देशभर के तमाम घरों और मंदिरों में आज भगवान श्रीकृष्ण के जन्मोत्सव का पर्व बहुत धूमधाम के साथ मनाया जा रहा है। सनातन परंपरा में इस त्योहार का विशेष स्थान है क्योंकि इसी दिन रोहिणी नक्षत्र और मध्यरात्रि के संयोग में भगवान का अवतार हुआ था। श्रद्धालु इस अवसर पर पूरे दिन उपवास रखते हैं और रात बारह बजे जन्मोत्सव संपन्न होने के बाद ही अपना व्रत खोलते हैं। उत्सव के इस माहौल में चारों तरफ भक्ति और उल्लास का वातावरण देखा जा सकता है।
जन्माष्टमी का व्रत और पूजा की परंपरा
इस पावन अवसर पर सुबह जल्दी उठकर स्नान करने का विधान है जिसके बाद भक्त ईश्वर का स्मरण करते हुए व्रत का संकल्प लेते हैं। कई लोग बिना जल के कठिन उपवास का पालन करते हैं जबकि अन्य लोग फलाहार के सहारे पूरा दिन बिताते हैं। पूरा दिन भगवान के भजनों, कीर्तन और उनके पवित्र मंत्रों के जाप में बीतता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार यह व्रत मन को गहरी शांति देता है और परिवार में सुख-शांति तथा सकारात्मकता का संचार करता है। इस दिन बाल गोपाल को सुंदर वस्त्र पहनाने और उन्हें पालने में झुलाने की अनूठी परंपरा है।
तिथि और नक्षत्र का समय
पंचांग के अनुसार अष्टमी तिथि तीन से चार सितंबर की मध्य रात्रि दो बजकर तीस मिनट से प्रारंभ होकर पांच सितंबर की रात बारह बजकर तीस मिनट तक रहेगी। इसी वजह से आज यानी चार सितंबर दिन शुक्रवार को यह पर्व मनाया जा रहा है। इसके साथ ही इस दिन रोहिणी नक्षत्र रात ग्यारह बजकर चार मिनट तक रहेगा। इन खास योगों के बीच श्रद्धालु पूरी विधि-विधान के साथ अपने आराध्य की उपासना कर सकते हैं।
दुर्लभ योगों का संयोग
इस बार का जन्मोत्सव बेहद खास माना जा रहा है क्योंकि आज कई अत्यंत शुभ और दुर्लभ ज्योतिषीय योग एक साथ बन रहे हैं। गणना के मुताबिक इस दिन श्रीकृष्ण जयंती योग और हर्षण योग के साथ-साथ देवगुरु बृहस्पति के अपनी उच्च राशि में होने से हंसराज योग का निर्माण हो रहा है। इसके अलावा शुक्र के उच्च राशि में विराजमान होने से मालव्य राजयोग का भी लाभ मिल रहा है। सिंह राशि में सूर्य और बुध की युति से बुधादित्य योग तथा नवपंचम राजयोग भी बन रहे हैं। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार इन शुभ योगों के प्रभाव से पूजा करने वाले जातकों के सभी प्रकार के दोष नष्ट होते हैं और ग्रहों के बुरे असर में कमी आती है।
पूजन की पूरी प्रक्रिया
व्रत रखने वालों को सुबह स्नान के बाद स्वच्छ वस्त्र धारण करने चाहिए और अपने घर तथा पूजा स्थल की भली-भांति सफाई करनी चाहिए। भगवान श्रीकृष्ण की मूर्ति या लड्डू गोपाल को एक पवित्र चौकी पर लाल या पीले रंग के वस्त्र बिछाकर स्थापित करना चाहिए। इसके बाद दीपक प्रज्वलित करके अपनी सामर्थ्य और श्रद्धा के अनुसार व्रत का संकल्प लिया जाता है। पूरे दिन पवित्र मंत्रों का जाप और कथा सुनने का विधान है। खान-पान के मामले में सात्विक नियमों का पालन करना होता है और अपनी सेहत के अनुसार ही निर्जला या फलाहार का विकल्प चुनना चाहिए।
मध्याह्न और मध्यरात्रि के विशेष अनुष्ठान
रात के बारह बजे भगवान के प्रकट होने के समय पूजा का विशेष महत्व होता है। इस खास पल में लड्डू गोपाल को पहले पंचामृत से स्नान कराया जाता है और उसके बाद शुद्ध जल से उनका अभिषेक किया जाता है। इसके पश्चात उन्हें नए वस्त्र पहनाए जाते हैं और मुकुट, बांसुरी, मोरपंख व अन्य आभूषणों से उनका भव्य श्रृंगार किया जाता है। भगवान को चंदन, अक्षत, पुष्प और ताजे तुलसी दल अर्पित किए जाते हैं। इसके बाद माखन-मिश्री, पंजीरी, फल और मिठाइयों का भोग लगाकर शंख तथा घंटियों की गूंज के बीच आरती की जाती है।
पूजा के दौरान किन बातों का रखें ध्यान
इस पवित्र दिन पर साफ-सफाई और सात्विकता का बहुत कड़ाई से पालन किया जाना चाहिए। ईश्वर को अर्पित की जाने वाली सभी सामग्रियां बिल्कुल ताजी और स्वच्छ होनी अनिवार्य हैं। प्रसाद और भोग में तुलसी के पत्तों को अवश्य शामिल किया जाता है। पूजा के समय मन को पूरी तरह शांत रखना चाहिए और किसी भी तरह के बाद-विवाद या नकारात्मक विचारों से दूर रहना चाहिए।
शुभ चौघड़िया का समय
लाभ चौघड़िया का समय सुबह सात बजकर पैंतीस मिनट से नौ बजकर दस मिनट तक रहेगा। अमृत चौघड़िया सुबह नौ बजकर दस मिनट से दस बजकर पैंतीस मिनट तक निर्धारित है। शुभ चौघड़िया दोपहर बारह बजकर बीस मिनट से एक बजकर पचपन मिनट तक रहेगी। इसके अलावा मुख्य निशीथ काल का समय रात ग्यारह बजकर संतावन मिनट से बारह बजकर तितालीस मिनट तक रहेगा जिसकी कुल अवधि पैंतालीस मिनट की है।
पवित्र मंत्र और स्तुति
उपासना के दौरान हरे कृष्ण महामंत्र का जाप करना बहुत फलदायी माना जाता है। इसके अलावा कृष्णाय वासुदेवाय हरये परमात्मने और देवकीनन्दनाय विद्महे मंत्रों का स्मरण किया जाता है। मूल मंत्र या बीज मंत्र के रूप में ॐ क्लीं कृष्णाय नमः या ॐ कृष्णाय नमः का जाप करना भी अत्यंत लाभकारी माना गया है।
















