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500 साल पुरानी चित्रकारी और घी से बनी नींव, बीकानेर के इस जैन मंदिर की कहानी हैरान करती हैधर्म
4 घंटे पहले· 2

500 साल पुरानी चित्रकारी और घी से बनी नींव, बीकानेर के इस जैन मंदिर की कहानी हैरान करती है

बीकानेर के भांडाशाह जैन मंदिर की करीब 500 साल पुरानी भित्ति चित्रकारी और गुंबद की नक्काशी जितनी चर्चा में रहती है, उतनी ही चर्चा इस बात की भी होती है कि इसकी नींव में पानी की जगह 40,000 किलोग्राम देसी घी इस्तेमाल हुआ था.

लक्ष्मी गुप्तालक्ष्मी गुप्ताअंक ज्योतिषी 4 मिनट पढ़ें AI के लिए
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राजस्थान के बीकानेर शहर में बना भांडाशाह जैन मंदिर सिर्फ अपनी आस्था के लिए नहीं, बल्कि अपनी दीवारों, खंभों और गुंबदों पर उकेरी गई करीब 500 साल पुरानी भित्ति चित्रकारी के लिए भी दूर-दूर तक जाना जाता है. मंदिर की दीवारों पर प्राकृतिक रंगों से बनाई गई ये पेंटिंग्स जैन धार्मिक कथाओं, तीर्थंकरों के जीवन प्रसंगों, प्राचीन समृद्ध नगरों, राजदरबारों के वैभव और उस दौर के सामाजिक जीवन को बेहद बारीकी से दिखाती हैं. इतने वर्षों बाद भी इन चित्रों की चमक और ताज़गी बरकरार है, और यही वजह है कि इन्हें भारतीय पारंपरिक भित्ति कला यानी फ्रेस्को आर्ट का बेजोड़ नमूना माना जाता है.

भव्य चित्रकारी और गुंबद की अनूठी कारीगरी

मंदिर का विशाल गुंबद अपनी बनावट और बारीक चित्रकारी के लिए अलग पहचान रखता है. गुंबद के बीचोंबीच एक बेहद कलात्मक कमल की आकृति बनाई गई है, और उसके चारों ओर जैन धर्म के अलग-अलग पवित्र तीर्थस्थलों, ऐतिहासिक धार्मिक जगहों और प्राचीन इमारतों के मनमोहक चित्र उकेरे गए हैं. इतनी बारीक कारीगरी देखकर अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि मध्यकालीन दौर के कलाकारों के पास कितना धैर्य, हुनर और कल्पनाशक्ति रही होगी. मंदिर के भीतर खड़े होकर जब कोई ऊपर छत की तरफ नज़र उठाता है, तो लगता है जैसे पूरा इतिहास एक गोल कैनवास पर जीवंत हो उठा हो. यही वजह है कि यह छत और गुंबद देश-विदेश से आने वाले पर्यटकों और कला प्रेमियों के लिए सबसे बड़ा आकर्षण बन जाते हैं.

गुंबद के भीतरी हिस्से में अलग-अलग गोलाकार फ्रेम बनाए गए हैं, जिनमें भारत के कई मशहूर जैन तीर्थों, पवित्र शिखरों और ऐतिहासिक स्थलों को बेहद सजीव तरीके से दिखाया गया है. हर एक चित्र को ज्यामितीय संतुलन के साथ इतनी बारीकी से उकेरा गया है कि यह सिर्फ धार्मिक आस्था का प्रतीक नहीं, बल्कि उस दौर की उन्नत चित्रकला और स्थापत्य सोच का जीता-जागता दस्तावेज़ भी लगता है. यहां आने वाले पर्यटक और कला प्रेमी अक्सर गुंबद की इस नक्काशी को देखकर ठिठक जाते हैं और इसे अपने कैमरे में कैद किए बिना नहीं रह पाते.

