रबी फसलों की बुवाई का चक्र शुरू होते ही राजस्थान के नागौर जिले में किसान खेतों को संवारने में जुट चुके हैं। इस इलाके में अक्टूबर का महीना रायड़े यानी सरसों की खेती के लिए बेहद अहम माना जाता है। कृषि विशेषज्ञों का स्पष्ट तौर पर कहना है कि अगर शुरुआत में ही सही तकनीक, प्रमाणित बीज और मौसम के अनुकूल समय का चुनाव कर लिया जाए, तो फसल न केवल रोगों से बची रहती है बल्कि पैदावार भी रिकॉर्ड स्तर पर पहुंचती है। नागौर की रेतीली और दोमट मिट्टी में सरसों की खेती किसानों के लिए आजीविका का बड़ा आधार है, इसलिए बुवाई की तैयारियों में कोई भी चूक सीधे उत्पादन को प्रभावित कर सकती है।
बुवाई की सबसे उपयुक्त समय सीमा और मिट्टी की नमी का गणित
कृषि विशेषज्ञों के मुताबिक सरसों की बुवाई के लिए सबसे बेहतरीन समय 10 अक्टूबर से लेकर 25 अक्टूबर के बीच माना जाता है। इस अवधि में तापमान और दिन की लंबाई बीज अंकुरण के लिए एकदम मुफीद होती है। हालांकि, बुवाई की सटीक तारीख तय करते समय स्थानीय मौसम की स्थिति, खेत की मिट्टी में मौजूद नमी और चुनी गई किस्म के पकने के समय का ध्यान रखना बहुत आवश्यक है। अगर मौसम में अधिक गर्माहट बनी रहे तो किसानों को कुछ दिन रुककर बुवाई करने की सलाह दी जाती है।
रायड़े की फसल को मजबूत और स्वस्थ शुरुआत देने के लिए खेत की गहरी और व्यवस्थित जुताई जरूरी होती है। जुताई के बाद पाटा चलाकर मिट्टी को भुरभुरा और समतल बना लेना चाहिए। खेत समतल होने से सिंचाई का पानी पूरे रकबे में एक बराबर फैलता है और किसी हिस्से में जलभराव या सूखा रहने की समस्या नहीं आती। बुवाई के वक्त मिट्टी में पर्याप्त नमी का होना सबसे जरूरी शर्त है। यदि नमी में कमी पाई जाती है, तो बीजों का जमाव रुक जाता है या बहुत कमजोर होता है, जिससे पूरे खेत में पौधों की तादाद कम रह जाती है। इसलिए किसानों को हमेशा जमीन की ऊपरी और निचली परत में नमी की जांच करने के बाद ही प्रमाणित और उच्च गुणवत्ता वाले बीजों को बोना चाहिए।
नागौर की परिस्थितियों के अनुसार उन्नत किस्मों का चुनाव
कृषि विशेषज्ञ बजरंग सिंह ने इस बात पर जोर दिया है कि नागौर जिले की स्थानीय आबोहवा और उपलब्ध कृषि संसाधनों को देखकर ही बीजों का चयन किया जाना चाहिए। किसान भाइयों के लिए आरएच-749, गिरिराज और आरजीएन-73 जैसी उन्नत किस्में बेहतरीन विकल्प साबित हो सकती हैं। ये किस्में उच्च उत्पादन देने के साथ-साथ मौसमी उतार-चढ़ाव को भी बेहतर तरीके से झेलती हैं।
इसके साथ ही, जिन इलाकों में सिंचाई के पानी की कमी है अथवा नहरी या भूजल सीमित है, वहां किसान आरजीएन-298 जैसी सूखा-सहनशील किस्म को अपनाने के लिए कृषि विशेषज्ञों से सलाह ले सकते हैं। किसी भी किस्म का चयन करते वक्त चार प्रमुख पैमानों पर गौर करना चाहिए, जिनमें स्थानीय जमीन की अनुकूलता, फसल पकने की कुल समय सीमा, पानी की जरूरत और विभिन्न फफूंदजनित या कीट जनित रोगों के प्रति प्रतिरोधक क्षमता शामिल हैं। किसानों को बाजार से बीज खरीदते समय हमेशा अधिकृत विक्रेताओं से ही पैकेट लेना चाहिए और पैकेट पर लिखी सील, तारीख और शुद्धता प्रतिशत को ध्यानपूर्वक जांचना चाहिए।
कतार बुवाई, सही गहराई और संतुलित पोषण का महत्व
नागौर के युवा प्रगतिशील किसान अर्जुन चौधरी ने अपने व्यावहारिक अनुभवों को साझा करते हुए बताया कि सरसों में पौधों की उचित दूरी ही बंपर पैदावार की असली कुंजी है। छिटकवां विधि के बजाय कतार में बुवाई करने से पौधे को फैलने के लिए पर्याप्त जगह, धूप और हवा मिलती है। सामान्य सिफारिश के अनुसार कतार से कतार की दूरी लगभग 30 सेंटीमीटर रखी जानी चाहिए, जबकि बीजों को जमीन में केवल 2 से 3 सेंटीमीटर की गहराई पर ही डालना चाहिए। यदि बीज अधिक गहराई पर चले जाते हैं, तो उनका अंकुरण धीमा पड़ जाता है या वे जमीन के भीतर ही गल जाते हैं।
कतारबद्ध बुवाई का सबसे बड़ा फायदा यह होता है कि खेत में प्रति वर्ग मीटर पौधों की संख्या बिल्कुल संतुलित रहती है। इससे खरपतवार निकालने, निराई-गुड़ाई करने और कीटनाशक छिड़काव के कार्य आसानी से पूरे किए जा सकते हैं। इसके अलावा फसल चक्र के दौरान सिंचाई का समय पर होना अनिवार्य है। खासतौर पर जब पौधे में फूल खिल रहे हों और फलियां बन रही हों, उस नाजुक दौर में खेत में नमी बिल्कुल खत्म नहीं होनी चाहिए। अगर किसान संतुलित मात्रा में जैविक खाद और उर्वरकों का प्रयोग करते हैं, तो पौधों की शाखायें मजबूत होती हैं और प्रत्येक फली में दानों का आकार बड़ा तथा चमकदार बनता है, जिससे मंडी में फसल का बेहतरीन भाव मिलता है।

















