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बिना शादी के एक ही छत, एक ही बेड: हैदराबाद से नोएडा तक आईटी शहरों में क्यों बढ़ रहा है को-लिविंग का चलनरिश्ते
16 जून 2026, 2:19 pm (44 दिन पहले)· 2

बिना शादी के एक ही छत, एक ही बेड: हैदराबाद से नोएडा तक आईटी शहरों में क्यों बढ़ रहा है को-लिविंग का चलन

मेट्रो और आईटी हब शहरों में युवा अब बिना शादी के कमरा, खाना और बेड तक शेयर कर रहे हैं। जानिए इस को-लिविंग ट्रेंड के पीछे की वजहें और इसके छिपे हुए जोखिम।

शहरों की बदलती जीवनशैली के साथ एक नया शब्द लोगों की जुबान पर चढ़ता जा रहा है, और वह है को-लिविंग (Co-Living)। जो कल्चर कभी सिर्फ विदेशों की पहचान हुआ करता था, वह अब भारत के बड़े आईटी हब्स तक पहुंच चुका है। हैदराबाद, बेंगलुरु, पुणे और नोएडा जैसे शहरों में नौकरी कर रहे तमाम युवा बिना किसी शादी के बंधन के एक ही कमरे, एक ही खाने और यहां तक कि एक ही बेड को साझा कर रहे हैं। सवाल यह है कि यह महज एक फैशनेबल लाइफस्टाइल है, या फिर इसके पीछे आर्थिक मजबूरी और सोच का बदलाव भी छिपा है। इसी पहलू को आसान भाषा में समझने की कोशिश करते हैं।

आखिर को-लिविंग है क्या

को-लिविंग का सीधा मतलब है कि दो अलग-अलग लोग किसी सामाजिक या कानूनी रिश्ते यानी शादी के बिना, अपनी मर्जी से एक ही छत के नीचे पार्टनर की तरह रहें। इस व्यवस्था में वे न सिर्फ अपना खर्च बल्कि अपनी निजी जिंदगी भी एक-दूसरे के साथ बांटते हैं। यह कोई थोपा हुआ रिश्ता नहीं होता, बल्कि दोनों की आपसी सहमति पर टिका होता है।

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युवाओं को क्यों भा रहा है यह तरीका

विशेषज्ञों और मौजूदा ट्रेंड्स पर नजर डालें तो इस ओर युवाओं के झुकाव की कई वजहें सामने आती हैं।

जेब पर हल्का खर्च: बड़े शहरों में अकेले एक फ्लैट का किराया, बिजली का बिल, वाई-फाई और रोजाना के खाने का इंतजाम संभालना किसी भी कमाने वाले की जेब को ढीला कर देता है। जब दो लोग मिलकर यही खर्च आपस में बांट लेते हैं, तो एक आरामदायक और लग्जरी जिंदगी भी उनके बजट के दायरे में आ जाती है।

अकेलेपन का इलाज: घर और परिवार से सैकड़ों किलोमीटर दूर किसी नए शहर में अकेले रहने वाले युवाओं के लिए तनहाई सबसे बड़ी मुश्किल बन जाती है। ऐसे माहौल में को-लिविंग उन्हें एक साथी और भावनात्मक सहारा दोनों दे देता है।

पूरी आजादी: माता-पिता की रोक-टोक और समाज की बंदिशों से दूर रहकर जीना, यही इस कल्चर का सबसे बड़ा आकर्षण है। युवा इसे अपनी शर्तों पर जिंदगी जीने के एक मौके के तौर पर देखते हैं।

इसी बढ़ती मांग का नतीजा है कि अब शहरों में खास को-लिविंग हॉस्टल और पीजी (PG) की भरमार होती जा रही है, जहां युवाओं को उनकी पसंद और प्राइवेसी के हिसाब से सुविधाएं परोसी जा रही हैं।