छत और दीवारों पर उकेरा गया इतिहास

मंदिर की छत और ऊपरी दीवारों पर बनी चित्रकारी वास्तुकला और कला के मेल की मिसाल है. इन चित्रों में सिर्फ धार्मिक आस्था नहीं, बल्कि उस दौर के समृद्ध नगर, मज़बूत किले, जैन तीर्थ और धार्मिक स्थल भी बड़ी खूबसूरती से दीवारों पर उतारे गए हैं. इन भित्ति चित्रों में मध्यकालीन भारत की वास्तुकला, उस समय के आने-जाने के साधनों और आम लोगों की ज़िंदगी की झलक साफ नज़र आती है. सबसे दिलचस्प बात यह है कि सदियों पहले बिना किसी रासायनिक मिलावट के, सिर्फ जड़ी-बूटियों और प्राकृतिक रंगों से यह कला तैयार की गई थी, और आज भी यह उतनी ही ताज़ा और आकर्षक दिखती है. यही कारण है कि कला प्रेमियों, इतिहासकारों और शोधकर्ताओं के लिए यह मंदिर किसी जीवंत संग्रहालय जैसा है, जहां हर दीवार इतिहास का एक पन्ना खोलती है.

गर्भगृह में विराजमान भगवान सुमतिनाथ

मंदिर का गर्भगृह बेहद भव्य और कलात्मकता से भरा हुआ है. यहां वेदी पर पांचवें जैन तीर्थंकर भगवान श्री सुमतिनाथ जी की शांत और दिव्य प्रतिमा विराजमान है, जिनके दर्शन मात्र से मन भक्ति से भर जाता है. गर्भगृह के भीतर और उसके आसपास सोने के वर्क जैसी चमकदार सजावट, रंगीन मीनाकारी और पत्थरों पर की गई बारीक नक्काशी श्रद्धालुओं को एक अलग ही आध्यात्मिक अनुभव देती है. इसी शिल्प और दर्शन के लिए हर दिन बड़ी संख्या में स्थानीय और दूर-दराज से श्रद्धालु यहां पहुंचते हैं. मंदिर परिसर का शांत माहौल और वहां बहने वाली सकारात्मक ऊर्जा हर दर्शनार्थी को सुकून का एहसास कराती है.

40 हजार किलो घी से बनी नींव का रहस्य

भांडाशाह जैन मंदिर के फर्श और खंभों पर आज भी कई जगह हल्की चिकनाहट या तैलीय अंश महसूस होता है, और यही बात इस मंदिर को और भी दिलचस्प बना देती है. स्थानीय जनश्रुतियों और मान्यताओं के मुताबिक, यह उसी 40,000 किलोग्राम यानी 40 टन देसी घी का असर माना जाता है, जिसे 15वीं शताब्दी में मंदिर बनाते वक्त नींव को मज़बूत करने के लिए पानी की जगह इस्तेमाल किया गया था. मंदिर प्रबंधन और ट्रस्ट के मुताबिक, साल भर देश-विदेश से आने वाले हजारों पर्यटक और श्रद्धालु खासतौर पर इस अनोखी बात को देखने और महसूस करने के लिए यहां आते हैं. हालांकि इस चिकनाहट की असली वैज्ञानिक वजह अलग शोध का विषय हो सकती है, जैसे पत्थरों की खास पॉलिश, मौसम का असर या रखरखाव में इस्तेमाल होने वाली सामग्री, लेकिन यह पारंपरिक मान्यता मंदिर के इतिहास को और भी रहस्यमयी बना देती है. यही वजह है कि भांडाशाह मंदिर अपनी स्थापत्य कला के साथ-साथ इस 'घी से बनी नींव' वाली कहानी के चलते भी दुनिया भर के लोगों की जिज्ञासा का केंद्र बना रहता है.

महामंडप और सभा मंडप के नक्काशीदार खंभे

मंदिर का महामंडप और सभा मंडप भी अपनी स्थापत्य कला और नक्काशीदार खंभों के लिए देश-विदेश में मशहूर है. यहां संगमरमर और लाल बलुआ पत्थर के खंभों पर की गई बारीक कारीगरी, पारंपरिक राजस्थानी और जैन शैली के अलंकरण और आकर्षक रंगीन चित्रकारी मंदिर की भव्यता में चार चांद लगाती है. कुल मिलाकर भांडाशाह जैन मंदिर सिर्फ एक धार्मिक स्थल भर नहीं, बल्कि कला, इतिहास और आस्था का ऐसा संगम है, जिसे देखने के लिए हर साल देश-विदेश से लोग बीकानेर पहुंचते हैं.

