भिंडी की खेती देश के अलग-अलग हिस्सों में कई मौसमों के दौरान की जाती है। आम तौर पर गर्मी और बरसात के समय इसकी बड़े पैमाने पर पैदावार ली जाती है। सितंबर के महीने में भी स्थानीय जलवायु और मौसम की स्थिति को परखकर किसान भाई भिंडी की खेती करने का मन बना सकते हैं। हालांकि, जमीन में बीज डालने से पहले अपने इलाके के तापमान और मौसम के मिजाज को समझना और ध्यान में रखना बेहद जरूरी हो जाता है।
जलवायु और खेत की तैयारी
भिंडी के पौधों को मुख्य रूप से गर्म और नमीयुक्त आबोहवा बहुत रास आती है। इसके खेतों को पर्याप्त मात्रा में धूप मिलने से पौधों का विकास और बढ़वार बेहद शानदार तरीके से होती है। अत्यधिक पानी जमा होने वाली भूमि भिंडी की फसल के लिए बेहद नुकसानदेह साबित हो सकती है, इसलिए खेत के अंदर जल निकासी का पुख्ता इंतजाम होना चाहिए। क्योंकि जरा सा भी जलजमाव होने पर फसल में कई तरह की दिक्कतें पैदा हो सकती हैं। श्री मुरली मनोहर टाउन स्नातकोत्तर महाविद्यालय बलिया के कृषि एक्सपर्ट प्रो. अशोक कुमार सिंह के अनुसार, भरपूर पैदावार हासिल करने के लिए खेत की मिट्टी भुरभुरी और पूरी तरह खरपतवार से मुक्त होनी चाहिए। सबसे पहले खेत की गहरी जुताई करके मिट्टी को भली-भांति तैयार कर लेना चाहिए। आखिरी जुताई के वक्त अच्छी तरह सड़ी हुई गोबर की खाद मिलाने से जमीन की उपजाऊ शक्ति जरूरत के मुताबिक काफी बढ़ जाती है।
बुवाई का सही तरीका और उन्नत किस्में
भिंडी की खेती करते वक्त एक बात का खास ख्याल रखना पड़ता है कि बीजों की बुवाई हमेशा कतारों में की जाए। कतारबद्ध तरीके से बीज लगाने पर पौधों की देखभाल करने, अवांछित खरपतवारों को नियंत्रित करने और फलियों की तुड़ाई करने में काफी आसानी हो जाती है। पौधों के बीच उचित दूरी बनाए रखने से फसल के भीतर हवा और धूप का संचार सुचारू रहता है जिससे पौधे एकदम स्वस्थ रहते हैं। इस खेती में सही किस्म का चयन करना सफलता की कुंजी है। किसान भाई अपने क्षेत्र की भौगोलिक स्थिति और बाजार की मांग को देखकर उन्नत एवं रोग प्रतिरोधक किस्मों का चुनाव कर सकते हैं। इसके अलावा गुलाबी भिंडी भी बाजार में काफी आकर्षक दिखती है। स्थानीय कृषि विभाग या कृषि जानकारों की सलाह लेकर प्रमाणित बीजों का इस्तेमाल करना हमेशा सुरक्षित रहता है। अच्छी क्वालिटी के बीज पौधों के विकास को गति देते हैं और बंपर पैदावार में मदद करते हैं। बाजार में इस समय अर्का अनामिका, परभणी क्रांति, पूसा सावनी, एडवांटा राधिका, काशी लीला और काशी विभूति जैसी कई मशहूर उन्नत किस्में आसानी से उपलब्ध हैं।
सिंचाई, सुरक्षा और तुड़ाई के नियम
हरी भिंडी की विभिन्न किस्मों के साथ-साथ एक्सपर्ट की राय लेकर गुलाबी किस्म की खेती भी की जा सकती है। भिंडी के पौधों को जरूरत के हिसाब से ही पानी देना चाहिए। खेत की मिट्टी में नमी बरकरार रहनी चाहिए, लेकिन आवश्यकता से अधिक पानी भरने से पौधों की जड़ें सड़ सकती हैं। बरसात के मौसम में कुदरती बारिश के कारण सिंचाई की जरूरत कम पड़ती है। यदि किसान कृषि विशेषज्ञों के दिशा-निर्देशों के मुताबिक खेती करते हैं, तो उत्पादन दोगुना होने की संभावना काफी बढ़ जाती है। फसल के दौरान समय-समय पर निराई-गुड़ाई करके खरपतवार को बाहर निकालते रहना अनिवार्य है, क्योंकि खरपतवार मिट्टी की नमी और पोषक तत्वों को सोख लेते हैं जिससे मुख्य पौधों की ग्रोथ रुक सकती है। थोड़ी सी सूझबूझ और सावधानी अपनाकर किसान इस खेती से भारी मुनाफा कमा सकते हैं। इसके अलावा भिंडी की फसल में कई बार कीटों और रोगों का प्रकोप भी देखने को मिलता है। यदि पत्तियों के पीले पड़ने, उनके मुड़ने या पौधों का विकास बाधित होने के लक्षण दिखें, तो तुरंत कृषि विशेषज्ञ से संपर्क करना चाहिए। खेतों की नियमित देखरेख करने से समस्याओं को शुरुआती दौर में ही काबू करने में मदद मिलती है। भिंडी की फलियों को हमेशा कोमल अवस्था में ही तोड़ लेना चाहिए। समय पर तुड़ाई करने से नई फलियों का तेजी से विकास होता है और कुल उत्पादन में भी इजाफा होता है।


















