झारखंड के बोकारो जिले में बड़ी संख्या में किसान मिर्च की नकदी फसल पर निर्भर हैं। मिर्च की खेती से अच्छी कमाई की उम्मीद रखने वाले काश्तकारों के सामने सबसे बड़ी चुनौती फसलों में अचानक फैलने वाली बीमारियां होती हैं। देखरेख में मामूली सी चूक अथवा शुरुआती लक्षणों की अनदेखी पूरे खेत को तबाह कर सकती है, जिससे पैदावार में भारी गिरावट आती है और किसानों की लागत तक डूब जाती है। इस संकट से निपटने के लिए बोकारो के कृषि विशेषज्ञ कुलदीप कुमार ने मिर्च की फसल को तबाह करने वाले तीन सबसे आम और घातक रोगों, उनके प्राथमिक लक्षणों तथा समय पर किए जाने वाले वैज्ञानिक रोकथाम उपायों की विस्तृत जानकारी दी है।
लीफ कर्ल वायरस की समय पर पहचान और उसकी रोकथाम
मिर्च की खेती में लीफ कर्ल वायरस का प्रकोप बहुत तेजी से फैलता है और यह फसल को सबसे ज्यादा नुकसान पहुंचाने वाली व्याधियों में से एक है। कृषि विशेषज्ञ कुलदीप कुमार बताते हैं कि यह वायरल संक्रमण सीधे पौधे में नहीं पनपता, बल्कि सफेद मक्खी जैसे रस चूसक कीट इस वायरस के मुख्य वाहक बनते हैं। जब सफेद मक्खी एक बीमार पौधे का रस चूसकर स्वस्थ पौधे पर बैठती है, तो संक्रमण तेजी से पूरे खेत में फैल जाता है।
इस बीमारी की पहचान पत्तियों की बनावट से आसानी से की जा सकती है। संक्रमित मिर्च के पौधे की पत्तियां ऊपर की तरफ मुड़कर एक कटोरे जैसी आकृति ले लेती हैं। पत्तियां आकार में बहुत छोटी, खुरदरी और सिकुड़ी हुई रह जाती हैं। इसके कारण पौधों का स्वाभाविक विकास पूरी तरह रुक जाता है और वे बौने दिखाई देने लगते हैं। गंभीर संक्रमण होने पर पौधे में फूल और फल बहुत कम बनते हैं या जो बनते हैं वे समय से पहले गिर जाते हैं, जिससे पैदावार बुरी तरह गिर जाती है।
इस बीमारी से बचाव के लिए खेत की लगातार निगरानी जरूरी है। यदि किसी पौधे में लीफ कर्ल के लक्षण दिखाई दें, तो उसे बिना देर किए जड़ से उखाड़कर खेत से काफी दूर ले जाकर नष्ट कर देना चाहिए, ताकि वायरस अन्य पौधों में न फैले। इसके साथ ही वाहक कीट सफेद मक्खी का खात्मा करना अनिवार्य है। इसके रासायनिक नियंत्रण के लिए इमिडाक्लोरोपीड दवा का 0.5 ग्राम प्रति लीटर पानी की दर से घोल बनाकर पौधों पर अच्छी तरह छिड़काव करना चाहिए।
नर्सरी में डंपिंग ऑफ से नन्हें पौधों को बचाने की विधि
मिर्च की खेती की शुरुआत नर्सरी से होती है और यहीं पर डंपिंग ऑफ यानी आर्द्र गलन बीमारी नन्हें पौधों को अपनी चपेट में ले लेती है। यह समस्या मुख्य रूप से मिट्टी में पहले से मौजूद हानिकारक फफूंद और क्यारियों में जरूरत से ज्यादा नमी या जलभराव होने पर पैदा होती है। जब बीज अंकुरित होकर बाहर आते हैं, तब यह फफूंद नन्हें पौधे के तने के उस निचले हिस्से पर हमला करती है जो जमीन की सतह के संपर्क में होता है।
संक्रमण के बाद पौधे के तने का निचला हिस्सा गलने और सड़ने लगता है। तना कमजोर हो जाने के कारण पौधा अपना वजन नहीं संभाल पाता और जमीन पर गिरकर सूख जाता है। इससे नर्सरी में पौधों की आबादी बहुत तेजी से घट जाती है और खेत में रोपाई के लिए स्वस्थ पौधों की भारी कमी हो जाती है।