इसका आप पर असर

  • भारत में: इतिहास और स्थापत्य कला में दिलचस्पी रखने वाले पर्यटकों के लिए यह मंदिर घूमने की एक और अनोखी जगह बनता है, जहां धार्मिक आस्था के साथ-साथ करीब 500 साल पुरानी फ्रेस्को कला भी देखी जा सकती है.
  • बीकानेर में: स्थानीय स्तर पर मंदिर हर साल देश-विदेश से आने वाले श्रद्धालुओं और पर्यटकों की भीड़ खींचता है, जिससे बीकानेर में धार्मिक पर्यटन को बढ़ावा मिलता है.

सवाल-जवाब

भांडाशाह जैन मंदिर कहां स्थित है?
भांडाशाह जैन मंदिर राजस्थान के बीकानेर शहर में स्थित है.
मंदिर की चित्रकारी कितनी पुरानी है?
मंदिर की दीवारों, स्तंभों और गुंबदों पर बनी चित्रकारी लगभग 500 साल पुरानी है.
मंदिर की नींव में घी इस्तेमाल होने की मान्यता क्या है?
स्थानीय जनश्रुतियों के अनुसार 15वीं शताब्दी में मंदिर की नींव में पानी की जगह 40,000 किलोग्राम यानी 40 टन देसी घी इस्तेमाल किया गया था, जिसकी वजह से आज भी फर्श और खंभों पर हल्की चिकनाहट महसूस होती है.
मंदिर के गर्भगृह में किसकी प्रतिमा स्थापित है?
गर्भगृह में पांचवें जैन तीर्थंकर भगवान श्री सुमतिनाथ जी की प्रतिमा वेदी पर विराजमान है.
मंदिर की चित्रकारी में किन-किन विषयों को दिखाया गया है?
इनमें जैन धार्मिक कथाएं, तीर्थंकरों के जीवन प्रसंग, प्राचीन समृद्ध नगर, राजदरबारों का वैभव और उस दौर का सामाजिक जीवन दिखाया गया है.
मंदिर की चिकनाहट के पीछे की सही वजह क्या साबित हुई है?
इसकी असली वैज्ञानिक वजह अभी अलग शोध का विषय हो सकती है, जैसे पत्थरों की खास पॉलिश, मौसम का असर या रखरखाव में इस्तेमाल सामग्री, लेकिन घी वाली मान्यता एक पारंपरिक जनश्रुति है.
लक्ष्मी गुप्ता
लेखक के बारे मेंलक्ष्मी गुप्ताअंक ज्योतिषी
विशेषज्ञताभविष्यसूचक अंक ज्योतिष, समग्र उपचार पद्धतियाँ, रिश्ते एवं पारिवारिक ज्योतिष, आध्यात्मिक विकास

एक समर्पित अंक ज्योतिषी, जो अंक ज्योतिष की गणितीय बुनियाद और पारंपरिक ज्योतिषीय पांडुलिपियों के संरक्षण में विशेषज्ञता रखती हैं।

लक्ष्मी पारंपरिक वैदिक ज्योतिष की गहन सटीकता को परामर्श के एक आधुनिक, चिकित्सकीय दृष्टिकोण के साथ जोड़ती हैं। उनका उद्देश्य अंक ज्योतिष को महज़ भविष्यवाणी से आगे बढ़ाकर आत्म-खोज और सचेत निर्णय लेने का एक सशक्त साधन बनाना है। संस्कृत अध्ययन और आधुनिक मनोविज्ञान की पृष्ठभूमि के साथ वे ऐसे परामर्श देती हैं जो सटीक भी हैं और संवेदनशील भी। चाहे आप करियर बदलाव से गुज़र रहे हों, रिश्तों में स्पष्टता चाहते हों या गहरे आध्यात्मिक उद्देश्य की तलाश में हों — लक्ष्मी सितारों की बुद्धिमत्ता से आपका रास्ता रोशन करती हैं।

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