16वीं शताब्दी के भक्ति आंदोलन के दौरान मीराबाई और गोस्वामी तुलसीदास का स्थान सर्वोच्च कवियों और संतों में माना जाता है। जहां तुलसीदास ने अपनी अमर रचना रामचरितमानस के माध्यम से मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान राम की महिमा को जन-जन तक पहुंचाया, वहीं मीराबाई ने अपने सुरीले पदों में श्रीकृष्ण के प्रति निष्काम प्रेम, विरह की वेदना और पूर्ण समर्पण को अभिव्यक्ति दी। यद्यपि दोनों संतों के आराध्य अलग थे, लेकिन भक्ति आंदोलन के इतिहास में एक ऐसा ऐतिहासिक प्रसंग दर्ज है जब सांसारिक बाधाओं से घिरी मीराबाई ने आध्यात्मिक मार्गदर्शन के लिए तुलसीदास का द्वार खटखटाया था।
पारिवारिक बाधाओं के बीच मार्गदर्शन की तलाश
राजस्थान के नागौर और मेवाड़ क्षेत्र से जुड़े इस प्रसंग के अनुसार, जब मीराबाई अपने पारिवारिक और सामाजिक माहौल में कृष्ण भक्ति के मार्ग पर निरंतर रुकावटों का सामना कर रही थीं, तब उन्होंने एक महत्वपूर्ण निर्णय लिया। भक्ति की राह पर आगे बढ़ने और दीक्षा प्राप्त करने के संबंध में सलाह लेने के लिए उन्होंने गोस्वामी तुलसीदास को एक चिट्ठी लिखी। इस पत्र को मेवाड़ से सुखपाल नाम के एक विप्र यानी ब्राह्मण के हाथों गोस्वामी तुलसीदास तक पहुंचाया गया था। मीराबाई यह स्पष्ट रूप से जानना चाहती थीं कि जब अपने ही परिजन और संबंधी प्रभु भक्ति के पवित्र मार्ग में रोड़ा बनने लगें, तो एक सच्चे भक्त को क्या कदम उठाना चाहिए।
मूल गोसाईं चरित में दर्ज है पत्राचार का प्रमाण
इस ऐतिहासिक और आध्यात्मिक पत्राचार का स्पष्ट विवरण महात्मा बेनी माधव दास द्वारा रचित प्रसिद्ध ग्रंथ मूल गोसाईं चरित में मिलता है। दोहों के रूप में लिखे गए इस ग्रंथ की रचना संवत् 1620 यानी लगभग 1563 ईस्वी के आसपास मानी जाती है। इसमें उल्लेख है कि जब मेवाड़ के विप्र सुखपाल मीराबाई की पत्रिका लेकर तुलसीदास के पास पहुंचे, तो उन्होंने अत्यंत ध्यानपूर्वक उस पत्र को पढ़ा। पत्र की पंक्तियों में मीराबाई का दर्द और ईश्वर के प्रति अगाध निष्ठा देखकर तुलसीदास ने तुरंत उसका उत्तर तैयार किया और सुखपाल के हाथों वापस भिजवा दिया।
तुलसीदास का कालजयी संदेश और विनय पत्रिका का पद
तुलसीदास जी ने मीराबाई के पत्र का उत्तर साधारण गद्य में देने के बजाय गीत और काव्य के रूप में भेजा। राग सोरठ में रचित और बाद में विनय पत्रिका में शामिल किए गए इस प्रसिद्ध पद के जरिए उन्होंने भक्ति का सर्वोच्च सिद्धांत प्रतिपादित किया। उन्होंने समझाया कि इस संसार में केवल वही रिश्ता सच्चा और कल्याणकारी है जो मनुष्य को ईश्वर की भक्ति की ओर ले जाता है। यदि कोई व्यक्ति हमारा कितना भी प्रिय, निकटतम या पूजनीय क्यों न हो, लेकिन यदि वह भगवान हरि के भजन में बाधा डालता है, तो उससे दूरी बना लेना ही भक्त का परम कर्तव्य है।
पौराणिक उदाहरणों से समझाया भक्ति का मार्ग
मीराबाई को संबल देने के लिए तुलसीदास ने अपने काव्य संदेश में अनेक महान पौराणिक भक्तों के उदाहरण पेश किए। उन्होंने बताया कि भक्त प्रह्लाद ने ईश्वर भक्ति के लिए अपने सगे पिता हिरण्यकशिपु का त्याग कर दिया था। इसी प्रकार विभीषण ने अपने सगे भाई रावण को छोड़ दिया, भरत ने अपनी माता कैकेयी की आज्ञा को भक्ति के आड़े नहीं आने दिया, राजा बलि ने अपने गुरु शुक्राचार्य का वचन टाल दिया और ब्रज की गोपियों ने अपने पतियों और सांसारिक मोह को त्यागकर श्रीकृष्ण का आश्रय लिया। इन सभी उदाहरणों के जरिए तुलसीदास ने स्पष्ट किया कि सच्ची ईश्वर भक्ति के सामने पारिवारिक और सामाजिक बंधन गौण हो जाते हैं। वही संगति सबसे उत्तम है जो इंसान के मन को प्रभु के चरणों में दृढ़ता से जोड़े रखे।



















