राजस्थान हाई कोर्ट की जयपुर पीठ ने भारत-पाकिस्तान अंतरराष्ट्रीय सीमा के पास बिना अनुमति खड़े किए गए धार्मिक ढांचों को हटाने के प्रशासनिक आदेश को सही ठहराया है। जस्टिस समीर जैन की अदालत ने सोमवार को उन तमाम याचिकाओं को खारिज कर दिया, जिनमें सीमावर्ती इलाकों से अवैध निर्माण हटाने के नोटिस को चुनौती दी गई थी। कोर्ट ने साफ कर दिया कि जब बात देश की सुरक्षा की हो, तो किसी भी धार्मिक पहचान को उससे ऊपर नहीं रखा जा सकता।
पूरा विवाद शुरू कैसे हुआ
यह मामला केंद्रीय गृह मंत्रालय के निर्देश से जुड़ा है। मंत्रालय के आदेश पर सुरक्षा एजेंसियों ने सीमा से सटे इलाकों में सर्वे शुरू किया था। इस सर्वे में सामने आया कि बीते कुछ सालों में सरहद से 50 किलोमीटर के दायरे में कई मदरसे, मस्जिद, दरगाह और अन्य धार्मिक निर्माण बिना जिला कलेक्टर की अनुमति के खड़े कर दिए गए। सुरक्षा एजेंसियों ने इन ढांचों को राष्ट्रीय सुरक्षा के लिहाज से गंभीर खतरा माना, क्योंकि सीमा क्षेत्र में हर निर्माण पर निगरानी और नियंत्रण जरूरी होता है। इसी आधार पर प्रशासन ने इन धार्मिक ढांचों को हटाने के नोटिस जारी किए। स्थानीय समितियों ने इन नोटिसों के खिलाफ राजस्थान हाई कोर्ट में याचिकाएं दाखिल कीं। इस बीच बाड़मेर और जैसलमेर जिलों में प्रशासन पहले ही कुछ ढांचों पर कार्रवाई कर चुका है। अब हाई कोर्ट ने इन सभी याचिकाओं को खारिज करते हुए प्रशासन के रुख को सही ठहरा दिया।
अदालत ने अपने आदेश में क्या कहा
सुनवाई के दौरान कोर्ट ने साफ शब्दों में कहा कि अंतरराष्ट्रीय सीमा के नजदीक बिना वैधानिक मंजूरी के बनाया गया कोई भी धार्मिक ढांचा कानून की नजर में अवैध निर्माण ही माना जाएगा। अदालत ने यह भी कहा कि सिर्फ धार्मिक होने की वजह से ऐसे निर्माणों को बचाया नहीं जा सकता, खासकर तब जब मामला सीधे राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ा हो। इस टिप्पणी के साथ कोर्ट ने प्रशासन की उस दलील को स्वीकार कर लिया कि सीमा क्षेत्र में सुरक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता है।
अब आगे क्या होगा, समिति करेगी जांच
हाई कोर्ट ने सीधे सभी ढांचों को गिराने का आदेश नहीं दिया, बल्कि हर संपत्ति और निर्माण की अलग-अलग समीक्षा के लिए एक समिति बनाने का निर्देश दिया है। यह समिति हर मामले की स्वतंत्र रूप से जांच करेगी और अगर सुरक्षा की दृष्टि से जरूरी लगा, तभी संबंधित ढांचे को हटाने या तोड़ने का फैसला लेगी। इस समिति में तीन अहम सदस्य शामिल होंगे, संबंधित जिले के कलेक्टर, जिला पुलिस अधीक्षक यानी SP और सीमा सुरक्षा बल यानी BSF का एक प्रतिनिधि। यानी हर निर्माण पर फैसला मामला दर मामला आधार पर लिया जाएगा, न कि थोक में एक साथ।
जस्टिस समीर जैन की वो पंक्तियां, जो सुर्खियों में आ गईं
फैसला सुनाते वक्त जस्टिस समीर जैन ने एक कविता की कुछ पंक्तियां भी सुनाईं। इनका मतलब यही था कि जब देश की सुरक्षा का सवाल खड़ा हो, तो मंदिर हो, मस्जिद हो या कोई भी दूसरी धार्मिक पहचान, देश और उसकी सुरक्षा हमेशा सबसे ऊपर रहेगी। अदालत ने जो पंक्तियां उद्धृत कीं, वे इस तरह थीं
"ना मंदिर, ना मस्जिद, ना कोई दीवार बड़ी होती है,
जब मातृभूमि की रक्षा की बारी खड़ी होती है।
जो भूमि है राष्ट्र की, वह पहले राष्ट्र की ही रहेगी,
जहां सुरक्षा का प्रश्न उठे, वहां राष्ट्र प्रधान रहेगा।"
इन पंक्तियों ने अदालत के इस पूरे फैसले के सार को बेहद सीधे और भावनात्मक अंदाज में सामने रख दिया, जिसकी वजह से यह टिप्पणी फैसले का सबसे चर्चित हिस्सा बन गई। कानूनी हलकों में इसे सीमावर्ती इलाकों में अनधिकृत निर्माणों पर आगे की कार्रवाई के लिए एक नजीर के तौर पर भी देखा जा रहा है।











