सनातन संस्कृति में श्री कृष्ण जन्माष्टमी का पावन उत्सव बेहद हर्षोल्लास और भव्यता के साथ मनाया जाता है। इस खास अवसर पर देशभर के तमाम श्रद्धालु व्रत का पालन करते हैं और अपने आराध्य बाल गोपाल का अत्यंत सुंदर श्रृंगार करते हैं। इसके पश्चात निर्धारित शुभ मुहूर्त में कान्हा की पूरी विधि विधान के साथ आराधना की जाती है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार भगवान श्रीकृष्ण की पूजा के लिए रात्रि के ठीक 12 बजे का समय अत्यंत उत्तम और फलदायी माना गया है। ऐसा विश्वास है कि इसी ब्रह्म बेला में भगवान विष्णु ने अपने आठवें स्वरूप में श्रीकृष्ण के रूप में इस पृथ्वी पर अवतार लिया था। जो भी निष्ठावान भक्त इस पवित्र दिन पर उपवास रखता है, उसकी सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं। इस व्रत को लेकर परंपराएं अलग-अलग हैं क्योंकि कुछ लोग रात के बारह बजे तक ही उपवास रखते हैं, जबकि कई अन्य श्रद्धालु अगले दिन की सुबह तक इस व्रत का अनुशासन निभाते हैं। आइए विस्तार से जानते हैं कि इस वर्ष यह व्रत किस तारीख को पड़ रहा है और इसकी पूजा-पारण की संपूर्ण विधि क्या है।
साल 2026 में कब है जन्माष्टमी का व्रत
पंचांग की गणना के अनुसार इस वर्ष जन्माष्टमी का उपवास 4 सितंबर 2026 और शुक्रवार के दिन रखा जाएगा। हिन्दू पंचांग और ज्योतिषीय गणना के मुताबिक यह पावन पर्व भगवान श्रीकृष्ण का 5253वां जन्मोत्सव होगा। इस दिन कान्हा के जन्मोत्सव की पूजा का विशेष शुभ मुहूर्त रात 11:57 बजे से लेकर 12:43 बजे तक निर्धारित किया गया है, जिसके दौरान भक्त अपने आराध्य की विशेष पूजा-अर्चना कर सकते हैं।
जन्माष्टमी व्रत के पारण की तिथि और समय
शास्त्रों के जानकारों और धार्मिक ग्रंथों के अनुसार जन्माष्टमी के इस विशेष व्रत का पारण हमेशा अगले दिन सूर्योदय के उपरांत ही किया जाना चाहिए। यदि आप भी अगले दिन ही अपना उपवास खोलना पसंद करते हैं, तो आप 5 सितंबर की सुबह 06:01 बजे के पश्चात अपना व्रत समाप्त कर सकते हैं। हालांकि जो लोग जन्माष्टमी की रात्रि को ही बाल गोपाल के जन्म के बाद व्रत का समापन करना चाहते हैं, वे रात्रि 12:43 बजे के बाद इस उपवास का पारण कर सकते हैं।
जन्माष्टमी की तिथि और नक्षत्र का सटीक समय
- अष्टमी तिथि का आरंभ - 04 सितंबर 2026 को सुबह 02:25 बजे
- अष्टमी तिथि का समापन - 05 सितंबर 2026 को रात 12:13 बजे
- रोहिणी नक्षत्र का आरंभ - 04 सितंबर 2026 को सुबह 12:29 बजे
- रोहिणी नक्षत्र का समापन - 04 सितंबर 2026 को रात 11:04 बजे
- पूजा का मुख्य शुभ मुहूर्त - रात 11:57 बजे से 12:43 बजे तक
- पारण का समय (अगले दिन) - 05 सितंबर की सुबह 06:01 बजे के बाद
कृष्ण जन्माष्टमी व्रत के प्रमुख नियम और पूजा की विधि
- जन्माष्टमी का यह पवित्र उपवास आमतौर पर सूर्योदय के साथ ही आरंभ हो जाता है।
- इस पूरे व्रत के दौरान अन्न का सेवन पूरी तरह वर्जित रहता है, हालांकि श्रद्धालु फलाहारी यानी व्रत के अनुकूल खाद्य पदार्थों का सेवन कर सकते हैं।
- कई भक्त अपनी श्रद्धा के अनुसार इस उपवास को बिना जल के यानी निर्जला रूप में भी रखते हैं।
- इसकी शुरुआत सुबह जल्दी उठकर स्नान करने के पश्चात व्रत का संकल्प लेने से होती है।
- संकल्प के बाद श्रद्धालु पूरे दिन रात्रि की भव्य पूजा की तैयारियों में तल्लीन हो जाते हैं।
- इस पावन दिन पर बाल गोपाल की मूर्ति या स्वरूप को अलंकृत करना बहुत अधिक शुभ फलदायी माना जाता है।
- भक्तगण अपने घर के मुख्य मंदिर में अथवा किसी अन्य स्वच्छ व पवित्र स्थान पर बाल गोपाल की प्रतिमा या चित्र को स्थापित करते हैं।
- इसके बाद उन्हें सुंदर झुले, पालने, बांसुरी, मोरपंख और रंग-बिरंगे फूलों से अत्यंत प्रेमपूर्वक सजाया जाता है।
- रात्रि के समय बाल गोपाल को मुख्य रूप से माखन-मिश्री, धनिये की पंजीरी और मखाने की खीर का विशेष भोग अर्पित करना अत्यंत उत्तम माना गया है।
- रात के समय सभी श्रद्धालु भगवान की मूर्ति को पंचामृत से स्नान कराते हैं।
- स्नान की प्रक्रिया पूरी होने के बाद भगवान को नए और भव्य वस्त्र पहनाए जाते हैं तथा उनकी पसंद के व्यंजनों का भोग लगाया जाता है।
- अंत में भगवान की पूरी श्रद्धा के साथ आरती की जाती है और इसके तुरंत बाद कई श्रद्धालु अपना उपवास खोल लेते हैं।



















