई तरह के सवाल उठने लगे हैं।

अटरू के नगरपालिका बनने के बाद यहां पहली बार निकाय चुनाव हो रहे हैं और इस बार अध्यक्ष पद अनुसूचित जाति वर्ग के लिए आरक्षित किया गया है। इस वजह से पहले से ही चुनावी माहौल काफी गर्म था, लेकिन शिक्षा मंत्री मदन दिलावर के परिजनों के नाम आने से मुकाबला बेहद दिलचस्प हो गया है। एक तरफ जहां मंत्री के बेटे के चुनाव मैदान में उतरने की अटकलें हैं, वहीं दूसरी तरफ उनके भाई कृष्ण मुरारी के भी दावेदारी पेश करने की चर्चाएं हैं। इसके अलावा इसी वार्ड से कुछ पूर्व विधायकों और पूर्व मेयरों के नाम भी सामने आ रहे हैं, जिससे मुकाबला और कड़ा हो गया है।

पवन दिलावर का चुनाव लड़ने की संभावना से इनकार

इन तमाम अटकलों और चर्चाओं के बीच पवन दिलावर ने चुनाव लड़ने की बात को पूरी तरह खारिज कर दिया है। उन्होंने स्पष्ट किया कि उन्होंने और उनकी पत्नी ने केवल मतदाता सूची में नाम जुड़वाने की अर्जी दी थी, लेकिन चुनाव लड़ने के लिए कोई आवेदन नहीं किया गया था। उन्होंने इन चर्चाओं को एक सोची-समझी साजिश करार दिया है। हालांकि उनके इस इनकार के बावजूद वार्ड 21 का सियासी पारा कम नहीं हुआ है। भारतीय जनता पार्टी के संगठनात्मक स्तर पर अभी टिकट वितरण का अंतिम निर्णय लिया जाना बाकी है। एक ही परिवार के कई सदस्यों के संभावित रूप से सामने आने और अन्य स्थानीय नेताओं की सक्रियता के बीच पार्टी किसे अपना उम्मीदवार बनाती है, इस पर सभी की नजरें टिकी हुई हैं।

भारतीय जनता पार्टी के सामने टिकट चयन की चुनौती

अटरू में होने वाले इन पहले निकाय चुनावों में सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी के लिए टिकट का बंटवारा आसान नहीं होगा। एक ही वार्ड से कई दावेदारों के सक्रिय होने के कारण पार्टी संगठन को स्थानीय राजनीतिक समीकरणों, जीत की संभावनाओं और कार्यकर्ताओं की मेहनत को ध्यान में रखकर फैसला करना होगा। खासतौर पर शिक्षा मंत्री के परिवार से जुड़ी चर्चाओं के चलते वार्ड 21 पर लिया जाने वाला निर्णय पार्टी के लिए बहुत महत्वपूर्ण माना जा रहा है। फिलहाल पवन दिलावर ने चुनाव लड़ने की संभावनाओं को सिरे से नकार दिया है और इसे साजिश बताया है, जबकि उनके भाई कृष्ण मुरारी की दावेदारी पर भी अभी तक पूरी स्थिति साफ नहीं हो पाई है। अब सबकी निगाहें पार्टी के अंतिम फैसलों पर टिकी हैं, जिससे यह तय होगा कि चुनावी मैदान में कौन से चेहरे आमने-सामने होंगे।

सवाल-जवाब

अटरू नगरपालिका में चुनाव क्यों चर्चा में हैं?
अटरू में पहली बार निकाय चुनाव हो रहे हैं और शिक्षा मंत्री मदन दिलावर के परिवार के सदस्यों के वोटर लिस्ट में नाम जुड़वाने के आवेदन खारिज होने से यह चर्चा में है।
वार्ड नंबर 21 के मतदाता सूची आवेदन किसने दिए थे?
यह आवेदन शिक्षा मंत्री मदन दिलावर के बेटे पवन दिलावर और उनकी पत्नी हेमलता दिलावर ने दिए थे।
प्रशासन ने आवेदन क्यों खारिज किए?
जांच समिति की रिपोर्ट में आवेदक उस पते पर निवास करते नहीं पाए गए और दस्तावेजों पर हस्ताक्षर की जगह अंगूठे का निशान होने से संदेह पैदा हुआ।
क्या पवन दिलावर चुनाव लड़ रहे हैं?
पवन दिलावर ने चुनाव लड़ने की किसी भी संभावना से साफ इनकार किया है और इसे साजिश बताया है।
इस चुनाव में कौन सा पद आरक्षित है?
अटरू नगरपालिका में अध्यक्ष का पद अनुसूचित जाति वर्ग के लिए आरक्षित किया गया है।
संपादकीय नीति सुधार नीति

टिप्पणियाँ 2

Karan Malhotra@karan-malhotra·16 मिनट पहले

यह प्रशासनिक कार्रवाई निष्पक्ष चुनाव प्रक्रिया की दृष्टि से एक महत्वपूर्ण मिसाल है, जहाँ प्रशासनिक मशीनरी ने राजनीतिक रसूख के दबाव से मुक्त होकर कानून सम्मत फैसला लिया। यदि इस मामले में कानूनी रूप से आगे की जांच होती है, तो गलत पते का इस्तेमाल और दस्तावेजों में विसंगतियों के चलते लोक प्रतिनिधित्व कानून के तहत और अधिक गंभीर विधिक परिणाम सामने आ सकते हैं, जिससे स्थानीय स्तर पर राजनीतिक समीकरण पूरी तरह बदल सकते हैं।

Rohan Verma@rohan-verma·15 मिनट पहले

यह घटना न केवल स्थानीय निकाय चुनावों की शुचिता पर सवाल उठाती है, बल्कि सत्ता पक्ष के दिग्गजों के लिए भी एक बड़ी साख की लड़ाई बन गई है। जब प्रशासनिक स्तर पर इस तरह की अनियमितताएं उजागर होती हैं, तो क्षेत्रीय मतदाताओं के बीच एक कड़ा संदेश जाता है। चूंकि अध्यक्ष पद आरक्षित है और परिवार के भीतर ही अलग-अलग दावेदार सामने आ रहे हैं, ऐसे में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि सत्तारूढ़ दल भीतरघात से कैसे बचता है और यह विवाद चुनावी परिणामों को किस हद तक प्रभावित करता है।

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