भारतीय परंपराओं में प्रथम पूज्य गजानन को बुद्धि, सौभाग्य और सभी बाधाओं को दूर करने वाले देवता के रूप में पूजा जाता है। भाद्रपद माह के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि पर यह पावन उत्सव पूरे देश में गहरी श्रद्धा के साथ मनाया जाता है, और आगामी 14 सितंबर को सोमवार के दिन यह शुभ अवसर पड़ रहा है। देश के दक्षिणी राज्यों में इस त्योहार का स्वरूप केवल बप्पा के आगमन तक सीमित नहीं रहता, बल्कि यह मां गौरी और उनके पुत्र के पावन बंधन तथा प्रकृति के साथ जुड़ाव का एक बड़ा उत्सव माना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इसी विशेष तिथि पर भगवान गणेश का प्राकट्य माता पार्वती और भगवान शिव के घर हुआ था। विवेक और मंगल के देवता माने जाने वाले गणेश जी की वंदना किसी भी नए कार्य की शुरुआत से पहले अनिवार्य मानी जाती है। आइए विस्तार से जानते हैं कि दक्षिण भारत के विभिन्न हिस्सों में गणेशोत्सव किस प्रकार मनाया जाता है।
गौरी हब्बा से होती है उत्सव की शुरुआत
विशेष रूप से कर्नाटक और आंध्र प्रदेश जैसे राज्यों में गणेश चतुर्थी के ठीक एक दिन पहले गौरी हब्बा का अनुष्ठान किया जाता है, जो माता पार्वती को समर्पित होता है। इस खास दिन पर सुहागिन महिलाएं अपने परिवार की सुख-समृद्धि और सुहाग की लंबी उम्र की कामना करती हैं। वे हल्दी का उपयोग करके माता गौरी की आकृति या प्रतिमा तैयार करती हैं और उसकी विधिवत उपासना करती हैं। इस आयोजन के ठीक अगले दिन बप्पा का घरों में स्वागत किया जाता है। पौराणिक कथाओं और ग्रंथों में देवी गौरी को आदि शक्ति महामाया का बेहद प्रभावशाली स्वरूप बताया गया है। ऐसी मान्यता है कि भाद्रपद शुक्ल तृतीया के दिन देवी का आगमन होता है और उसके अगले दिन उनके पुत्र गजानन का स्वागत किया जाता है।
हल्दी से तैयार की जाती है अरिशिनादगौरी प्रतिमा
उत्तरी भारत के कुछ हिस्सों में इस खास दिन को हरतालिका के रूप में भी मनाया जाता है। इस अवसर पर विवाहित महिलाएं मुख्य रूप से नए पारंपरिक परिधान पहनकर देवी की आराधना करती हैं। इस परंपरा के तहत महिलाएं हल्दी से देवी गौरी की एक विशेष प्रतिमा बनाती हैं जिसे अरिशिनादगौरी के नाम से पुकारा जाता है। इस पवित्र मूर्ति को आम के पत्तों और फूलों से खूबसूरती से सजाया जाता है ताकि उत्सव का माहौल और अधिक प्रगाढ़ हो सके।
पर्यावरण अनुकूल प्रतिमाएं और विशेष पारंपरिक पकवान
दक्षिण भारत के तमाम घरों और मंदिरों में गणेश चतुर्थी के अवसर पर केवल पर्यावरण के अनुकूल यानी मिट्टी से बनी गणेश मूर्तियां ही स्थापित की जाती हैं। वैदिक मंत्रों के उच्चारण के साथ प्राण-प्रतिष्ठा की जाती है और षोडशोपचार विधि से पूजा संपन्न होती है। भगवान गणेश को मोदक अत्यंत प्रिय हैं, लेकिन इसके अलावा दक्षिण भारतीय राज्यों में कई खास पारंपरिक व्यंजन भी तैयार किए जाते हैं। तमिलनाडु में चावल के आटे, नारियल और गुड़ से तैयार किए जाने वाले कोझुकट्टई का विशेष धार्मिक महत्व माना जाता है। इसके अतिरिक्त मोदक, पप्पडम, वड़ा और स्वादिष्ट पायसम का भोग भी बप्पा को अर्पित किया जाता है।
सार्वजनिक पंडाल और पारंपरिक विसर्जन की परंपरा
महाराष्ट्र की तरह अब दक्षिण भारत में भी बड़े पैमाने पर सार्वजनिक पंडाल सजाए जाने का चलन तेजी से बढ़ा है, हालांकि कई जगहों पर आज भी पारिवारिक रूप से एक, तीन या पांच दिनों तक विधिवत पूजा करने की परंपरा है। इसके बाद स्थानीय जल स्रोतों जैसे कि नदियों या समुद्र में गणेश प्रतिमा का विसर्जन कर दिया जाता है। तमिलनाडु और केरल के ऐतिहासिक विनायक मंदिरों में इस दौरान विशेष अनुष्ठान होते हैं और उत्सव का माहौल देखने लायक होता है।



