चमक के पीछे का स्याह सच

पहली नजर में यह ट्रेंड जितना आसान और आकर्षक दिखता है, इसकी जमीनी हकीकत उतनी ही चिंता बढ़ाने वाली है। मनोचिकित्सकों (Psychologists) और काउंसलर्स के पास आजकल ऐसे युवाओं के मामले लगातार पहुंच रहे हैं, जो इन छोटी अवधि के रिश्तों के फेर में अपनी मानसिक शांति गंवा बैठे हैं।

टूटने और धोखे का डर: इस तरह के रिश्ते में चूंकि कोई सामाजिक या कानूनी जिम्मेदारी नहीं होती, इसलिए जरा सी अनबन पर भी लोग आसानी से अलग हो जाते हैं। कई बार युवा, खासकर लड़कियां, इस रिश्ते को लेकर भावनात्मक रूप से गंभीर हो जाती हैं, जबकि सामने वाला पार्टनर महज शारीरिक आकर्षण या वक्ती जरूरत के लिए साथ होता है। इसका अंजाम बाद में गहरे मानसिक आघात के रूप में सामने आता है।

जिम्मेदारियों से कतराने की आदत: जानकारों का कहना है कि इस माहौल में रहने वाले बहुत से युवा असल शादीशुदा जिंदगी को एक बोझ की तरह देखने लगते हैं। उन्हें लगता है कि शादी करते ही उनकी आजादी छिन जाएगी और सिर पर जिम्मेदारियों का पहाड़ आ जाएगा। यही वजह है कि वे स्थायी रिश्तों (Long-term commitments) से दूरी बनाने लगते हैं।

करियर और सेहत पर चोट: पल भर के सुख और बिना सोचे-समझे लिए गए फैसले कई बार युवाओं को अनचाहे गर्भ (Pregnancy) या अबॉर्शन जैसी शारीरिक और मानसिक परेशानियों में धकेल देते हैं। इसका सीधा असर उनके करियर और भविष्य पर पड़ता दिखाई देता है।

सोच-समझकर बढ़ाएं कदम

इन तमाम खतरों को जानते-बूझते हुए भी दूसरों की नकल करने की होड़ में शामिल होना युवाओं के लिए नुकसानदेह साबित हो सकता है। अगर को-लिविंग आज के दौर की जरूरत या पसंद बन भी रही है, तो इसके फायदों के साथ-साथ इसके इमोशनल, सोशल और मेंटल साइड-इफेक्ट्स को समझना भी उतना ही जरूरी है। किसी भी रिश्ते में आगे बढ़ने से पहले उसके भविष्य के नतीजों पर ठहरकर सोचना और अपनी भावनात्मक व निजी सुरक्षा (Emotional & Safety) का पूरा ध्यान रखना सबसे अहम है।

सवाल-जवाब

को-लिविंग कल्चर क्या है?
इसमें दो अलग-अलग लोग बिना शादी या किसी कानूनी बंधन के अपनी मर्जी से एक ही छत के नीचे पार्टनर की तरह रहते हैं और अपने खर्च व निजी जिंदगी को साझा करते हैं।
भारत के किन शहरों में यह ट्रेंड तेजी से बढ़ रहा है?
हैदराबाद, बेंगलुरु, पुणे और नोएडा जैसे बड़े आईटी हब शहरों में यह कल्चर तेजी से पैर पसार रहा है।
युवा इस ओर क्यों आकर्षित हो रहे हैं?
मुख्य वजहें हैं खर्च की बचत, अकेलेपन से छुटकारा और माता-पिता व समाज की बंदिशों से दूर पूरी आजादी से जीने की चाह।
इस ट्रेंड के क्या खतरे हैं?
ब्रेकअप और धोखे का डर, जिम्मेदारियों से कतराने की आदत, और अनचाहे गर्भ या अबॉर्शन जैसी समस्याएं, जिनका करियर और मानसिक सेहत पर असर पड़ता है।
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