डंपिंग ऑफ से बचाव के उपाय नर्सरी तैयार करते समय ही शुरू कर देने चाहिए। बीजों को क्यारी में बोने से पहले उनका उचित उपचार करना अनिवार्य है। इसके अलावा, नर्सरी की क्यारियां हमेशा सामान्य जमीनी सतह से लगभग 15 सेंटीमीटर ऊंची बनानी चाहिए, ताकि सिंचाई या बारिश का अतिरिक्त पानी क्यारी में जमा न हो और जल निकासी सुचारू रूप से होती रहे।
मिट्टी को फफूंदमुक्त रखने के लिए जैविक उपाय के तौर पर ट्राइकोडर्मा फफूंदनाशक का निर्धारित मात्रा में प्रयोग करना चाहिए। यदि इसके बावजूद नर्सरी में पौधे गिरने के लक्षण नजर आएं, तो कॉपर ऑक्सीक्लोराइड 50 प्रतिशत डब्ल्यूपी अथवा मैंकोजेब जैसे फफूंदनाशकों का उचित मात्रा में घोल बनाकर छिड़काव करने से इस बीमारी को फैलने से रोका जा सकता है।
उकठा रोग का हमला और फसल चक्र का महत्व
मिर्च की रोपाई के बाद खेत में उकठा रोग किसानों के लिए गंभीर सिरदर्द बन जाता है। इस रोग की चपेट में आने पर खेत में लहलहाते पौधे अचानक दिन के समय मुरझाने लगते हैं और कुछ ही दिनों के भीतर पूरी तरह सूख जाते हैं। रोग की पुष्टि करने के लिए जब सूखे हुए पौधे को जमीन से उखाड़कर देखा जाता है, तो उसकी जड़ों पर काले रंग के धब्बे स्पष्ट नजर आते हैं और जड़ें अंदर से सड़ी हुई मिलती हैं।
उकठा रोग से बचाव के लिए सबसे प्रभावी तरीका फसल चक्र को अपनाना है। जिस खेत में मिर्च की फसल ली गई हो, उसमें लगातार दोबारा मिर्च नहीं लगानी चाहिए। मिर्च की कटाई के बाद उसी खेत में धनिया या दलहनी फसलों की बुआई करनी चाहिए। फसल चक्र बदलने से मिट्टी में मौजूद उकठा रोग के रोगाणु प्राकृतिक रूप से नष्ट हो जाते हैं और मिट्टी का स्वास्थ्य भी सुधरता है।
रासायनिक नियंत्रण के तौर पर कार्बेंडाजिम दवा का उपयोग किया जाता है। इसके लिए 2.5 ग्राम कार्बेंडाजिम प्रति लीटर पानी में घोलकर मिर्च के पौधों की जड़ों के आसपास की मिट्टी को अच्छी तरह तर करना चाहिए। कृषि विशेषज्ञ के अनुसार, मिर्च की पौध रोपने के एक हफ्ते बाद इस घोल का छिड़काव या ड्रेंचिंग करने से पौधे की जड़ें सुरक्षित रहती हैं और उकठा रोग का जोखिम काफी कम हो जाता है।
स्वस्थ फसल के लिए खेत प्रबंधन के जरूरी नियम
मिर्च की खेती में अधिकतम उत्पादन प्राप्त करने के लिए केवल दवाओं पर निर्भर रहने के बजाय खेत के समग्र प्रबंधन पर ध्यान देना जरूरी है। खेत और नर्सरी दोनों ही स्थानों पर जलनिकासी का उचित प्रबंध होना चाहिए, क्योंकि ठहरा हुआ पानी फफूंदजनित रोगों को तेजी से बढ़ावा देता है।
किसानों को हमेशा प्रमाणित और स्वस्थ बीजों व पौधों का ही चुनाव करना चाहिए। रोपाई संपन्न हो जाने के बाद भी नियमित अंतराल पर खेत का दौरा करना चाहिए। शुरुआती दौर में ही किसी बीमारी या कीट के लक्षण पहचान लेने से कम खर्च में तुरंत उपचार संभव हो जाता है, जिससे मिर्च की फसल स्वस्थ रहती है और पैदावार बंपर मिलती है।



















