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बिहार के कैमूर में 600 फीट ऊंचे पहाड़ पर स्थित मुंडेश्वरी मंदिर में बिना खून बहाए चढ़ाई जाती है पशु बलिधर्म
20 अग॰ 2026, 8:03 am (42 दिन पहले)· 2

बिहार के कैमूर में 600 फीट ऊंचे पहाड़ पर स्थित मुंडेश्वरी मंदिर में बिना खून बहाए चढ़ाई जाती है पशु बलि

बिहार के कैमूर जिले में स्थित मुंडेश्वरी मंदिर को 2000 साल पुराना माना जाता है, जहां बिना रुकावट सदियों से पूजा होती आ रही है। यहां 108 ईस्वी में बने इस अष्टकोणीय मंदिर में अनोखी रक्तहीन पशु बलि की परंपरा निभाई जाती है।

बिहार के कैमूर जिले में 600 फीट की ऊंचाई पर एक ऐसा ऐतिहासिक और धार्मिक स्थल मौजूद है, जहां पहुंचकर श्रद्धालु खुद को 21वीं सदी से सदियों पीछे महसूस करते हैं। यह स्थान है मुंडेश्वरी मंदिर, जिसे दुनिया का सबसे पुराना सक्रिय हिंदू मंदिर माना जाता है। सरकारी रिपोर्ट के अनुसार इस मंदिर का निर्माण 108 ईस्वी में हुआ था। लगभग 2000 वर्षों का लंबा इतिहास होने के बावजूद इस मंदिर के कपाट आज तक एक भी दिन के लिए बंद नहीं हुए हैं। सदियों से बिना किसी रुकावट के यहां लगातार पूजा-अर्चना की परंपरा चली आ रही है।

सैकड़ों सालों की अटूट परंपरा और प्राकृतिक वातावरण

मंदिर परिसर में कदम रखते ही श्रद्धालुओं को एक विशेष आत्मिक शांति का अहसास होता है। चारों तरफ दूर-दूर तक फैली हरियाली इस जगह को न केवल मनोरम बनाती है, बल्कि भक्तों को प्रकृति और ईश्वर के और अधिक निकट होने की अनुभूति भी कराती है। 1790 में यह मंदिर मलबे के नीचे दबा हुआ पाया गया था। हैरानी की बात यह है कि उस विकट स्थिति में भी मंदिर में पूजा का दौर कभी थमा नहीं। बाद में 20वीं सदी में इस स्थल को मलबे से बाहर निकालकर विधिवत संरक्षित किया गया।

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अष्टकोणीय वास्तुकला और चतुर्मुखी शिवलिंग

मुंडेश्वरी मंदिर की स्थापत्य कला अपने आप में बेहद दुर्लभ और अद्भुत है। यह मंदिर आठ कोणों वाले अनोखे आकार यानी अष्टकोणीय संरचना में पत्थरों से बनाया गया है। भारत में नागर शैली की मंदिर वास्तुकला के प्राचीनतम उदाहरणों में इस मंदिर की गिनती की जाती है। मंदिर के चारों दिशाओं में खुलने वाले चार मुख्य प्रवेश द्वार हैं। गर्भगृह में मां मुंडेश्वरी (जो देवी दुर्गा का ही एक स्वरूप हैं) और भगवान शिव दोनों की पूजा की जाती है। इसके साथ ही यहां स्थापित विशेष चतुर्मुखी शिवलिंग मंदिर को एक विशिष्ट धार्मिक पहचान प्रदान करता है।

रक्तहीन पशु बलि की अनोखी प्रथा

इस ऐतिहासिक मंदिर की सबसे अनोखी बात यहां की बलि परंपरा है। सामान्यतः बलि प्रथा में पशुओं का जीवन लिया जाता है, लेकिन मुंडेश्वरी मंदिर में बिना खून बहाए बलि चढ़ाई जाती है। भक्त यहां अपनी मन्नत पूरी होने पर पशुओं को लाते हैं। पूजा और धार्मिक अनुष्ठानों के पूरा होने के बाद पशु को नुकसान पहुंचाए बिना भगवान के नाम पर जीवित ही छोड़ दिया जाता है। इस अहिंसक और अनोखी परंपरा को स्थानीय स्तर पर 'रक्तहीन बलि' कहा जाता है।

मुंडेश्वरी मंदिर कैसे पहुंचे?

यदि आप दिल्ली या अन्य दूरदराज के क्षेत्रों से दर्शन के लिए आने की योजना बना रहे हैं, तो कम से कम 4 से 5 दिनों का समय निकालकर यात्रा करें। रेल मार्ग से आने वाले श्रद्धालुओं के लिए सबसे निकटतम रेलवे स्टेशन भभुआ रोड स्टेशन है, जहां से मंदिर की दूरी केवल 23 किलोमीटर रह जाती है। स्टेशन से स्थानीय वाहनों की मदद से मंदिर आसानी से पहुंचा जा सकता है। वहीं, हवाई मार्ग से यात्रा करने वाले श्रद्धालु वाराणसी स्थित लाल बहादुर शास्त्री इंटरनेशनल एयरपोर्ट पर उतर सकते हैं और वहां से सड़क मार्ग के जरिए मंदिर तक पहुंच सकते हैं।

सवाल-जवाब

मुंडेश्वरी मंदिर कहां स्थित है और यह कितना पुराना है?
मुंडेश्वरी मंदिर बिहार के कैमूर जिले में 600 फीट ऊंचे पहाड़ पर स्थित है। सरकारी रिपोर्ट के अनुसार इसका निर्माण 108 ईस्वी में हुआ था और इसे लगभग 2000 साल पुराना माना जाता है।
मुंडेश्वरी मंदिर की वास्तुकला की क्या खासियत है?
यह मंदिर पत्थरों से बना अष्टकोणीय (आठ कोणों वाला) मंदिर है, जो बिहार में नागर शैली का सबसे पुराना उदाहरण माना जाता है। इसके चारों दिशाओं में चार प्रवेश द्वार हैं।
इस मंदिर में किन देवी-देवताओं की पूजा की जाती है?
मंदिर में मां मुंडेश्वरी (जो देवी दुर्गा का स्वरूप हैं) और भगवान शिव की पूजा की जाती है। यहां एक विशेष चतुर्मुखी शिवलिंग भी स्थापित है।
मुंडेश्वरी मंदिर की रक्तहीन बलि परंपरा क्या है?
इस परंपरा के तहत लोग मन्नत पूरी होने पर पशु लाते हैं और पूजा के बाद पशु को नुकसान पहुंचाए बिना भगवान के नाम पर जीवित छोड़ दिया जाता है।
मुंडेश्वरी मंदिर तक पहुंचने के लिए सबसे नजदीकी रेलवे स्टेशन और एयरपोर्ट कौन सा है?
सबसे नजदीकी रेलवे स्टेशन भभुआ रोड है जो मंदिर से 23 किलोमीटर दूर है। सबसे नजदीकी हवाई अड्डा वाराणसी का लाल बहादुर शास्त्री इंटरनेशनल एयरपोर्ट है।
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