देशभर में कृष्ण जन्माष्टमी का पर्व अत्यंत हर्षोल्लास के साथ मनाया जा रहा है और चारों तरफ उत्सव का माहौल बना हुआ है। हर साल भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को यह पावन त्योहार आता है। जन्माष्टमी आते ही भगवान श्रीकृष्ण के बचपन की तमाम यादें और उनकी बाल लीलाएं ताजा हो जाती हैं। कान्हा की नटखट शरारतें, उनका गोपियों के घरों से माखन चुराना और अपने मित्रों के साथ मिलकर ऊंची मटकी फोड़ना आज भी बहुत स्नेह के साथ याद किया जाता है। इसी बाल रूप और लीला से जुड़ी है दही हांडी की प्रसिद्ध परंपरा, जिसे जन्माष्टमी के ठीक अगले दिन बहुत धूमधाम से मनाया जाता है। आइए जानते हैं कि इस उत्सव को अगले दिन ही मनाने के पीछे क्या कारण और मान्यता है।
भगवान श्रीकृष्ण की बाल लीला से जुड़ी परंपरा
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार भगवान श्रीकृष्ण को माखन और दही से विशेष प्रेम था। अपने बचपन के दिनों में वे अपने सखाओं के साथ मिलकर गोकुल की तंग गलियों में भ्रमण करते थे। जब भी उन्हें किसी घर में दूध, मक्खन या दही से भरी मटकी नजर आती, वे चतुराई से उसे चुरा लेते थे। उनकी इन अनोखी शरारतों से वहां की गोपियां काफी परेशान रहती थीं। कान्हा की इस आदत से तंग आकर गोपियों ने माखन को सुरक्षित रखने के लिए मटकी को जमीन से काफी ऊंचाई पर टांगना शुरू कर दिया ताकि वह कृष्ण की पहुंच से दूर रहे। लेकिन नटखट कान्हा भी हार मानने वालों में से नहीं थे। वे अपने सभी दोस्तों को इकट्ठा करते और सब मिलकर एक-दूसरे के कंधे पर चढ़कर इंसानी पिरामिड तैयार करते थे। इस मानव श्रृंखला में जो साथी सबसे ऊपर पहुंचता, वही मटकी को फोड़ देता था और फिर सभी मित्र मिलकर उस माखन का आनंद लेते थे।
उत्सव का प्रतीकात्मक स्वरूप और आयोजन
आज के समय में दही हांडी का यह पर्व उसी प्राचीन बाल लीला का प्रतीकात्मक रूप है। एक बड़ी मटकी में दही, मक्खन और अन्य सामग्रियां भरकर उसे रस्सियों की सहायता से हवा में काफी ऊंचाई पर लटका दिया जाता है। इसके पश्चात युवाओं की टोलियां, जिन्हें मुख्य रूप से गोविंदा कहा जाता है, इस मटकी को तोड़ने के लिए जमीन पर मानव पिरामिड का निर्माण करती हैं। पिरामिड के सबसे शीर्ष पर खड़ा गोविंदा अपने साथियों के सहयोग से मटकी तक पहुंचता है और उसे बलपूर्वक तोड़ देता है। मटकी के फूटते ही उसके अंदर की सामग्री नीचे बिखर जाती है और आसपास का पूरा वातावरण धार्मिक जयकारों, पारंपरिक ढोल-नगाड़ों और भक्ति भजनों की गूंज से सराबोर हो जाता है।
महाराष्ट्र और देश के अन्य हिस्सों में उल्लास
वैसे तो यह पर्व कई जगहों पर मनाया जाता है, लेकिन महाराष्ट्र राज्य में दही हांडी का यह उत्सव अपनी भव्यता और अनूठे अंदाज के लिए विशेष रूप से प्रसिद्ध है। इस अवसर पर कई जगहों पर बहुत अधिक ऊंचाई पर मटकियां टांगी जाती हैं। इन्हें भेदने और तोड़ने के लिए विभिन्न इलाकों से प्रशिक्षित टोलियां आती हैं और सफल रहने वाली टीमों को भारी इनाम से सम्मानित किया जाता है। हालांकि समय के साथ अब देश के अन्य कई राज्यों और शहरों में भी दही हांडी की इस धूम को बड़े पैमाने पर देखा जाने लगा है।
सामूहिक प्रयास और एकता का संदेश
दही हांडी का यह पर्व केवल मनोरंजन या उल्लास का साधन नहीं है, बल्कि यह आपसी एकता, आपसी सहयोग और सामूहिक प्रयास की भावना का एक बड़ा प्रतीक माना जाता है। मानव पिरामिड को खड़ा करने में नीचे खड़े हर एक व्यक्ति का योगदान और संतुलन उतना ही महत्वपूर्ण होता है जितना कि सबसे ऊपर चढ़ने वाले का, जो मिलकर किसी भी बड़े लक्ष्य को हासिल करने का गहरा संदेश देता है। ऐसी मान्यता है कि जन्माष्टमी के इस विशेष अवसर पर सच्ची श्रद्धा और उल्लास के साथ दही हांडी उत्सव में शामिल होने से भगवान श्रीकृष्ण का आशीर्वाद प्राप्त होता है और परिवार में हमेशा सुख-शांति तथा समृद्धि बनी रहती है।


















