विवाह के तुरंत बाद किसी भी युवती के पूरे जीवन का ढर्रा पूरी तरह बदल जाता है। वह अपने जन्म का परिवेश, अपना सुरक्षित कमरा और बरसों से बनी पहचान छोड़कर बिल्कुल नए लोगों तथा नए नियमों के बीच प्रवेश करती है। ऐसे नाजुक दौर में परिवार के सभी सदस्यों की यह साझी जिम्मेदारी बनती है कि वे केवल बहू से ही त्वरित बदलाव की अपेक्षा न रखें, बल्कि खुद भी खुले दिल से उसके स्वागत और भावनात्मक सहजता का प्रबंध करें।
अनुकूलन और नई दिनचर्या के लिए पर्याप्त वक्त मिलना जरूरी
किसी भी नए परिवेश में स्वयं को ढालना एक स्वाभाविक प्रक्रिया है, जिसमें समय लगना पूरी तरह स्वाभाविक है। नई बहू कोई स्वचालित यंत्र नहीं होती कि गृहप्रवेश के अगले ही पहर से वह पूरे परिवार की आदतों, प्राथमिकताओं और बारीक घरेलू व्यवस्थाओं को बिना किसी त्रुटि के संचालित करने लगे। उसने अपने जीवन के कई वर्ष एक अलग वातावरण में बिताए हैं जहां तौर-तरीके भिन्न हो सकते हैं। शुरुआत के हफ्तों या महीनों में यदि खानपान, पूजा-पाठ या दैनिक कार्यों में उससे कोई चूक हो जाए, तो उस पर तुरंत व्यंग्य कसने या नाराजगी दिखाने के बजाय धैर्य रखना चाहिए। प्रेमपूर्वक और सहजता से मार्गदर्शन देने पर व्यक्ति बिना किसी डर के चीजें तेजी से सीखता है।
व्यक्तिगत विचारों, प्राथमिकताओं और निर्णयों का उचित सम्मान
विवाह बंधन में बंधने का यह अर्थ कतई नहीं होता कि स्त्री का अपना स्वतंत्र अस्तित्व, पसंद और दृष्टिकोण समाप्त हो गया है। घर की रसोई में बनने वाले भोजन से लेकर पहनावे, व्यक्तिगत करियर और बड़े पारिवारिक निर्णयों तक, उसकी बात को भी गंभीरता से सुना जाना चाहिए। यह आवश्यक नहीं कि परिवार हर निर्णय में उसकी राय को अंतिम माने, लेकिन चर्चा में उसे बराबर का स्थान देना और उसकी भावनाओं का आदर करना यह दर्शाता है कि उसे घर की वास्तविक सदस्य माना जा रहा है। जब किसी व्यक्ति को अपनी बात खुलकर रखने का मंच मिलता है, तो परिवार के प्रति उसका उत्तरदायित्व और लगाव स्वाभाविक रूप से बढ़ जाता है।
मायके से जुड़े भावनात्मक रिश्तों पर किसी तरह की पाबंदी न हो
ससुराल आने के बाद भी एक बेटी का अपने माता-पिता और भाई-बहनों से नाता पहले जैसा ही अटूट बना रहता है। यदि वह नियमित रूप से अपने मायके में बात करती है, वहां मिलने जाती है या किसी संकट के समय अपने परिजनों का संबल बनती है, तो ससुराल वालों को इसे किसी असुरक्षा या उपेक्षा के रूप में नहीं देखना चाहिए। जिस स्त्री को अपने जन्मदाताओं से जुड़े रहने की पूरी स्वतंत्रता और मानसिक शांति मिलती है, वह अपने वैवाहिक घर को भी उतनी ही शिद्दत और निष्ठा से अपना मानती है। मायके को लेकर ताने कसना या तुलना करना उसके मन में भावनात्मक दूरी पैदा कर सकता है।
अन्य बहुओं अथवा बेटियों से तुलना करने की आदत से बचें
प्रत्येक इंसान का पालन-पोषण, स्वभाव और काम करने की शैली एक जैसी नहीं होती। किसी अन्य बहू, बेटी अथवा रिश्तेदार की मिसाल देकर बार-बार यह कहना कि वह अमुक काम बेहतर करती थी, नई बहू के आत्मसम्मान को गहरी ठेस पहुंचाता है। परंपराओं और तौर-तरीकों की दुहाई देकर उसे लगातार कमतर महसूस कराना उसे परिवार में घुलने-मिलने से रोकता है। स्वस्थ पारिवारिक माहौल वही होता है जहां प्रत्येक व्यक्ति की अपनी विशेषताओं को पहचाना जाए और उसे अपनी गति से घर में सम्मानजनक जगह बनाने का पूरा अवसर मिले।
वैवाहिक जीवन के निजी दायरे में सीमा से अधिक दखलंदाजी न करें
दो व्यक्तियों के बीच नए वैवाहिक रिश्ते में शुरुआती समय में मतभेद, अलग-अलग राय और छोटी-मोटी नोकझोंक होना बिल्कुल आम बात है। इन साधारण बातों को बड़ा पारिवारिक संकट बनाने के बजाय पति और पत्नी को आपस में संवाद करके मसले सुलझाने की पूरी छूट मिलनी चाहिए। यदि वे स्वयं आकर किसी विषय पर बड़ों का परामर्श या मध्यस्थता मांगें, तब निष्पक्ष और समझदारी भरा मार्गदर्शन देना उचित है। हर छोटी बात की तहकीकात करना या निजी बातचीत में अनावश्यक हस्तक्षेप करना दंपति के आपसी रिश्ते में कड़वाहट घोल देता है। घर में सच्चा अपनत्व केवल जिम्मेदारियां सौंपने से नहीं आता, बल्कि यह भावना जगाने से आता है कि नए सदस्य के सुख-दुख और गरिमा का भी उतना ही मोल है।



















